प्रधानमंत्रियों के चुनावी भाषण और चुनाव प्रचार की गिरती गरिमा

आकाशवाणी के आर्काइव में तलाश करते हुए जो सबसे पहली ऑडियो रिकॉर्डिंग हाथ लगी वह 1951 के आम चुनावों से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्र के नाम संदेश के रूप में थी। सुनकर ऐसा लगा कि लोकतंत्र को जीने वाला कोई मनीषी और जननेता देश के नागरिकों को पहले आम चुनावों से पूर्व प्रशिक्षण दे रहा हो।

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भाजपा और संघ की असली समस्या कांग्रेस और ‘परिवार’ नहीं बल्कि देश की जनता है!

‘विश्व गुरु’ बनने जा रहे भारत देश के प्रधानमंत्री को अगर अपना बहुमूल्य तीन घंटे का समय सिर्फ़ एक निरीह विपक्षी दल के इतिहास की काल-गणना के लिए समर्पित करना पड़े तो मान लिया जाना चाहिए कि समस्या कुछ ज़्यादा ही बड़ी है।

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अमित शाह को क्यों कहना पड़ा कि मोदी निरंकुश नहीं हैं!

सवाल यह है कि मोदी के गुजरात और दिल्ली में सफलतापूर्वक दो दशकों तक सरकारें चला लेने के बाद अचानक से इस तरह के सवाल के पूछे जाने (या पुछवाये जाने) की ज़रूरत क्यों पड़ गयी होगी? जनता तो इस आशय की संवेदनशील जानकारी की साँस रोककर प्रतीक्षा भी नहीं कर रही थी। सरकार और पार्टी में ऐसे मुद्दों पर बंद शयनकक्षों में भी कोई बातचीत नहीं होती होगी।

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हर्फ़-ओ-हिकायत: सौ साल में गाँधी के आदर्शों का अंतर और उनके नये बंदर

आज जब युवाओं का एक तबका मुगल, अंग्रेजी या वामपंथी इतिहास-लेखन का विरोध करते हुए गांधीजी के लिए अपशब्दों का प्रयोग करता है तो उन्हें एक सवाल खुद से करना चाहिए कि बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय, वल्लभभाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद जैसी शख्सियतों ने उस दौर में क्यों गांधी को अपना नेता चुना?

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हर्फ़-ओ-हिकायत: खेल के मैदान में सियासत का मास्टर स्ट्रोक

ध्यानचंद की लोकप्रियता का अंदाजा केवल इस बात से लगाइए कि वे आज से करीब सौ साल पहले 1928 के दौर के खिलाड़ी हैं। उनके बाद दारा सिंह, पीटी उषा, सुनील गावस्कर, कपिल देव और क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर जैसे बहुत से नाम आये, लेकिन वो अदब और वो सम्मान किसी को नहीं मिला दो दद्दा को मिला।

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बात बोलेगी: पापड़ी चाट के बहाने ताज़ा बौद्धिक विमर्श

जहां तक सब जानते हैं, कोई बुरा महसूस करने के लिए इस तरह प्रधानमंत्री नहीं बनता। आप भी नहीं बने होंगे। तो क्यों बार-बार ऐसा करते हैं? अच्छा कीजिए कुछ, तो लोग भी अच्छा बोलेंगे। आप भी अच्छा महसूस करेंगे।

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अधूरी विजय-यात्रा में सम्पन्न होते अश्वमेध यज्ञ का भय

भाजपा अब अपनी आगे की यात्रा सिर्फ़ पुरानी भाजपा के भरोसे नहीं कर सकती! उसे अपनी पुरानी चालों और पुराने चेहरों को बदलना पड़ेगा। चेहरे चाहे किसी योगी के हों या साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह, साध्वी प्राची, प्रज्ञा ठाकुर या उमा भारती के हों। इसका एक अर्थ यह भी है कि राजनीति में सत्ता का बचे रहना ज़रूरी है, व्यक्तियों का महत्व उनकी तात्कालिक ज़रूरत के हिसाब से निर्धारित किया जा सकता है।

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बात बोलेगी: खुलेगा किस तरह मज़मूं मेरे मक्तूब का या रब…

जिसके कहे पर देश चलने लगा था या उतना तो चलने ही लगा था जितनों की उँगलियों में देश की बागडोर सौंपने का माद्दा था, आज वे उँगलियां उस नीली स्याही को कोसती नज़र आ रही हैं जिसे वोट करते वक्‍त उन्‍होंने लगवाया था। ऐसी हर कम होती उंगली का एहसास इस विराट सत्ता को हो चुका है।

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तिर्यक आसन: बुद्धि की शव-साधना में विश्वगुरु

निजीकरण की नींव तैयार करने में गारा-मिट्टी ढोने वाले कोरोना की दूसरी लहर में ईवेंट जी से नाराज हैं। जब वे कोरोना के इलाज के लिए प्राइवेट हॉस्पिटल में जाते हैं, तो बिल देखकर सोचने लगते हैं- क्या ये वही बुलंद इमारत है, जिसे तैयार करने के लिए हमने गारा-मिट्टी ढोयी थी?

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‘विफल स्टेट’ और ‘स्टेट की विफलता’ दो अलग बातें हैं, शातिर मीडिया का खेल समझिए!

मीडिया इतना शातिर बन गया है, यह इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है क्योंकि वही है जो स्टेट के शीर्ष पर बैठे लोगों की विफलताओं को स्टेट की विफलता घोषित कर लोगों के आक्रोश की धार को मोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह हमें बताना चाहता है कि हमने ऐसा ही स्टेट बनाया है तो आज इस भयंकर त्रासदी में तमाम विफलताओं के सबसे बड़े दोषी हम ही हैं।

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