बनारस के मुसहर गांवों में चिंता का सबब बन रहा है कुपोषण का दोहरा बोझ

यदि कुपोषित बच्चों को उनके आरंभिक जीवन में अपर्याप्त पोषण प्राप्त होता है, तो ऐसे बच्चों को कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण एनसीडी का ज्‍यादा खतरा होता है बजाय उनके जो पर्याप्त पोषण प्राप्त करते हैं। अवरुद्ध बच्चे, बाद में जीवन में यदि सामान्य पौष्टिक भोजन के बजाय उच्च वसा, नमक और चीनी वाले अनियमित अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन और पेय का सेवन करते हैं, तो मोटापे के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं और बाद में उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोगों जैसे असंचारी कार्डियो-वैस्कुलर रोगों में एक या अन्य रूप का उन्‍हें सामना करना पड़ सकता है।

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बिखर गया संतोषी का परिवार, पांच साल पीछे चली गई लीलावती! लॉकडाउन की बरसी पर…

यह ऐसा समय था कि गांव के लोग किसी की भी मदद नहीं करते थे जबकि करोना से पहले गाँव में ऐसा नहीं होता था। लोग एक दूसरे की मदद बडे़ ही सरलता से करते थे, लेकिन यह करोना तो हम मजदूरों की स्थिति को एक दम से झकझोर दिया। हम गरीब मजदूर इस करोना की मार खाकर कम से कम पाँच साल पीछे हो गये।

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सोनभद्र के आदिवासी नरसंहार तक जाती हैं बनारस के मुसहरों के अंकरी कांड की जड़ें

बनारस के कोइरीपुर में मुसहर समुदाय की भूख के सवाल पर सरकार की खूब छीछालेदर हुई। लॉकडाउन के दौरान अंकरी प्रकरण को लेकर जिस वक्त विपक्ष, सत्तारूढ़ दल को घेरने …

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काशी की इस सामुदायिक रसोई में पक रहा है सामाजिक और जातिगत सौहार्द का पकवान

आज रोज़ दो टाइम तीन तीन सौ खाने के पैकेट तैयार किए जा रहे हैं और गरीब, दलित, पिछड़ों के घर घर भेजे जा रहे हैं। आगे की योजना और दिलचस्प है। न्यास अब लॉकडाउन से पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर काउंसलिंग का काम शुरू करने वाला है।

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