दांडी मार्च के 91 वर्ष: जन आंदोलन से आततायी सत्ताओं को झुकाया जा सकता है

आज की युवा पीढ़ी के दिमाग से इस घटना और इसके महत्व को बताने के लिए 91 साल पहले हुई उस ऐतिहासिक यात्रा के केंद्र पर उन स्मृतियों को सहेजने के लिए एक स्मारक बनाया गया है।

Read More

पत्रकारों की गिरफ़्तारी: गांधी जी की हत्या के संदर्भ में कुलदीप नय्यर की Scoop से कुछ सबक

अगली सुबह सम्पादक ने मुझे तलब किया— डाँट-फटकार के लिए नहीं, बल्कि यह समझाने के लिए कि वस्तुपरकता पत्रकारिता के मूल सिद्धान्तों में से एक है। इसीलिए, मुझे अच्छी या बुरी जैसी भी घटनाएँ हों, उनकी खबर बनाने की जिम्मेदारी उठानी चाहिए और अपनी भावनाओं को अपने फैसलों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि सम्पादक महोदय का कहना सही था।

Read More

इस आंदोलन का ‘महात्मा गांधी’ कौन है?

किसान आंदोलन को तय करना होगा कि उसकी अगली यात्रा में कितने और कौन लोग मार्च करने वाले हैं! उन्हें चुनने का काम काम कौन करने वाला है?

Read More

महात्मा गाँधी की ‘नयी तालीम’ के आईने में नयी शिक्षा नीति 2020

गाँधी की नयी तालीम क संदर्भ में तुलनात्मक ढंग से अगर इस नीति की समीक्षा की जाए, तो यह एक प्रकार से पहले से चली आ रही शिक्षा नीतियों में एक अपडेट नोटिफिकेशन की तरह आया है। शिक्षा एवं शिक्षण संबंधी संरचना के अलावे इसमें ऐसा कुछ भी नया या रचनात्मक नहीं है

Read More

गाँधी स्मृति: कितनी दूर, कितनी पास?

मेरे मित्र एवं प्रसिद्ध बुद्धिजीवी अपूर्वानन्द इस प्रश्न को अपनी कई सभाओं में उठा चुके हैं। उनका यह भी कहना है कि दिल्ली के तमाम स्कूलों में उन्होंने यह जानने की कोशिश की और उन्होंने यही पाया कि लगभग 99 फीसदी छात्रों ने इस स्थान के बारे में ठीक से सुना नहीं है, वहां जाने की बात तो दूर रही।

Read More

महात्मा गाँधी को प्रतीकात्मक ही नहीं बल्कि धरातल पर उतारना है ज़रूरी: मेधा पाटकर

मेधा का मानना है कि सबका-साथ-सबका-विकास का सपना साकार करने के लिए, सबके सतत विकास के लिए एवं न्यायपूर्ण मानवीय व्यवस्था के लिए, महात्मा गाँधी का सुझाया हुआ सहकारिता (cooperative) का रास्ता ही आज के परिप्रेक्ष्य में सही रास्ता है.

Read More

“गाँधी वध क्यों?” गोडसे के अदालती बयान के 70 साल बाद अशोक पांडेय की ताज़ा पड़ताल

गांधी जयंती की पूर्व संध्या पर पाठकों के लिए उपलब्ध राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अशोक कुमार पांडेय की नयी किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ कई ज्वलंत तथ्यों को सामने लाती है। यह किताब गांधी जयंती के अवसर पर देश के सभी पाठकों के लिए एक उपहार है, जो यह जानना चाहते हैं कि वो क्या कारण थे जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी के कर्णधार को एक साल भी आज़ाद भारत में जीवित नहीं रहने दिया।

Read More

जिसने अंग्रेज़ों से गाँधी जी की जान बचायी, उसे इतिहास ने भुला दिया!

गांधी की जान तो बच गयी लेकिन बतख मियां और उनके परिवार को बाद में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। गांधी जी के जाने के बाद अंग्रेजों ने न केवल बतख मियां को बेरहमी से पीटा और सलाखों के पीछे डाला, बल्कि उनके छोटे से घर को ध्वस्त कर क़ब्रिस्तान बना दिया।

Read More