राग दरबारी: मुद्दों के दौर में सामाजिक न्याय की दिशाहीन राजनीति

क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है। या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो।

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जातिवाद, ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ सामाजिक न्याय का एक किसान-बहुजन योद्धा

चौधरी चरण सिंह को जनसामान्य ‘किसान मसीहा’ और भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री के तौर पर तो जानता है लेकिन कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व को उनके मूल विचारों और कृतित्व से उलट ही जानता और समझता आया है।

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हिन्दी पट्टी के किसान आंदोलनों को कैसे निगल गयी मंडल की राजनीति और उदारीकरण

औपनिवेशिक काल और आजादी के बाद के पांच दशकों तक इन दोनों प्रदेशों में किसान आंदोलन जिंदा रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों खासकर 1990 के बाद इन प्रदेशों में किसान आंदोलन के कोमा मे चले जाना एक पूरी प्रक्रिया का परिणाम है।

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The Indian Express की खबरों में जाति की महीन कारीगरी और न्यूज़रूम में डायवर्सिटी की ज़रूरत

कायदे से जिस किसी ने भी इस खबर को लिखा है या लिखवाया है, उसे दोनों ही मामले में आरोपितों की जाति का या तो जिक्र करना चाहिए था या फिर किसी में नहीं करना चाहिए था।

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बिहार चुनाव: सामाजिक न्याय का घोषणापत्र

ब्राह्मणवादी सवर्ण पुनर्उत्थान के दौर में सामाजिक न्याय की पार्टियों ने पूर्णतः समर्पण कर दिया हो तो केवल ‘भाजपा हराओ’ के नारे के साथ भाजपा विरोधी गठबंधन के पीछे खड़ा नहीं हुआ जा सकता है बल्कि बहुजन आंदोलन का स्वतंत्र हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है.

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क्या लालू और उनकी पार्टी का राजनीतिक शुद्धिकरण कर रहे हैं तेजस्वी?

ऐसा पहली बार है जब बिहार के चुनाव में बात नौकरी और रोजी-रोटी की हो रही है और ये सब उस पार्टी से हो रही है जिसके सरकार पर बिहार में जंगलराज लाने का आरोप लगाया जाता रहा है. अचानक से चुनावी पोस्टर-बैनर और पर्चे से लालू का गायब हो जाना क्या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर राजद में लालू युग का ‘द एंड’ हो गया है?

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हिंदुत्‍व की सांस्‍कृतिक गुलामी से आज़ादी का रास्‍ता पेरियार ललई सिंह से होकर जाता है

ललई सिंह जी ने अपने वक्तव्य, कृतित्व, रचना, और प्रयासों से हजारों साल की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक गुलामी से मुक्ति का रास्ता प्रशस्त किया। 80 और 90 के दशक तथा इक्कीसवीं सदी में उनके वारिसों ने उसके खिलाफ जाते हुए पूरी तरह से उस सामाजिक आंदोलन एवं जन जागरूकता के लंबे कार्यक्रम को रोक सा दिया है।

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राग दरबारी: क्या पिछड़ों की राजनीति खत्म हो गयी है?

1990 में मंडल लगने से पहले पिछड़ा नेतृत्व का एक रुतबा था. मंडल लागू होने के बाद सवर्ण सत्ता को पिछड़ों से डर लगने लगा था, लेकिन 25 साल के भीतर पूरा का पूरा पिछड़ा नेतृत्व दीन-हीन अवस्था में पहुंच गया है.

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बी.पी. मण्‍डल: एक मुसहर को सांसद बनाने वाला ओबीसी समाज का मसीहा

सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई के तत्कालीन नेतृत्वकर्ता बी. पी. मण्डल का जन्म 25 अगस्त, 1918 को बनारस में हुआ था। बी. पी. मण्डल का जन्म जब हुआ तो उनका परिवार बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहा था।

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राग दरबारी: कमंडल और मंदिर के बीच दम तोड़ता सामाजिक न्याय

क्या कारण रहा कि एक समय अछूत सी रही भाजपा आज देश में सबसे मजबूत ताकत है? सवाल यह भी है कि जो सामाजिक और राजनीतिक विरासत इतनी मजबूत थी, वह 25 साल के भीतर ही इतनी बुरी तरह क्यों बिखर गयी और हिन्दुत्ववादी ताकतों को क्यों चुनौती नहीं दे पायी?

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