राग दरबारी: नैतिकता की नंगी चौकी, मेहता मास्टर की चादर और गयादीन का सबक

आज जब हमारे देश में एक आदमी की औसत आय साढ़े दस हजार (1 लाख 26 हजार 968 रुपए सालाना) रुपए प्रति महीने के करीब है तो हमारे देश में प्रोफेसरानों को तकरीबन ढाई लाख रुपए हर महीने मिलता है, फिर भी वे पब्लिक विश्वविद्यालय को छोड़कर निजी विश्वविद्यालय की तरफ दौड़े जा रहे हैं।

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राग दरबारी: बिहार में पिछड़ों की राजनीति किसके इर्द-गिर्द घूम रही है?

आज के हालात में विधानसभा में आए परिणाम के बाद नीतीश व कुशवाहा दोनों को लग गया है कि गैर-राजद पिछड़ों का पूरा का पूरा जनाधार कहीं बीजेपी में शिफ्ट न हो जाए।

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राग दरबारी: चुनी हुई कोई भी सरकार कानून वापस नहीं लेती, इसीलिए सरकारों को हटाना पड़ता है!

यह पहली बार नहीं है कि सरकार आंदोलनकारियों की बातों के प्रति इतनी बेरूखी से पेश आ रही है। पिछले तीस वर्षों के भारतीय राजनीतिक इतिहास पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि सरकार चाहे जो भी हो एक बार जब कोई बिल पास करवा लेती है या फिर वैसा कोई निर्णय ले लेती है तो उससे पीछे नहीं हटती है, भले ही जनता जो भी मांग करती हो या फिर विपक्षी दल उसका जिस रूप में भी विरोध कर रहे हों।

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राग दरबारी: किस्से और हकीकत के बीच इमरजेंसी

कृष्ण कौशिक तो सूचना व मीडिया की बीट कवर करने वाले पत्रकार हैं इसलिए उन्‍हें यह खबर लिखने की जरूरत पड़ी होगी, लेकिन रितु सरीन तो इन देश की जानी-मानी खोजी खबर करने वाली पत्रकार हैं। क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि जब भी ईडी या सीबीआई किसी के घर या दफ्तर पर छापे मारती है (अगर वह जेनुइन छापे भी हों) तब उस व्यक्ति का फोन व लैपटॉप सबसे पहले अपने कब्जे में ले लेती है?

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राग दरबारी: मुद्दों के दौर में सामाजिक न्याय की दिशाहीन राजनीति

क्या कारण है कि जिस राम मनोहर लोहिया के नाम पर वे राजनीति चला रहे हैं उनके बताये सप्तक्रांति के एक भी बिन्दु पर अखिलेश या तेजस्वी ने आंदोलन की बात तो छोड़ ही दीजिए, प्रदर्शन तक नहीं किया है। या फिर मायावती ने डॉ. आंबेडकर के बताये रास्ते पर कोई आंदोलन किया हो।

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राग दरबारी: किसान आंदोलन के बीच ‘अचानक’ हुई एक यात्रा का व्याकरण

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा किसी भी रूप में सिर्फ गुरु तेग बहादुर को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए नहीं थी, बल्कि यह सामान्य हिन्दुओं के मन में आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों के प्रति घृणा फैलाने के लिए थी।

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राग दरबारी: प्रधानमंत्री का ‘मन’ किसके साथ है?

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार कुल मिलाकर किसानों के लिए जो तीन कानून संसद द्वारा बनाए गए हैं उससे किसानों को बहुत लाभ मिल रहा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण जितेन्द्र भोई हैं। इसी जितेन्द्र भोई की कहानी का खुलासा 4 दिसंबर के दैनिक भास्कर ने किया है।

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राग दरबारी: जिन्ना के बाद पहली बार भारत में नयी करवट लेती मुस्लिम सियासत

चूंकि हिन्दू नेतृत्व मुसलमानों की सुरक्षा करने में लगातार असफल हो रहा है इसलिए ओवैसी में भारतीय मुसलमान अपना भविष्य देखने लगा है। शायद ओवैसी भारत में एक अलग तरह की राजनीतिक शब्दावली और बिसात बिछाने की ओर अग्रसर हैं।

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राग दरबारी: 28 लाख बिहारी मजदूरों की पीड़ा को जाति के खांचे में डाल के आप खारिज कर देंगे?

अधिकांश राजनीतिक टिप्पणीकार एनडीए व महागठबंधन में मौजूद घटक दलों, किस मजबूत जाति का नेता किस गठबंधन के साथ है और किसका वोट परंपरागत रूप से किसे पड़ता रहा है, या फिर मोदी जी कितने चमत्कारिक रह गये हैं- के आधार पर बातों का विश्लेषण कर रहे हैं जबकि पिछले 15 वर्षों में बिहार कितना बसा और कितने बिहारी उजड़े- यह कहीं भी विश्लेषण में दिखायी नहीं पड़ता है।

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राग दरबारी: गोबरपट्टी के राजनीतिक टिप्पणीकार बिहार में ‘विकास की जाति’ को क्यों नहीं देखते?

किसका विकास हो रहा है मतलब किस जाति का विकास हो रहा है या फिर कह लीजिए कि विकास की जाति क्या है, इसे समझने का सबसे आसान तरीका यह जानना है कि किसके शासनकाल में किस जाति-समुदाय के लोगों की प्रतिमा लगायी जाती है; किसके नाम पर संस्थानों के नाम रखे जाते हैं; और किसके नाम पर सड़क का नामकरण हो रहा है।

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