गरीबी सिर्फ आर्थिक नहीं, सोशल जस्टिस का भी मसला है!
अगर सीधे कहा जाए तो यही कि ग़रीबी एक ऐसा जाल है जो खुद को ही दोबारा रिप्रोड्यूस करता रहता है। कहना बस यही है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट या GDP का बढ़ना ही ग़रीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।
Read MoreJunputh
अगर सीधे कहा जाए तो यही कि ग़रीबी एक ऐसा जाल है जो खुद को ही दोबारा रिप्रोड्यूस करता रहता है। कहना बस यही है कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट या GDP का बढ़ना ही ग़रीबी को ख़त्म नहीं कर सकता।
Read More
जो समूह आज देश में प्रभावी है, उसका मुख्य उद्देश्य जनता को अलग-थलग करना और सभी संभावित धन (खनिज धन, भूमि पूंजी और अवसर) पर कब्जा करना है, जो भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।
Read More
अगर ब्राह्मणों को मुसलमानों से कोई समस्या होती तब मुसलमानों से दूरी बनाने के बाद अखिलेश यादव को ब्राह्मणों ने वोट दिया होता जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ। जाहिर सी बात है अखिलेश यादव ब्राह्मणों का मूड समझने में चूक गए। ब्राह्मण समुदाय को मुसलमान विरोधी साबित करने की एक असफल कोशिश अखिलेश यादव ने की है।
Read More
यह आदेश सामाजिक न्याय का गला घोंटने वाला साबित होगा। इसका असर उन छात्र-छात्राओं पर भी पड़ेगा जो अनारक्षित श्रेणी से आते हैं, लेकिन शहरी छात्रों से थोड़ा सा पीछे होते हैं।
Read More
सवाल यह नहीं है कि लोकतांत्रिक पद्धति में मुसलमानों की हैसियत खत्म हो गयी है या नहीं हो पायी है। सवाल यह है कि मुसलमानों की हैसियत कितनी रह गयी है? और इसका जवाब यह है कि मुसलमानों की हैसियत पिछले सात वर्षों में बिहार व उत्तर प्रदेश के यादवों, हरियाणा के जाटों, महाराष्ट्र के महारों और उत्तर प्रदेश के जाटवों से थोड़ी ज्यादा ही बुरी है।
Read More
क्या चुनावी राजनीति में दलों द्वारा सत्ता के बदलाव से समाज की नैतिक न्यूनतम जरूरतें पूरी होती या हो सकती हैं? हो सकती हैं अगर चुनाव सिर्फ सत्ता हासिल करने मात्र का जरिया न हों। जनता के प्रति उत्तरदायित्व निर्वहन के लिए हों। इसलिए उन वास्तविक तत्वों को समझना जरूरी है जिनके आधार पर नैतिक न्यूनतम के लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
Read More
वे ऐसी शख्सियत हैं जिसने करोड़ों लोगों की जिंदगी को कई तरह से प्रभावित किया है- सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से। बहुसंख्य अल्पसंख्यकों, पिछड़ों व दलितों में उनकी छवि मसीहा की है तो सवर्णों, थिंक टैंक, मीडिया, इंटेलीजेंसिया में वह आंबेडकर के बाद भारतीय समाज के सबसे बड़े खलनायक हैं। आज उसी लालू यादव की 74वीं वर्षगांठ है।
Read More
हमें यह भी याद रखने की जरूरत है कि अर्नब गोस्वामी के निजी मोबाइल का कोई भी चैट अभी तक सामने नहीं आया है। जब वे चैट बाहर आएंगे तब पता नहीं उसमें और कितने लोगों से कितनी तरह की सूचनाओं के आदान-प्रदान का पता चलेगा!
Read More
क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है। या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो।
Read More
चौधरी चरण सिंह को जनसामान्य ‘किसान मसीहा’ और भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री के तौर पर तो जानता है लेकिन कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व को उनके मूल विचारों और कृतित्व से उलट ही जानता और समझता आया है।
Read More