एक बीमार स्वास्थ्य तंत्र में मुनाफाखोरी का ज़हर और कोरोना काल का कहर

कोरोना एक त्रासदी के साथ-साथ सबक भी है कि हम अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को बाजार में मुनाफा कमाने वाला एक उद्योग न बनायें, बल्कि राष्ट्र को स्वस्थ और मजबूत नागरिक प्रदान करने वाली एक इकाई के रूप में विकसित करें. निजी चिकित्सा संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण किये जाने की सख्त जरूरत है और इलाज के खर्चे का भी एक मानक बनाया जाना चाहिए.

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तन मन जन: जन-स्वास्थ्य की कब्र पर खड़ी कॉरपोरेट स्वास्थ्य व्यवस्था और कोविड

मुनाफे के लालच में देश में गोबरछत्ते की तरह उगे पांच सितारा अस्पतालों की हकीकत को देश ने इस बार देख लिया। वैश्विक आपदा की इस विषम परिस्थिति में भी आखिरकार सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक एवं चिकित्साकर्मियों ने ही अपनी जान जोखिम में डालकर पीड़ितों की सेवा की और हजारों जानें बचायीं।

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विश्व स्वास्थ्य दिवस: एक साफ, स्वस्थ विश्व के निर्माण का संकल्प

गांधी जी ने कहा है कि स्वतंत्रता पाने के लिए व्यक्ति को इसके लायक बनना होता है और इसके लिए व्यक्तिगत अनुशासन, साफ सफाई, इन्सानियत आदि सबसे पहली जरूरत है।

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COVID-19 लॉकडाउन का एक साल पूरा होने पर मानव समाज के लिए एक घोषणापत्र

कोविड-19 की वार्षिकी पर, हमें निश्चित रूप से मनुष्य जीवन पर केंद्रित विश्व – परस्पर देखभाल, समानता और लोक सार्वभौमिकता से भरपूर दुनिया का निर्माण करना होगा।

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डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी सत्ता नहीं, जनता के प्रति हो! जनस्वास्थ्य पर भोपाल में व्याख्यान

डॉ. फड़के ने कोविड-19 एवं निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर नियंत्रण की जरूरत पर बोलते हुए प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र एवं चिकित्सा शिक्षा पर बढ़ते दाम एवं निजीकरण पर चिंता व्यक्त की। इस क्षेत्र में स्वनियंत्रण होना चाहिए। चिकित्सक एवं मरीज के संबंधों को व्यापारिक के स्थान पर सामाजिक होना चाहिए।

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बिल गेट्स की भविष्यवाणी के आईने में समझिए बजट 2021-22 में दर्ज “स्वास्थ्य संकट”!

बजट 2021-22 की अच्छी बातों में विश्व स्वास्थ्य संगठन का क्षेत्रीय रिसर्च सेन्टर खोलने के अलावा चार वायरोलॉजी प्रयोगशालाओं की स्थापना का लक्ष्य है। सरकार ने कहा है कि शुद्ध हवा के लिए विभिन्न योजनाओं पर 22 सौ करोड़ तथा स्वास्थ्य योजनाओं पर 64 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे। वित्त मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि कई स्तर पर हेल्थ केयर इंस्टिट्यूट की स्थापना की जाएगी। अलग से ‘‘मिशन पोषण 2.0’’ शुरू किया जाएगा।

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तन मन जन: नीति आयोग का ‘विज़न 2035’ और जनस्वास्थ्य निगरानी के व्यापक मायने

भारत में जन स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर आम लोगों को लग सकता है कि सरकार की यह पहल ‘‘स्वागतयोग्य’’ है लेकिन इसका निहित उद्देश्य और उसके पीछे का सच जानना भी जरूरी है।

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तन मन जन: स्वास्थ्य मौलिक अधिकार है, सरकार को बार-बार यह याद क्यों दिलाना पड़ता है?

सर्वोच्च न्यायालय ने कोरोना काल में इलाज के नाम पर लूट और मौत बांटते निजी अस्पतालों की मनमानी तथा राज्य सरकारों की लापरवाही आदि के मद्देनजर फिर से अनुच्छेद 21 का हवाला देकर स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य का अधिकार नागरिकों का मौलिक अधिकार और सरकारों की यह संवैधानिक जिम्मेवारी है।

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तन मन जन: ‘स्वास्थ्य की गारंटी नहीं तो वोट नहीं’- एक आंदोलन ऐसा भी चले!

भारत में जन स्वास्थ्य राजनीति का मुख्य एजेण्डा क्यों नहीं बन पाया? यह सवाल भी उतना ही पुराना है जितना कि देश में लोकतंत्र। आजादी के बाद से ही यदि पड़ताल करें तो लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा की मांग तो जबरदस्त रही लेकिन राजनीति ने लगभग हर बार इस मांग को खारिज किया। अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ तथा कई गैर सरकारी संगठनों ने अपने तरीके से जन स्वास्थ्य का सवाल उठाया, सरकारों ने महज नारों को स्वास्थ्य का माध्यम माना और संकल्प, दावे, घोषणाएं होती रहीं लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और है।

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तन मन जन: महामारी से भी बड़ी बीमारी है लॉकडाउन से उपजी गरीबी

कोरोनाकाल में सामूहिक तौर पर भारत के आम लोगों की स्थिति इसी मरणासन्न मरीज की तरह हो गई है जिसे अपनी जिन्दगी भी बचानी है। सवाल अस्तित्व का है। संकट विकट है।

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