तकनीक, समाज और राजनीति: जासूसी प्रकरण से उपजे कुछ बुनियादी सवाल

क्या पेगासस जैसे प्रकरणों में तकनीकी के सम्पूर्ण नकार का संदेश निहित है? समय उस पुरानी अवधारणा पर भी सवाल उठाने का है जो यह विश्वास करती है कि तकनीकी अविष्कार निष्पक्ष, निरपेक्ष और स्वतंत्र होते हैं तथा मनुष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार उनका अच्छा बुरा उपयोग करता है।

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स्कूली शिक्षा का गहराता संकट और डिजिटल स्पेस में लटके बच्चों का भविष्य

जब ऑनलाइन कक्षाओं के सुचारू संचालन के दावे केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा बड़े जोर-शोर से लगातार किए जा रहे हैं तब यह यह दुःखद एवं चिंतनीय स्थिति कैसे बन गयी है?

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विश्वगुरु का फर्जी ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’: घर में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने!

भारत को विश्व गुरु बनाना तो नहीं अपितु खुद को विश्व नेता के रूप में प्रस्तुत करना प्रधानमंत्री का लक्ष्य रहा है और उन्होंने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को देश पर इस तरह आरोपित कर दिया है कि आज देश जीवनरक्षक वैक्सीन की उपलब्धता के संकट से जूझ रहा है।

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प्रधानमंत्री राष्‍ट्रव्‍यापी लॉकडाउन के सवाल पर चुप क्यों हैं?

यह दावा कि पहला राष्ट्रव्‍यापी लॉकडाउन अनिवार्य था क्योंकि तब हम वायरस के विषय में कुछ जानते नहीं थे और इस 75 दिन की अवधि का उपयोग हमने तैयारी के लिए किया, जितना कमजोर है उससे भी ज्यादा नामुमकिन प्रधानमंत्री का आज का यह ख्वाब है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था की सेहत भी सुधारेंगे और देशवासियों की सेहत का भी ध्यान रखेंगे।

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कोविड से आज ये हाल न होता यदि सरकार ने चेताने वालों की बात सुन ली होती…

फरवरी और मार्च 2021 में जब देश बड़ी तेजी से कोविड-19 की दूसरी लहर की गिरफ्त में आता जा रहा था तब सरकार को इस विषय पर सलाह देने के लिए गठित नेशनल साइंटिफिक टास्क फोर्स ऑन कोविड-19 की कोई बैठक तक आयोजित नहीं हुई।

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‘दुनिया के मजदूरों एक हो’, लेकिन कैसे? भारत में श्रम के परिदृश्य पर एक नज़र

कोरोना से बचाव की हमारी यह कोशिशें हमारी आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप में व्यापक और कई क्षेत्रों में तो आमूलचूल परिवर्तन ला रही हैं। नयी कार्य संस्कृति तकनीकी के प्रयोग द्वारा एक ऐसी व्यवस्था बनाने की वकालत करती है जिसमें ह्यूमन इंटरफेस न्यूनतम हो। ऐसे में तकनीकी का प्रयोग धीरे-धीरे मनुष्य की भूमिका को नगण्य और गौण बना देगा।

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प्रेस की आज़ादी का सवाल अब पत्रकार बिरादरी की चौहद्दी के भीतर हल नहीं हो सकता

मीडिया, सत्ताधारी दल और सरकार के इस फ्यूज़न का परिणाम यह है कि प्रेस की स्वतंत्रता के संकट का समाधान अब प्रेस बिरादरी के आंतरिक उपचारों, उपायों और नियामकों द्वारा नहीं हो सकता। प्रेस की आजादी अब सम्पूर्ण परिवर्तन द्वारा ही संभव है। यह सत्ता परिवर्तन ही नहीं होगा बल्कि इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की ओर ले जाने वाला विचारधारात्मक परिवर्तन होगा।

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महामारी के बीच सम्पन्न हुए चुनाव, लेकिन चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका पर बात बाकी है!

जिस तरह से मद्रास हाईकोर्ट द्वारा चुनाव आयोग पर की गई तल्ख टिप्पणियों को मीडिया में स्थान मिला है और जनता के एक बड़े वर्ग द्वारा इनका स्वागत किया गया है इससे यह स्पष्ट होता है कि आम जनमानस भी कोविड-19 की दूसरी लहर के प्रसार के लिए चुनाव आयोग के अनुत्तरदायित्वपूर्ण आचरण को उत्तरदायी समझता है।

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विफल नेतृत्व की गलतियों का असर कम करने के लिए कब तक त्याग करती रहेगी जनता?

प्रधानमंत्री जी ने इस भीषण संकट काल में भी अपने मन की बात ही की। हो सकता है कि उनके काल्पनिक भारत की आभासी जनता को उनका यह एकालाप रुचिकर लगा होगा, लेकिन मरते हुए रोगियों और उनके हताश परिजनों के लिए तो यह एक क्रूर परिहास जैसा ही था।

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यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है… अश्रु स्वेद रक्त से, लथपथ लथपथ…

क्या हमें भी उन टीवी चैनलों सा संवेदनहीन हो जाना चाहिए जो जलती चिताओं के दृश्य दिखाते-दिखाते अचानक रोमांच से चीख उठते हैं- ‘’प्रधानमंत्री की चुनावी सभा शुरू हो चुकी है, आइए सीधे बंगाल चलते हैं।‘’

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