भाजपा और संघ की असली समस्या कांग्रेस और ‘परिवार’ नहीं बल्कि देश की जनता है!

‘विश्व गुरु’ बनने जा रहे भारत देश के प्रधानमंत्री को अगर अपना बहुमूल्य तीन घंटे का समय सिर्फ़ एक निरीह विपक्षी दल के इतिहास की काल-गणना के लिए समर्पित करना पड़े तो मान लिया जाना चाहिए कि समस्या कुछ ज़्यादा ही बड़ी है।

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इतिहास में किस रूप में याद की जाएंगी लता मंगेशकर?

दुनिया में आज तक किसी विचारहीन कलाकार ने इतिहास में स्थान नहीं बनाया है, चाहे वह अपने जीवन-काल में कितना भी महान क्यों न लगता रहा हो। लता के गीत भले ही कुछ अरसे तक जीवित रहें, लेकिन एक कलाकार के रूप में लता इतिहास के कूड़ेदान में वैसे ही जाएंगी, जैसे कोई टूटा हुआ सितार जाता है, चाहे उसने अपने अच्छे दिनों में कितने भी सुंदर राग क्यों न निकाले हों।

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क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?

इतिहास के नए पाठ में इस बात को बार-बार रेखांकित किया जा रहा है कि सावरकर के माफीनामे जेल से बाहर निकलकर पुनः क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने का मौका प्राप्त करने की रणनीति का हिस्सा थे। यह देखना रोचक होगा कि सेल्युलर जेल से रिहा होने के बाद सावरकर के साथी क्रांतिकारियों का जीवन किस प्रकार बीता।

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शहीद उधम सिंह के शहादत दिवस को ‘साम्राज्यवाद विरोधी दिवस’ के रूप में मनाया गया: SKM

किसानों पर तरह-तरह के झूठे और मानहानिकारक आरोप लगाने के बाद, “अय्याशजीवी” एक नया प्रयास है – लाखों मेहनती, शांतिपूर्ण और दृढ़ किसानों की सच्चाई इन प्रयासों से दबाया नहीं जा सकता है – किसानों के सत्य पर आधारित यह आंदोलन विजयी होगा।

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इमरजेंसी: पचीसवीं वर्षगांठ मनाने के भाजपा के फैसले को स्वामी ने ‘हास्यास्पद’ क्यों लिखा था?

सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने इस लेख में बताया है कि कैसे आरएसएस के नेता माधवराव मुले ने नवंबर 1976 के शुरुआती दिनों में उनसे कहा कि वह विदेश चले जाएं क्योंकि संगठन ने इंदिरा गांधी के सामने आत्मसमर्पण करने से संबंधित दस्तावेज तैयार कर लिया है। इस दस्तावेज़ पर जनवरी 1977 में हस्ताक्षर हो जाएगा और फिर ‘इंदिरा और संजय को तुष्ट करने के लिए तुम्हें बलि का बकरा बनाया जाएगा क्योंकि तुमने विदेशों में इनके खिलाफ काफी दुष्प्रचार किया है।’

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बात बोलेगी: खुलेगा किस तरह मज़मूं मेरे मक्तूब का या रब…

जिसके कहे पर देश चलने लगा था या उतना तो चलने ही लगा था जितनों की उँगलियों में देश की बागडोर सौंपने का माद्दा था, आज वे उँगलियां उस नीली स्याही को कोसती नज़र आ रही हैं जिसे वोट करते वक्‍त उन्‍होंने लगवाया था। ऐसी हर कम होती उंगली का एहसास इस विराट सत्ता को हो चुका है।

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राजपथ के रंगीन सपनों में खलल के बीच छवि बनाने का ‘संघठनात्‍मक’ अभियान

राजा और प्रजा के बीच उत्पन्न हुआ विश्वास का संकट उन रंगीन सपनों में ख़लल डाल सकता है जो नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के बीच राजपथ पर आकार ले रहे हैं। सारी परेशानी बस इसी बात की है।

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सांप्रदायिक माहौल में चुनावी हार-जीत का मतलब: संदर्भ पश्चिम बंगाल

जब सांप्रदायिक और नफ़रत की राजनीति के पक्ष में हम वोट देते हैं तो दरअसल हम उन्हें चुन रहे होते हैं। ऐसा करते हुए हम अपनी सांप्रदायिक सोच के मुताबिक काम कर रहे होते हैं। इसलिए सांप्रदायिकता के विरोध में खड़े हर किसी को इस खतरे को पहचानना होगा।

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कुशाभाऊ के भतीजों की मौत और ‘गैंगस्टर पूंजीवाद’ में बदल चुके एक विचार की जकड़बंदी

भाजपा के पितृपुरुष के परिवारीजन सही इलाज के बिना तड़प-तड़प कर मर गए।
पता नहीं, बैकुंठ में बैठे कुशाभाऊ ठाकरे क्या सोच रहे होंगे इस पर। उन्होंने अपने जीवन और चिंतन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा राम मंदिर आंदोलन में लगाया था। क्या उनके मन में आ रहा होगा कि जितनी ऊर्जा मन्दिर के लिये लगायी, अगर उतनी ऊर्जा देश और राज्य के अस्पतालों की दशा सुधारने के लिए लगाते तो आज उनके भतीजे अकाल मौत न मरते…?

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हिन्दुत्व के जनक तो हुगली में हुए, फिर सावरकर की फोटो लगाकर संघ क्या जाली हिन्दुत्व बेचता रहा?

यह बार-बार कहा जाने वाला झूठ है कि हिंदुत्‍व के जनक विनायक दामोदर सावरकर थे। जब चंद्र नाथ बसु हिंदुत्‍व पर किताब लिख रहे थे, तब हिंदू महासभा और बाद में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की बुनियाद डालने वाले महान व्‍यक्तित्‍वों में वरिष्‍ठतम बीएस मुंजे 20 साल के थे, सावरकर महज नौ साल के थे, हेडगेवार तीन साल के थे और गुरु गोलवलकर तो पैदा भी नहीं हुए थे।

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