तन मन जन: लाकडाउन का एक साल और निराशा के कगार पर खड़ी 130 करोड़ की आबादी

स्कूल बंद हैं। यातायात बाधित है। व्यापार लगभग ठप है। युवा तनाव में है। लोगों के आपसी रिश्ते दरक रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की निरंकुशता ज्यादा देखी जा रही है। लोगों की ऐसी अनेक आशंकाओं को यदि ठीक से सम्बोधित नहीं किया गया तो 130 करोड़ की आबादी में जो निराशा फैलेगी उसका इलाज इतना आसान नहीं होगा।

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तन मन जन: बिल गेट्स का ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ और नई दहशतें

ये रोग बीमारी से ज्यादा प्रोपगेन्डा की तरह फैलाए गए और इनके नाम पर बाजार (दवा कम्पनियां) ने कितना मुनाफा कमाया। आगे भी ऐसे हथकण्डे चलते रहेंगे मगर आप अपने को इतना जागरूक बना लें कि कोई कम्पनी आपको कम से कम बेवकूफ तो नहीं बना सके।

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बात बोलेगी: जनता निजात चाहती है, निजात भरोसे से आता है, भरोसा रहा नहीं, भक्ति कब तक काम आएगी?

विज्ञान से बेवफ़ाई करने पर सदियों से हमारे सनातनी समाज का कुछ नहीं बिगड़ा, तो छह सौ साल एक बाद प्रकट हुए एक हिन्दू राजा के शासनकाल में विज्ञान की परवाह करने की कौन ज़रूरत आन पड़ी? देखा जाएगा जो होगा सो, लेकिन अभी हमें बनती हुई वैक्सीन के जल्दी से जल्दी बन जाने के लिए ही कामनाएं करनी हैं।

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वैक्सीन पर घमासान सिर्फ सियासत में नहीं, विशेषज्ञों के बीच भी चल रहा है!

ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (एआईडीएएन) ने कहा है कि वह भारत बायोटेक के कौवैक्सीन को क्लिनिकल ट्रायल मोड के लिए एसईसी द्वारा की गई सिफारिश के बारे में जान कर हैरान है।

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तन मन जन: कोरोना के बाद अब उसकी वैक्सीन का डर!

कोरोना वायरस संक्रमण के वैश्विक प्रचार और दहशत के बाद अब जो चर्चा सरेआम है वह है इसके वैक्सीन से उपजी दहशत की। वैक्सीन की वैधता, गुणवत्ता तथा भविष्य में इसके दुष्‍परिणाम पर छिटपुट बहस के अलावा लगभग हर ओर चुप्पी है। सरकारें भी स्पष्ट नहीं हैं कि वैक्सीन सरकार लाएगी या बाजार। कीमत और उपलब्धता भी स्पष्ट नहीं है।

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तन मन जन: क्या आपको लगता है कि वैक्सीन लगाते ही ‘कोरोना प्रूफ’ हो जाएंगे? आप गलतफहमी में हैं!

जिसे भी देखिए वह थोड़े लापरवाह स्थिति में वैक्सीन के नाम से ही आश्वस्त है कि, ‘‘अब डर काहे का, वैक्सीन तो आ ही रही है।’’ ऐसा कहते चक्‍त यह भी जानिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन वैक्सीन को लेकर क्या कह रहा है। संगठन के हेल्थ इमरजेन्सी डायरेक्टर माइकल रेयान का वक्तव्य तो डराने वाला है। वे कहते हैं कि ‘‘हो सकता है हमें वायरस के साथ ही जीना पड़े।’’

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बेमौसम कुछ भी अच्छा नहीं होता, बारिश हो या खैरात!

अब यदि भविष्य में बरसात से पहले कहीं चुनाव का मौसम हो, तो संकल्प-पत्रों में मुफ़्त छाता, नाव और लाइफ जैकेट बांटने की घोषणाओं का सिलसिला शुरू हो सकता है. वैसे भी हमारे प्रधानजी को तो यह तक पता होता है कि कौन-कौन रेनकोट पहनकर नहाता है देश में. उनके लिए रेनकोट को भी मुफ्त वाली सूची में शामिल किया जा सकता है.

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तन मन जन: क्लिनिकल ट्रायल की भयावह हकीकत और वैक्सीन के खोखले वादे

भारत ऐसे ही मनमाने क्लिनिकल ट्रायल्स के लिए सबसे ज्यादा अनुकूल देश था। सन् 2011 में मध्यप्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज में मानसिक रूप से अस्वस्थ 241 लोगों पर एक बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनी के क्लिनिकल ट्रायल में काफी गड़बड़ियों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर भारत सरकार को सख्त गाइडलाइन बनाने का आदेश दिया था। इस सख्ती के बाद भारत में क्लिनिकल ट्रायल के धंधे में काफी मंदी आ गयी।

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तन मन जन: कोरोना वायरस संक्रमण की विभीषिका और दवा व्यापार का खेल

अलग-अलग देशों में ID2020 को लागू करने के लिए अलग-अलग संस्थाओं को चुना गया है लेकिन भारत में यह रिलायन्‍स जियो के द्वारा किया जा रहा है।

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