छोड़कर मत जाओ बिजूका: तैलचित्रों में उभरते खेती-किसानी के संकट से एक सृजन संवाद

वह सपने संजोते रहता है कि माँ के सुनहरे आँचल में रंग-बिरंगे अंकुर अंकुरित होंगे और वह उस आँचल की छाँव में सुकून से आराम करेगा। इस तरह उसकी दुनिया लह-लहा उठेगी। लेकिन हकीकत तो कुछ और ही है – निरंतर प्रकृति की लूट-खसोट और जलवायु परिवर्तन की मार किसान ही झेल रहा है। साथ ही इसके सत्ता को संचालित करने वाली ताकतों याने कॉर्पोरेट घरानों के कृषि के काले कानूनों से भी।

Read More

आत्महत्या पर NCRB के नये आंकड़ों में विश्‍वगुरु बनता भारत, हर घंटे 15-16 खुदकुशी

एनसीआरबी के अनुसार पिछले वर्ष 2019 में 1.39 लाख से ज्यादा लोगों ने आत्महत्या की है और वर्ष 2018 की तुलना में इसमें 3.42% की वृद्धि हुई है। 2017 में जहां प्रति लाख आबादी में 9.9 लोग आत्महत्या कर रहे थे, वहीं आज 10.4 लोग आत्महत्या कर रहे हैं। मोदीकाल की यह सर्वाधिक दर है।

Read More

GDP के ऐतिहासिक पतन के बीच कृषि क्षेत्र में वृद्धि के क्या मायने हैं?

पिछले तीन दशकों में इस देश के किसानों ने लाखों की संख्या में आत्महत्या की है और दूसरी ओर देश के विकास में उद्योग और सेवा क्षेत्र का प्रतिशत बढ़ता गया है। चूँकि नब्बे के बाद मूलतः पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली देश में लागू करने की कोशिश की गई, इसलिए जब जब पूँजीवाद आर्थिक मंदी का शिकार हुआ है, तब उसके उत्पादन की श्रृंखला टूट गई है।

Read More