जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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बॉर्डर पर किसान आंदोलन और मिडिल क्लास का ‘बॉर्डर’!

ऐसा लगता है मिडिल क्लास ने अपने और आंदोलनों के बीच एक बार्डर बना रखा है- यह जानते हुए भी कि ये आंदोलन जनता के अधिकारों और देश के संवैधानिक मूल्यों को बचाने के लिए देश के मजदूरों और किसानों द्वारा चलाये जा रहे हैं– वो अपने ही द्वारा बनाए हुए बार्डर को लांघना नहीं चाहता।

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शहर से दूर जाते हुए शहर के भीतर आना… जैसे खुद को पाना! वकील लेन से जंतर-मंतर की सुरंग में…

सुरंग पार करके जब आप बाहर निकलते हैं तो खुद को एक कम्पाउंड में पाते हैं, जहां बड़े-बड़े पेड़ों और बहुत सी वनस्पति के झुरमुट के बीच चंद रिहाइशी मकान बने हैं. वहां दाखिल होते ही एक पल को आपको लगता है मानो सुंदरबन सरीखे वर्षावन के बीच बसा कोई गाँव हो. अपने आस-पास का नज़ारा देख कर जब आप विस्मय में धीरे-धीरे अपनी पलकें झपका रहे होते हैं तो खुद को जैसे किसी जलडमरूमध्य में पाते हैं.

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