आर्टिकल 19: मीडिया निगल गया वरना दिल्ली के दंगे पर कोर्ट की टिप्पणी आज राष्ट्रीय शर्म होती

अदालत ने कहा कि “इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाना पूर्व-नियोजित साजिश के बिना संभव नहीं है।” कौन थे वो साजिशकर्ता और कौन थे उनके आका? यह बताने में दिल्ली पुलिस का दिल बैठ जाता है। वह इधर-उधर की बात करने लगती है। इसकी वजह हम भी जानते हैं और आप भी।

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आर्टिकल 19: TRP की नपाई रोकने के पीछे Zee और BARC का बाप-बेटा कनेक्शन!

बार्क के इंडिया बोर्ड का चेयरमैन कौन है? उनका नाम है पुनीत गोयनका। पुनीत गोयनका ज़ी न्यूज के संस्थापक और एस्सेल समूह के मालिक सुभाष चंद्रा के सुपुत्र हैं। सुभाष चंद्रा को बीजेपी ने राज्यसभा का सांसद बनाया है। खबरों का डीएनए जांचने वाले सुधीर चौधरी, पुनीत गोयनका के चाचा-पापा-ताऊ के मुलाजिम हैं। कुछ समझ पा रहे हैं?

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आर्टिकल 19: ये TRP का घोटाला नहीं, दुर्गंध पर एकाधिकार की लड़ाई है!

टीआरपी मामला ही नहीं है। खेल ये है कि हिंदुत्व के एजेंडाधारी चैनलों और एंकरों को अर्णब गोस्वामी ने एक झटके में पैदल कर दिया है, तो टीवी के पर्दे की खिसियानी बिल्लियां और बागड़बिल्ले नैतिकता का खंभा नोच रहे हैं।

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आर्टिकल 19: UN में गमकता महिला सशक्‍तीकरण का गजरा हाथरस में सूखकर बिखर गया है!

एक तस्वीर में डीएम धमकी दे रहा है। एक तस्वीर में एडीएम धमकी दे रहा है। एक तस्वीर में थानेदार धमकी दे रहा है। पूरे गांव के बाहर रस्सी से बैरिकेडिंग कर दी गयी है। इतनी सख्ती तो भारत पाकिस्तान सीमा पर भी नहीं। ये सारी तस्वीरें बहुत बेचैन करने वाली हैं। बहुत भयावह हैं। बहुत परेशान करने वाली हैं।

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आर्टिकल 19: जो चैनल चला रहा है, उसी को किसानों को भी लूटना है! खेल समझिए…

दरअसल, करोड़पतियों के नींद, चैन, सुकून का हिसाब-किताब करने में व्यस्त टीवी चैनलों को फुर्सत नहीं मिल पा रही है कि वो माथे पर चुहचुहाते पसीने से तरबतर किसानों की छिन चुकी नींद और सुकून की खबर ले लें और खबर दे दें।

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आर्टिकल 19: सरकार को डिजिटल से दिक्‍कत है, मने टीवी चैनल अब अप्रासंगिक हो चुके हैं

टीवी चैनलों के प्रासंगिकता खो देने की बात हवा में नहीं है। खुद मोदी सरकार ने अदालत में सील ठप्पे के साथ ये हलफनामा दिया है कि ये सब तो हमारे काबू में हैं, लेकिन डिजिटल मीडिया वाले नहीं आ रहे। आप उन पर लगाम कसिए।

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आर्टिकल 19: आजतक नहीं, रिपब्लिक! जब खालिस दुर्गंध यहां मिले तो कोई वो क्‍यूं ले, ये न ले…

आजतक की ये दुर्गति इसलिए हुई है कि अरुण पुरी ने अर्णब गोस्वामी बनने में पूरी ताकत झोंक दी। उसके पास न अपनी रिपोर्टें थीं, न अपना कोई पत्रकारीय विमर्श और न ही कोई स्वतंत्र सोच। आजतक बस ईवेंट जर्नलिज्म कर सकता था।

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आर्टिकल 19: लोकतंत्र के शून्‍यकाल में…

भारत की संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र का मतलब बीजेपी का, बीजेपी के लिए और बीजेपी के द्वारा हो चुका है। बीजेपी ही सवाल पूछ सकती है। बीजेपी को ही जवाब देना है और बीजेपी को ही सुनना है। इसीलिए 14 सितंबर से शुरू होने जा रहे संसद के सत्र में विपक्ष के सांसदों की जुबान पर ताला लगा दिया गया है।

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आर्टिकल 19: दिल्‍ली दंगे पर एमनेस्‍टी की रिपोर्ट और सन् चौरासी के प्रेत की वापसी

एमनेस्‍टी ने एक विस्तृत जांच के बाद जो रिपोर्ट तैयार की है, उसमें भारत की सबसे शानदार पुलिस माने जाने वाली दिल्ली पुलिस का रंग रूप बहुत घिनौना, बहुत डरावना और बहुत भयानक नजर आता है।

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आर्टिकल 19: प्रशांत भूषण ने नैतिकता की एक लंबी लकीर खींच दी है, जिसका नज़ीर बनना तय है

फैसला कुछ भी हो लेकिन प्रशांत भूषण हीरो बन चुके हैं। अगर सजा मिलती है तब भी और अदालत उन्हें सिर्फ फटकार लगाकर छोड़ने का फैसला करती है तब भी। भारत के न्यायिक इतिहास में अवमानना के मामले में अदालत से बाहर इतनी जोरदार बहस कभी नहीं हुई।

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