एक गंदगी-प्रधान देश में गरीबों की इम्यूनिटी का मध्यवर्गीय मिथ

गरीबी और गंदगी में एक घनिष्ठ संबंध बनता है। लोग झुग्गी-झोंपड़ियों में रहते हैं, गंदे नालों के किनारे रहते हैं, कचरा फेंकने वाली जगहों पर रहते हैं, पानी जमा होने वाले निचले स्थानों पर रहते हैं, गाय-भैंसों के साथ रहते हैं, सुअरों और भेड़-बकरियों के साथ रहते हैं। जाहिर है राजी खुशी तो वे वहाँ नहीं रहते, मजबूरी में ही रहते हैं पर वातावरण के हिसाब से अपने को ढाल लेते हैं।

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तन मन जन: इम्यूनिटी क्या वैक्सीन से ही आएगी?

वैक्सीन का इन्तजार कर रहे लोगों को भी मेरा यही संदेश है कि इम्यूनिटी का वैक्सीन डोज यदि सुरक्षित है तो जरूर लीजिए लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि आप प्राकृतिक इम्यूनिटी के लिए प्राकृतिक जीवन शैली में लौटिए। आपकी टिकाऊ इम्यूनिटी प्रकृति ही दे सकती है। इसलिए प्रकृति को बचाइए ताकि आप भी बच सकें।

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तन मन जन: असल मामला इम्यूनिटी का है, इसलिए बाज़ार के कुचक्र से बचें और जीवनशैली पर ध्यान दें

होमियोपैथी तो अपने आरम्भिक काल से ही शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाकर ही रोग को खत्म करने का दावा करती है। होमियोपैथी पर सवाल उठाने वाले शुरू से ही होमियोपैथी को “कुछ नहीं” समझते हैं। कुछ तो इसे “प्लेसिबो” कहते हैं. हालांकि प्लेसिबो का होमियोपैथी में बड़ा आदर है।

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