बात बोलेगी: बिजली आ गयी है, लेकिन अर्द्ध-सत्य का अंधेरा कायम है!

सावरकर ने माफी मांगी यह सच है और गांधी ने ऐसा करने को कहा यह झूठ है। जब ये दोनों एकमेक हो गए तब जो परिणाम आए वो ये कि या तो दोनों बातें झूठी हैं या दोनों ही बातें सच हैं या दोनों ही आधा सच और आधा झूठ है। इस तरह से एक अर्द्ध-सत्य पैदा हो गया।

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बात बोलेगी: मुखिया ‘मुख’ सों चाहिए…

अगर यह तोहमत है तब ‘किसने किस पर’ लगायी का सवाल खड़ा हो जाता। और कह भी कौन रहा है? जिसमें छप्पन छेद हैं? मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा से सेलेक्टिव रहा हो वह किसी और पर यह तोहमत कैसे लगा सकता है कि कोई सेलेक्टिव क्यों है? इसलिए यह मुखिया होने की चुनौती है।

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बात बोलेगी: एक सौ चालीस करोड़ की सामूहिक नियति के आर-पार एक ‘थार’

क्या लगता है कि थार में केवल देश के गृह राज्यमंत्री का बेटा बैठा था जो उसे चला रहा था? या यह महज एक आकस्मिक घटना थी? या यह एक एक्सीडेंट था? या इस घटना को अंजाम देते वक़्त और उसके बाद के कार्य-कारणों का आकलन नहीं किया गया था? सब कुछ किया गया था। ध्यान से देखें तो थार उस जन्मकुंडली के रूप में बदलती हुई दिखलायी देगी जो हमारी नियति को गढ़ने के लिए बनायी गयी है।

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बात बोलेगी: खतरे में पड़ा देश, खतरों के खिलाड़ी और बचे हुए हम!

देश निरंतर खतरे की तरफ तेज़ कदमों से बढ़ा जा रहा है। लगता है देश जो है वो सुसाइडल यानी आत्महंता हो चुका है जो किसी भी तरह मरने पर आमादा है। जैसे कुएं के पाट पर खड़ा हो- अब कूदा कि तब कूदा। और तैरना उसे आता नहीं है, जिसका ज्ञान उसे छोड़कर बाकी सबको है। इसलिए सब उसे कूदने से रोक रहे हैं। डर लग रहा है देखकर कि कहीं कुछ लापरवाही न हो जाए। हाथों से छिटककर देश कहीं सचमुच कुएं में समाधि न लगा ले।

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बात बोलेगी: पालतू गर्वानुभूतियों के बीच खड़ी हिंदी की गाय

आप हिन्दी बरतते हैं क्योंकि आपको आसान लगता है। आप हिन्दी पढ़ते हैं, लिखते हैं, समझते हैं तो इसलिए क्योंकि उस भाषा में आप खुद को सहज पाते हैं और इसलिए भी कि वो आपके काम की ज़रूरत है और इसलिए भी कि क्योंकि उसमें आपको काम करने को कहा गया है। तब दुनिया में ऐसी कौन सी भाषा है जो इन तीनों में परिस्थितियों में ही बरती न जाती हो?

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बात बोलेगी: क्या आप प्रबुद्ध वर्ग से हैं? तो जज साहब का कहा मानिए…

अगर ऐसी कोई युक्ति निकाल सकें कि दो दिन पीछे जा सकें तो लखनऊ में आयोजित बहुजन समाज पार्टी के प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में शिरकत कर आइए, जहां इसी तरह के पर्यायवाची का सार्वजनिक रूप से निर्माण हुआ है। पहले यह सम्मेलन ब्राह्मण सम्मेलन था, उसे कुछ रोज़ पहले प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन कह दिया गया। इसका तात्पर्य यही हुआ कि जो बौद्धिक हैं वो ब्राह्मण हैं और इसके उलट व समानान्तर- जो ब्राह्मण हैं वो बौद्धिक हैं। इसी तर्ज पर जो आलोचना करें, सलाह दें, वो बुद्धिजीवी हैं। जो बुद्धिजीवी हैं वो सलाह दें और आलोचना करें!

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बात बोलेगी: बिकवाली के मौसम में कव्वाली

आर्थिक विभाजन, सामाजिक विभाजन, सांप्रदायिक विभाजन, वैचारिक विभाजन और कुछ नहीं तो रंग, कद, काठी, नाक की सिधाई, चपटाई, मोटाई के आधारों पर मौजूद विभाजन सरकारों के लिए सबसे मुफीद परिस्थितियां हैं। इनके रहने से एक ऐसी एकता का निर्माण होता है जिससे सार्वजनिक संपत्ति को अपना मानने की भूल लोग नहीं करते।

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बात बोलेगी: अपने-अपने तालिबान…

एक समय में दो देशों को देखना, उनकी एक सी नियति को देखना, उनके एक से अतीत को देखना और उनके एक से भविष्य को देखना असहज करता है लेकिन आँखों का क्या कीजिए जो समय के आर-पार यूं ही वक़्त की मोटी-मोटी दीवारों को भेद लेती हैं। इन्हें भेदने दीजिए ऐसी दीवारें जिनके पार हमारा बेहतर भविष्य कुछ आकार ले सकता है।

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बात बोलेगी: ‘कम्पल्शन’ के दरबार में ‘कन्विक्शन’ का इकरार

इस भारतवर्ष की सृष्टि में जब सब कुछ आपकी मर्ज़ी से ही हो रहा है तो क्या कोरोना की भेंट चढ़ गए लोग भी आपकी ही इच्छा थी? क्या ऑक्सीज़न के लिए तरसते और उसके लिए भटके लोगों के चित्र आपकी ही लीला थी? नोटबंदी से लेकर जीएसटी और फिर देशव्यापी लॉकडाउन में जो लोग अपनी अपनी देह से मुक्त हुए क्‍या वह भी आपकी कोई रचना थी? आपका ये ‘कंविक्शन’ कितनी लाशों के बाद पूरा होगा, हुजूर?

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बात बोलेगी: पापड़ी चाट के बहाने ताज़ा बौद्धिक विमर्श

जहां तक सब जानते हैं, कोई बुरा महसूस करने के लिए इस तरह प्रधानमंत्री नहीं बनता। आप भी नहीं बने होंगे। तो क्यों बार-बार ऐसा करते हैं? अच्छा कीजिए कुछ, तो लोग भी अच्छा बोलेंगे। आप भी अच्छा महसूस करेंगे।

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