मेरा मुखिया कैसा हो? पंचायत चुनावों के मुहाने पर खड़ी हिन्दी पट्टी से जमीनी आवाज़ें

पंचायत चुनावों को निचले दर्जे का समझना भूल हो सकती है। आखिर ये ग्रामीण समझ और ग्रामीण विकास का मामला है। इस बार लगता है कि बात कुछ और होगी क्योंकि ग्रामीण जनता पिछले चुनावों से काफी सबक ले चुकी है। इस बार वे ये नहीं चाहते कि कोई भी आए और मुखिया का पद संभाल ले। इस बार जनता चाहती है कि उनका मुखिया ऐसा हो जो साक्षर हो, जनता को समान दृष्टि से देखता हो, भेदभाव कम करता हो, स्थानीय स्तर पर रोज़गार और दूसरी योजनाओं के क्रियान्वयन में जनता की भागीदारी और सबसे अहम् ग्रामसभा और समितियों के संचालन और ग्रामीणों को आ रही समस्याओं के समाधान की पहल करने योग्य हो। लोग ऐसे ही प्रत्‍याशियों को अपना समर्थन देंगे।

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भूखे पेट, खाली खाता, सूनी थाली! मिड डे मील का राशन और पैसा बन गया ‘आपदा में अवसर’

सरकार का दावा है कि उसने तो बहुत पहले ही पके हुए मध्याह्न भोजन या फिर उसके बदले की राशि बच्चों के खाते में डाल दी है, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है।

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गाहे-बगाहे: वह आके ख्वाब में तस्कीने इज्तराब तो दे…

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि अगर पचास फीसदी भारतीय शी जिनपिंग को पसंद करने लगेंगे तो क्या होगा? मोदी जी और उनके भक्त क्या सोचेंगे? उन्हें कैसा लगेगा?

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ओडिशा के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्र कटक में लोग शहरी रोजगार गारंटी की मांग क्यों कर रहे हैं?

विभिन्न आय वर्गों के लिए लॉकडाउन से पहले मासिक प्रतिव्यक्ति आय और लॉकडाउन के दौरान मासिक प्रतिव्यक्ति आय के अनुपात को यदि हम देखें, तो हम पाते हैं कि यह अनुपात शीर्ष 20 फीसदी परिवारों के लिए महज 35 फीसदी है जबकि सबसे नीचे के 20 फीसदी परिवारों के लिए यह 85 फेससदी तक जाता है

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दो-तिहाई लोगों का छिना रोजगार, आधी आबादी के पास हफ्ते भर जीने का पैसा नहीं: सर्वे

सर्वे में स्व-रोजगार, दिहाड़ी मजदूर और नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति का अध्ययन किया गया है

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