दो सदी के आदिवासी इतिहास पर शोध करने वाले इस युवा का कैद होना अकादमिक जगत का नुकसान है

हम महज़ उम्मीद कर सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट उसकी जिंदगी में ऐसा अनुकूल समय लेकर आए, उमर सहित उन तमाम युवाओं को रिहा करे जिन्हें अन्यायपूर्ण तरीके से कैद किया गया है, सिर्फ इसलिए कि वे अपने घरो और परिसरों से बाहर निकले और सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए। इनकी अकादमिक स्‍वतंत्रता स‍ुनिश्चित करने में न्‍यायपालिका का पक्ष निर्णायक होगा।

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राज्य-विभाजन की ओर बढ़ते झारखंड के भाषा आंदोलन को अतीत के आईने में कैसे समझें

भाषा, क्षेत्रीयता, धर्म, संप्रदाय, जातिवाद, राजसत्ता के ऐसे हथियार हैं जिसका समय-समय पर प्रयोग करके सत्ताएं जनता की एकता को तोड़ती रहती हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में क्षेत्रीयता के नाम पर दूसरे प्रान्तों के मजदूरों के साथ क्या हुआ था? इस घटना को बीते अभी बहुत साल नहीं हुए।

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जेट्टी पर ज़िंदगी: मलिम में मालिक और मछलियों के बीच खट रहे प्रवासी आदिवासियों की व्यथा-कथा

लॉकडाउन में समूचे देश की तरह मलिम जेट्टी की दुनिया भी उजड़ गयी थी। मज़दूर जैसे-तैसे घर पहुँचे थे। लॉकडाउन की बात निकलने पर मजदूरों के बीच एक उदासी छा जाती है। कोई उस दौर को नहीं याद करना चाहता है…

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आजकल गाँवों में उद्योग लगाने के लिए लोगों को आपस बाँट कर जमीन कैसे ली जाती है?

इस सब के बावजूद इस तरह की घटनाएं हुई हैं जब प्रभावित लोगों ने अपने बीच किसी तरह के विभाजन नहीं होने दिया और लगातार मिलकर परियोजना का विरोध जारी रखा। इस तरह की असाधारण स्थिति असाधारण समाधान की मांग भी करती है।

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आदिवासियों के लिए बिरसा भगवान क्यों हैं?

जिस समय महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी सरकार के खिलाफ लोगों को एकजुट कर रहे थे, लगभग उसी समय भारत में बिरसा मुंडा अंगग्रेजों-शोषकों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ चुके थे। गांधी से लगभग छह साल छोटे बिरसा मुंडा का जीवन सिर्फ 25 साल का रहा।

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राष्ट्रीय औसत से भी बदतर कैसे हो गयी झारखंड में कोरोना संक्रमण की तस्वीर?

संक्रमित होकर ठीक हो जाने वालों की राष्‍ट्रीय औसत 82.7 प्रतिशत है जबकि झारखंड में यह औसत 80.25 है। राज्‍य में कोरोना से मरने वालों की दर (1.38 प्रतिशत) भी राष्‍ट्रीय औसत 1.1 प्रतिशत से ज्‍यादा है।

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तस्करी के जाल से निकल के घर लौटी मुड़की को गरीबी के जंजाल से मुक्ति कौन दिलाएगा?

मैं मुड़की से दोबारा बात करने का प्रयास करने लगा। उससे एक अदभुत बात पता चली कि उसे गांव पसंद नहीं आ रहा है। उसे घर में रहना भी पसंद नहीं है। मुड़की बताती है कि दिल्ली में उसका जीवन बेहतर था, वहां उसे बेहतर खाना मिलता था और रहने के लिए भी अच्छी जगह थी।

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कोडरमा: एम्‍बुलेंस नहीं पहुंचने से महिला की मौत की खबर करने वाले पत्रकार और चैनल पर मुकदमा

मामला सतगावां थाने का है जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉक्टर चंद्रमोहन कुमार ने पत्रकार प्रवीण कुमार और न्यूज चैनल ‘आरपी भारत’ के खिलाफ आइपीसी की धारा 186, 505, 34 समेत कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कराया है।

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जिसकी दुकान पर पुलिसवाले पांच साल से चाय-पकौड़ी खा रहे थे, उसी को ईनामी नक्सली कह कर उठा लिया!

गिरिडीह एसपी और राजकुमार किस्कू के परिजनों के पास मौजूद सभी साक्ष्यों को देखने से तो यही लगता है कि पुलिस की कहानी में काफी झोल है और पुलिस की कहानी पर सवाल ही सवाल है।

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झारखंड: PESA कानून के तहत स्वशासन की आदिवासी परंपरा को पुनर्जीवित करने का मौका

प्रवासी मजदूरों के लिए जो कोई और सरकार न कर पाई वह मौजूदा झारखंड सरकार ने किया है वीर भारत तलवार (प्रभात खबर, 10-जून-2020) यह एक प्रतिष्ठित विचारक द्वारा झारखंड …

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