मुसलमानों पर मोहन भागवत के बयान और दशहरे पर देवबंद दौरे की संभावना में छुपे सूत्र

से दारूल उलूम देवबन्द के सदर मुदर्रिस एवं जमीअत उलमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी अचानक संघ के दिल्ली स्थित कार्यालय पर पहुँच गए थे इसी तरह देवबन्द भी एक रोज़ सुर्ख़ियों में आए कि अचानक संघ प्रमुख मोहन भागवत पहुँचे देवबन्द और की मुलाक़ात देवबन्द दारूल उलूम देवबन्द के मोहतमिम सहित अन्य इस्लामिक विद्वानों से। आज के हिसाब से संघ प्रमुख मोहन भागवत का देवबन्द जाना बहुत बड़ी बात होगी।

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चुनावीबिहार-3: ज्यादा दिमाग मत लगाइए, बस महीने भर की बात है…!

भाजपा में कम्युनिकेशन-गैप इतना बढ़ गया है कि अब सरेआम-सरेशाम जूतमपैजार हो रही है, लट्ठ बरस रहे हैं। परसों भाजपाइयों ने पप्पू यादव की जाप (जन अधिकार पार्टी) के कार्यकर्ताओं की तुड़ाई की, तो आज अपने ही मंत्री विजय कुमार सिन्हा के मुर्दाबाद के नारे बुलंद कर दिये।

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“सरकार के खिलाफ़ गुस्सा बढ़ रहा है, अन्ना आंदोलन के सबक और घुसपैठियों के प्रति सतर्क रहें लोग”!

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के अधिनायकवादी प्रोजेक्ट के विरुद्ध व्यापक आंदोलन के साथ ही समाज के राजनीतिकरण पर सर्वाधिक जोर देना होगा और सामाजिक संतुलन को बदलना होगा।

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काशी मथुरा बाकी है: धर्म की राजनीति के खिलाफ अगली बार क्‍या हिंदू खड़े होंगे?

हिन्दुओं की आस्था के अनुसार राम, शिव और कृष्ण सबसे प्रमुख देवता हैं. इस तरह धार्मिक दृष्टि से अयोध्या (राम), वाराणसी (शिव) और मथुरा (कृष्ण) आस्था के तीन केन्द्र हैं और इन्हें मुक्त कराना आवश्यक है

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चुनावीबिहार-1: भाजपा के एप्‍पल और ब्‍लूटूथ में फंसी संघ की धोती

भाजपा में ओल्ड गार्ड के नाम पर संघ के धोतीछाप प्रतिनिधि हैं, तो चुनावी कमान युवा एप्पलधारी रंगरूटों ने संभाल रखी है। यहां कम्युनिकेशन गैप की वजह से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ रहा है। भाजपा ने कॉरपोरेट स्टाइल में पूरे चुनाव को रंग दिया है।

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दक्षिणावर्त: आज़ादी के 73 वर्ष, कुछ मील के पत्थर और…

इस्लाम को भारतीयता के अनुकूल न ढालकर फिलहाल हमारे समय की दो बड़ी विचारधाराएं एक ही गलती कर रही हैं। यह गलती भारत को भारी पड़ने वाली है।

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भारत छोड़ो आंदोलन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सैद्धांतिक असहमतियाँ क्या थीं?

सावरकर गांधी जी की अहिंसक रणनीति से इस हद तक असहमत थे कि गांधी जी की आलोचना करते करते कई बार वे अमर्यादित लगने वाली भाषा का प्रयोग करने लगते थे। सावरकर की पुस्तक गांधी गोंधल पूर्ण रूप से गांधी की कटु आलोचना को समर्पित है।

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छान घोंट के: रात राम सपने में आए…

यही सब सोचते हुए और राम को याद करते-करते मैं भी पूरे देश की तरह सो गया. तभी अचानक राम-राम कहते हुए राम जी मेरे सपने में आए. बोले, “कैसे हो ‘प्रच्छन बौद्ध’ रघुवंशी? हमें क्यों याद किया?”

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नीति से अधिक नीयत पर निर्भर है भारतीय शिक्षा का भविष्य

लोकतंत्र और हमारी समावेशी संस्कृति से जुड़ी मूल अवधारणाओं के माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम से विलोपन की कोशिश शायद इसलिए की जा रही है कि आने वाली पीढ़ी यह जान भी न पाए कि उससे क्या छीन लिया गया है।

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महाबंदी, महामारी, मज़दूर और मुग़ालते

ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।

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