COVID-19 संकट पर नोबेल विजेता अभिजित बनर्जी से राहुल गांधी की बातचीत यहां पढ़ें

जहाँ तक गरीबी का सवाल है, मैं स्पष्ट नहीं हूँ कि अगर अर्थव्यवस्था में सुधार होता है, तो गरीबी पर इसका प्रभाव पड़ेगा। वास्तविक चिंताएँ हैं- क्या अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित होगी और विशेष रूप से, कोई इस प्रक्रिया के माध्यम से इस महामारी के संभावित समय के बारे में कैसे सोचता है।

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खज़ाना खाली हो चुका है, क्या नौ लाख करोड़ रुपये की मुद्रा छापेगी सरकार?

अमेरिकी सरकार की एजेंसी USAID ने कहा है कि वह भारत को 2.9 मिलियन डॉलर देगी, वहीं वर्ल्ड बैंक ने मात्र 1 बिलियन डॉलर देने की बात्त कही है!

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कोरोना आर्थिक पैकेज की सीमाएं और कुछ कारगर तात्कालिक उपाय

एक करोड़ रुपये से ऊपर की कुल योग्य आय वाले कॉर्पोरेट की आयकर दर को 38% तक बढ़ा दिया जाना चाहिए

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सब कुछ ठप पड़ा है, फिर विश्व बैंक को ग्रोथ कहां दिख रही है?

इस बार सारा मामला मनोवैज्ञानिक है। कुछ तो जेनुइन भी है। हर आदमी को डर लग गया है कि कहीं मेरी ही मौत न हो जाए। इसके चलते एक दिमागी लॉकडाउन रहेगा लंबे समय तक। खेल, मनोरंजन, पार्टियां, सिनेमाहॉल, यात्रा, पर्यटन, सब कुछ पोस्टपोन हो जाएगा। लॉकडाउन उठ भी गया तो लोग खुद ही इस पर लगाम लगाएंगे। सबसे बड़ा सवाल शिक्षा का है कि स्कूल कॉलेज कब खुलेंगे।

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