क्या भारत का जनतंत्र फ़ेसबुक-ग्रस्त हो चुका है?
एक विशालकाय कम्पनी की सक्रियताओं को जानने के लिए जांच जरूरी ही है, लेकिन हमें लिबरल जनतंत्र के भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसकी तरफ प्रोफेसर डीबर्ट ने इशारा किया है।
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एक विशालकाय कम्पनी की सक्रियताओं को जानने के लिए जांच जरूरी ही है, लेकिन हमें लिबरल जनतंत्र के भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसकी तरफ प्रोफेसर डीबर्ट ने इशारा किया है।
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भारत की संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र का मतलब बीजेपी का, बीजेपी के लिए और बीजेपी के द्वारा हो चुका है। बीजेपी ही सवाल पूछ सकती है। बीजेपी को ही जवाब देना है और बीजेपी को ही सुनना है। इसीलिए 14 सितंबर से शुरू होने जा रहे संसद के सत्र में विपक्ष के सांसदों की जुबान पर ताला लगा दिया गया है।
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राज्यपाल नामक जीव की रक्षा कैसे हो? लोकतन्त्र के दंगल में राज्यपाल नामक जीव की रक्षा करने के लिए “सेव दी गवर्नर” नामक स्टिकर भी उपलब्ध है। राजनीतिक दलों ने “सेव दी गवर्नर” का स्टिकर लगाया हुआ है।
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एक बड़ा वर्ग ऐसे ही तैयार हुआ है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था के जो सह-उत्पाद यानी बाय-प्रोडक्ट हैं वे उसी के उपभोक्ता के तौर पर तैयार किये गये हैं
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जब राजसत्ता के इशारे पर सारे निर्णय लिए जा रहे हैं तो लिखित कानून और उसे पालन करने वाले संस्थानों की क्या भूमिका रह जाएगी? हमारे संवैधानिक अधिकारों की गारंटी कौन करेगा जो हमें भारतीय कानून के तहत एक नागरिक के तौर पर मिले हुए हैं? उस नागरिक स्वतंत्रता का क्या होगा जिसकी दुहाई बार-बार दी जाती है?
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यदि रोबोटिक गुरु के स्थान पर कोई जीवित गुरु होता तो इस उत्तर से शायद हताश होता कि एक हजार साल बाद भी भारतीय जनता परिवर्तन के लिए चमत्कारों पर ही उम्मीद लगाए हुए है, लेकिन वह तो रोबोट था, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बिल्कुल वैसे ही जैसे आज हम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ते देखकर भी मौन हैं।
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बात तो करना ही पड़ेगी। बोलना तो पड़ेगा ही। बात बोलेगी भी और अपने समय के भेद भी खोलेगी और ज़ुबान पर चढ़ती जा रही बर्फ की मोटी सिल्लियों को पिघलाने का काम भी करेगी।
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ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।
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स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है, विपक्ष के प्रति उदासीनता, सरकारों का निरंकुश और तानाशाही रवैया तोड़ने का काम भी मीडिया ही करती है।
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