स्थायी समिति की संस्तुति की रोशनी में ‘भाजपा हराओ’ का नारा कहीं गलत तो नहीं साबित हो गया?

किसान आंदोलन को अब यह भी महसूस करना होगा कि सरकार के अड़ियल रवैये के पीछे उसके सामने मौजूद यह तथ्य भी रहे होंगे कि कम या अधिक पूंजीपतियों की झूठन से अन्य राजनीतिक दलों के हाथ भी गंदे हैं।

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सौ दिन छूते किसान आंदोलन के बीच तीन कृषि कानूनों को फिर से समझने की एक कोशिश

यह एक संवैधानिक प्रश्न भी है। कारण है कि कृषि राज्य और केंद्र दोनों का विषय है और यह समवर्ती सूची में आता है। एपीएमसी कानून को पारित करना राज्यों का अधिकार है। इसलिए यह कानून तो असंवैधानिक भी हो सकता है।

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दिशा रवि की गिरफ्तारी निंदनीय, सर छोटूराम की याद में कल कई कार्यक्रम: SKM

केंद्र द्वारा लाये गए तीन कृषि कानून किसानों के लिए न सिर्फ MSP के लिए एक बड़ा खतरा है बल्कि इसके बजाय खुले बाजारों के सहारे खेती को ज्यादा जोखिम भरा बनाते हैं। ऐसी स्थिति में, किसानों द्वारा सततपोषणीय कृषि प्रथाओं को अपनाने की संभावना कम है। यह व्यवहार्यता और स्थिरता के बीच अंतर-संबंध है जिसे दिशा रवि जैसे कार्यकर्ताओं ने किसानों के समर्थन में विस्तार में समझा है।

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कृषि कानूनों की वापसी के लिए IPF कार्यकर्ताओं ने PM को भेजा ज्ञापन

केन्द्र की मोदी सरकार इन कानूनों के बारे में लगातार देश को गुमराह कर रही है कि इनमें काला क्या है। जबकि सभी लोग बखूबी जानते है कि ये कानून देशी विदेशी कारपोरेट घरानों के लाभ के लिए ही बनाए गए है और इनसे हमारी देश की आर्थिक सम्प्रभुता तहस नहस हो जायेगी और खेती किसानी बर्बाद हो जायेगी।

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आज बिजलीकर्मियों की देशव्यापी हड़ताल, 10 फरवरी तक चलेगा जन जागृति अभियान : AIKSCC

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 3 फरवरी को बिजली कर्मियों और इंजीनियरों द्वारा बिजली क्षेत्र के निजीकरण,लेबर कोड लागू किये जाने , उपभोक्ताओं की लूट और किसानों की सब्सिडी खत्म किए जाने के खिलाफ की जा रही एक दिवसीय हड़ताल का समर्थन करते हुए सरकार से बिजली संशोधन बिल वापस लेने की मांग की है।

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दो महीने से चल रहे किसान आंदोलन को समझने के लिए कुछ ज़रूरी बिन्दु

इस समय इस आंदोलन पर बहुत सारे विश्लेषण आ रहे हैं लेकिन उन्हीं विद्वानों के विश्लेषणों पर ध्यान दें जो पिछले कई दशकों से किसानों के हित की बात कर रहे हैं। कॉरपोरेट घरानों के शुभचिंतक विद्वानों के नजरिये को पढ़ते समय भी इन विश्लेषणों की रोशनी में ही उनकी परख करें।

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“मोदीराज: नाम किसान विधेयक, फायदा पूंजीपतियों का”: कृषि कानूनों पर जनज्वार की जनता बुकलेट

पुस्तिका तैयार करने में जनता के अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार और पटियाला यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बलविंदर सिंह तिवाना का विशेष सुझाव रहा है।

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किसान आंदोलन: सुप्रीम कोर्ट की बनायी कमेटी से भूपिंदर मान ने नाम वापस लिया

मान के पक्ष का असली पता 1 सितम्‍बर, 2020 को प्रधानमंत्री लिखे उनके एक पत्र से लगता है जिसमें उन्‍होंने कृषि कानूनों पर अपनी आपत्ति जतायी थी और तीन सुझाव दिए थे।

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AIPF के आह्वान पर पूरे UP में जलायी गईं नये कृषि कानूनों की प्रतियां

कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह देश के आम नागरिकों की समझ से परे है कि देश की खेती किसानी को तबाह करने वाले कानूनों को रद्द करने और किसानों की फसल के वाजिब मूल्य के लिए कानूनी गारंटी सरकार दे, इस छोटी सी भी मांग मानने के लिए सरकार तैयार क्यों नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट की बनायी कमेटी के सारे सदस्य कृषि कानूनों का पहले ही समर्थन कर चुके हैं!

समिति वही राय देगी जो सरकार चाहती है। अब किसानों को आंदोलन खत्म करना होगा वर्ना लोग कहेंगे कि किसान सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मानते। कुछ दिन के अंतराल के बाद नया कानून फिर लागू हो जाएगा

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