राग दरबारी: चुनी हुई कोई भी सरकार कानून वापस नहीं लेती, इसीलिए सरकारों को हटाना पड़ता है!

यह पहली बार नहीं है कि सरकार आंदोलनकारियों की बातों के प्रति इतनी बेरूखी से पेश आ रही है। पिछले तीस वर्षों के भारतीय राजनीतिक इतिहास पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि सरकार चाहे जो भी हो एक बार जब कोई बिल पास करवा लेती है या फिर वैसा कोई निर्णय ले लेती है तो उससे पीछे नहीं हटती है, भले ही जनता जो भी मांग करती हो या फिर विपक्षी दल उसका जिस रूप में भी विरोध कर रहे हों।

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बात बोलेगी: हिंदू थक कर सो गया है तब तो ये हाल है, जागेगा तो क्या होगा डाक साब?

डॉ. साहब की चिंता समझ में आती है, लेकिन उसका निदान वो किससे मांग रहे हैं यह समझ नहीं आया, हालांकि उन्होंने देश का ध्यान इस महान तथ्य की तरफ दिलाया है कि यह देश दो-दो महान सत्ताओं के संरक्षण में मानवाधिकारों से सम्पन्न जम्हूरियत के मज़े लेता आ रहा है।

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दक्षिणावर्त: व्यक्ति के नाश की बुनियाद पर आदर्श समाज कैसे खड़ा हो सकता है?

हमारा दुर्भाग्य है कि हम आधुनिक शिक्षा नाम पर ऐसे कूड़े से दो-चार हुए हैं, जिसने किसी भी विषय पर समग्र दृष्टि डालने की हमारी क्षमता को ही खंडित कर दिया है। हमें एकरेखीय, एकपक्षीय, एकवलीय तरीके से देखना सिखाया गया है और हम इसी को लेकर गर्वित होते रहते हैं।

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बात बोलेगी: एतबार की हद हो चुकी बंधु! चलिए अब ‘ओन’ किया जाए…

2019 के आम चुनाव के समय जब देश के प्रधानमंत्री ने ताल ठोंक कर कहा था कि हां, ‘मैं चौकीदार हूं’ तब लोगों को लगा था कि विपक्ष के नेता की बात का जवाब दिया गया है। आज वही लोग इसे ऐसे समझ रहे हैं कि यह तो स्वीकारोक्ति थी। अब लोग यह समझ रहे हैं कि जब ‘वो’ चौकीदार हैं तो ज़रूर उनका कोई मालिक भी है। मौजूदा किसान आंदोलन ने इस रहस्य को जैसे सुलझा दिया है।

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दक्षिणावर्त: लोकतंत्र भी चाहिए और खूंटा भी वहीं गड़ेगा, ऐसे कैसे चलेगा?

वाम विचार किस तरह पक्षपोषण करने वाले दिलफरेब तमाशों को अंजाम देता रहा है, अमेरिका की घटना के तुरंत बाद दुनिया भर में आयी प्रतिक्रियाओं को देखने से समझ में आता है।

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अडानी-अम्बानी से बयाना मोदी ने लिया है, सांसदों ने नहीं, इसलिए वे इस्तीफ़ा दें: शिवाजी राय

पूर्वांचल के बड़े किसान नेता, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष और किसान आंदोलन समर्थन समिति, लखनऊ के संयोजक शिवाजी राय मंगलवार को टिकरी बॉर्डर पर किसानों के मंच पर थे. जनपथ की ओर से पत्रकार नित्यानंद गायेन ने इस मौके पर उनसे बात की है.

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चुनावीबिहार-8: मोदी की तीन सभाएं और तेजस्वी की दो गलतियां ‘गेमचेंजर’ हो सकती हैं!

तेजस्वी के साथ अनुभवहीनता और बिना जिम्मेदारी के बड़ी कुर्सी मिलने से जुड़े तमाम दोष समा गए हैं। लालू की तरह उनके पास रघुवंश प्रसाद, अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे दोस्त भी नहीं हैं, ऊपर से पार्टी पर उन्होंने नियंत्रण कायम तो कर लिया है, लेकिन यह कब तक रहेगा यह कहना बहुत मुश्किल है।

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“मोदी जी, जेपी के विचारों से आप कितनी दूर चले गए हैं, कृपया इस पर विचार करें”!

अगर महात्मा गाँधी भारत को 1947 में मिली स्वतंत्रता के वास्तुकार थे, जो इमरजेंसी के कारण 25/26 जून, 1975 को बुझ सी गयी, वो जेपी थे जिन्होंने उसे 1977 में पराजित कर हमें हमारी दूसरी स्वतंत्रता दिलाई. उनकी प्रशंसा में भारत की जन ने उन्हें ‘लोकनायक’ एवं ‘दूसरा महात्मा’ कह कर पुकारा. क्या आपको वो जेपी याद है, श्रीमान मोदी?

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पॉलिटिकली Incorrect: लेनिन की किताब के उस मुड़े हुए पन्‍ने में अटकी देश की जवानी

जिस अनुपात में भारतीय अर्थव्यवस्था मिस-मैनेज हो रही है, हो सकता है कि आने वाले दिनों में किसी 15 अगस्त या 26 जनवरी को मोदी, बिड़ला की जागीर हो चुके लाल किले की प्राचीर से भगत सिंह को ‘टीम वर्क’ का गुरु घोषित कर दें और शहीदे आज़म भगत सिंह सरकारी कार्यालयों में मैनेजमेंट गुरू के फ्रेम में दिखना शुरू हो जाएं।

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“सरकार के खिलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा है, अन्ना आंदोलन के सबक और घुसपैठियों के प्रति सतर्क रहें लोग”!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के अधिनायकवादी प्रोजेक्ट के विरुद्ध व्यापक आंदोलन के साथ ही समाज के राजनीतिकरण पर सर्वाधिक जोर देना होगा और सामाजिक संतुलन को बदलना होगा।

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