ऐसी कौन सी मजबूरी थी कि लाशों के ढेर पर सम्पन्न कराया गया यूपी का पंचायत चुनाव?

वहां किसी तरह की कोई सोशल डीस्टेंसिंग नहीं थी, बहुत सारे लोग वहां बिना मास्क के घूम रहे थे, सामग्री वितरण, हस्ताक्षर करते समय लोग एक दूसरे के ऊपर चढ़ जा रहे थे। मैं क्या कोई भी चाह कर भी किसी तरह की सोशल डिस्टेंसिंग नहीं रख सकता था। यहीं से मुझे कोरोना से मरने वाले शिक्षकों के कारण नजर आने लगे।

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क्या कोविड-19 का अंतराल अध्यापकों के लिए नया अंधेरा लेकर आया है?

चुनाव में तैनात शिक्षकों के प्रशिक्षण से लेकर चुनाव किस तरह संपन्न कराए गए, अगर किसी ने इन्हें देखा होता तो वह बता सकता है कि राज्य चुनाव आयोग के अधिकारियों ने इन चुनावों के दौरान कितनी लापरवाही एवं बेरुखी का परिचय दिया।

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