बात बोलेगी: ‘अपहृत गणराज्‍य’ की मुक्ति की सम्‍भावनाओं का उत्‍तरायण!

बदलाव ऐसे ही होता है। पहले कुछ बदलते हैं, फिर बहुत लोग बदलते हैं। एक लहर दूसरे के लिए जगह बनाती है, उसे पैदा करती है। लहरें अब शांत और ठहर चुके तालाब में हलचल मचा चुकी हैं। हम उन्हें उठते गिरते देख रहे हैं।

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बात बोलेगी: हर शाख पे उल्लू बैठे हैं लेकिन बर्बाद गुलिस्ताँ का सबब तो कोई और हैं…

ये खोज जब तक पूरी नहीं होगी तब तक बेचारे शाख पर बैठे उल्लुओं को ही ‘हर हुए और किए’ का दोषी माना जाएगा। बड़ी चुनौती- शुरू कहाँ से करें? घर से? पड़ोस से? गाँव से? समाज से? प्रांत से या देश से? क्योंकि गुलिस्ताँ का मतलब अब भी काफी व्यापक था।

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बात बोलेगी: जनता निजात चाहती है, निजात भरोसे से आता है, भरोसा रहा नहीं, भक्ति कब तक काम आएगी?

विज्ञान से बेवफ़ाई करने पर सदियों से हमारे सनातनी समाज का कुछ नहीं बिगड़ा, तो छह सौ साल एक बाद प्रकट हुए एक हिन्दू राजा के शासनकाल में विज्ञान की परवाह करने की कौन ज़रूरत आन पड़ी? देखा जाएगा जो होगा सो, लेकिन अभी हमें बनती हुई वैक्सीन के जल्दी से जल्दी बन जाने के लिए ही कामनाएं करनी हैं।

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बात बोलेगी: सब कुछ याद रखे जाने का साल

तमाम दमन और उत्पीड़न के बावजूद इस नारे में भविष्य के लिए एक आश्वस्ति मिली कि भविष्य बेहतर होगा क्योंकि इस दमन को याद रखा जाएगा और उसका हिसाब लिया जाएगा और इस निज़ाम के बाद ऐसा निज़ाम नमूदार होगा जो इस दमन और उत्पीड़न को दोहराने की ज़ुर्रत नहीं करेगा।

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बात बोलेगी: जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया…

एक साँचे में ढले, एक जैसा आइक्यू, एक जैसे ब्यौपारी, दोनों की देशों की जनता का एक जैसे चौंकना, एक जैसे चुनाव अभियान, एक जैसी शोहरत,एक जैसी नफ़रत, एक जैसे अनंत झूठ- क्या ही ज़ुदा करता है दोनों को?

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बात बोलेगी: अब मामला उघाड़ने और मनवाने से नाथ घालने तक आ चुका है!

रिलायंस जियो के बहिष्कार के बाद शायद निकट इतिहास में यह पहला मौका है जब अंबानीज़ इस तरह बौखलाए हुए हैं, हालांकि यह बौखलाहट अच्छी है। सर्फ एक्सल कहता है कि दाग बुरे नहीं हैं। कोरोना की तरह किसान आंदोलन को इस ‘उजागर करो अभियान’ का भरपूर श्रेय दिया जाना चाहिए।

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बात बोलेगी: ‘ज़रूरत से ज्यादा लोकतंत्र’ के बीच फंसा एक सरकारी ‘स्पेशल पर्पज़ वेहिकल’!

अमिताभ कांत का बयान अगर आधिकारिक तौर पर भारत सरकार का बयान है, जो निश्चित तौर पर है, तो यह इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि उसने भारत सरकार की असल मंशाओं को उजागर करवा लिया है।

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बात बोलेगी: जो सीढ़ी ऊपर जाती है, वही सीढ़ी नीचे भी आती है!

ये सरकारें आती हैं आंदोलनों से और जाती भी हैं आंदोलनों से ही। आंदोलन, सरकार के लिए सीढ़ी हैं। इन सीढि़यों पर सरकारें चढ़ती हैं शौक से लेकिन उतरती हैं बेआबरू होकर। उतरती क्या, उतारी जाती हैं।

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बात बोलेगी: मास्क लगाएं, हाथ धोएं, देह दूरी बनाए रखें, वैक्सीन का इंतज़ार करें, और क्या?

उन्होंने एक शानदार घटिया किस्म की सड़कछाप शायरी से अपनी बात शुरू की और कहा- ‘आपदा के गहरे समंदर से निकलकर हम किनारे की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसा न हो जाए कि हमारी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था। हमें वैसी स्थिति नहीं आने देनी है’।

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बात बोलेगी: ‘लव जिहाद’ के सरपट घोड़े, दौड़े.. दौड़े… दौड़े…..

‘लव’ जैसा चिर-नवीन शब्द और अहसास इसलिए ‘जिहाद’ बना दिया जा रहा है ताकि इस अहसास के पनपने से पहले इसमें युद्धपोतों की गर्जनाएं और उनसे उत्पन्न रक्तरंजित दृश्य नज़रों के सामने शाया हो जाएं।

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