“मोदी जी, जेपी के विचारों से आप कितनी दूर चले गए हैं, कृपया इस पर विचार करें”!

अगर महात्मा गाँधी भारत को 1947 में मिली स्वतंत्रता के वास्तुकार थे, जो इमरजेंसी के कारण 25/26 जून, 1975 को बुझ सी गयी, वो जेपी थे जिन्होंने उसे 1977 में पराजित कर हमें हमारी दूसरी स्वतंत्रता दिलाई. उनकी प्रशंसा में भारत की जन ने उन्हें ‘लोकनायक’ एवं ‘दूसरा महात्मा’ कह कर पुकारा. क्या आपको वो जेपी याद है, श्रीमान मोदी?

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एक शासक को काम करने के लिए आखिर कितने वर्ष चाहिए?

यह स्थिति केवल बिहार में नहीं है, लगभग पूरी दुनिया में है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प को अभी और काम करना है। रूस में पुतिन दशकों से बने हैं और अभी हटना नहीं चाहते। चीन में शी जिनपिंग ने आजीवन गद्दी पर बने रहने का अधिकार एक ही बार में हासिल कर लिया है। ये सब थोड़े से उदाहरण हैं।

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अदालत का फैसला अगर ‘न्याय’ से चूक जाए, तो आदमी क्या करे? कहां जाए?

जिस तरह भारतीय किसान की उम्मीद मानसून पर होती है हर साल, ठीक उसी तरह एक आम नागरिक की उम्मीद अदालत और देश की न्याय व्यवस्था से होती है। मानसून पर इन्सान का वश नहीं है, किन्तु अदालतें इन्सान यानी न्यायाधीशों के सहारे चलती हैं।

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लोकतंत्र की अंतिम क्रिया अभी बाकी है!

हम सभी एक सामूहिक, राष्ट्रव्यापी मदहोशी के शिकार हो गए थे. किस चीज़ का नशा कर रहे थे हम? हम तक एनसीबी का परवाना क्यों नहीं पहुंचा? सिर्फ बॉलीवुड के लोगों को ही क्यों बुलाया जा रहा है? कानून की नज़र में हम सभी बराबर हैं कि नहीं?

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क्या भारत का जनतंत्र फ़ेसबुक-ग्रस्त हो चुका है?

एक विशालकाय कम्पनी की सक्रियताओं को जानने के लिए जांच जरूरी ही है, लेकिन हमें लिबरल जनतंत्र के भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसकी तरफ प्रोफेसर डीबर्ट ने इशारा किया है।

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आर्टिकल 19: लोकतंत्र के शून्‍यकाल में…

भारत की संसदीय व्यवस्था में लोकतंत्र का मतलब बीजेपी का, बीजेपी के लिए और बीजेपी के द्वारा हो चुका है। बीजेपी ही सवाल पूछ सकती है। बीजेपी को ही जवाब देना है और बीजेपी को ही सुनना है। इसीलिए 14 सितंबर से शुरू होने जा रहे संसद के सत्र में विपक्ष के सांसदों की जुबान पर ताला लगा दिया गया है।

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तिर्यक आसन: लोकतंत्र का स्टिकर, स्टिकर का लोकतंत्र

राज्यपाल नामक जीव की रक्षा कैसे हो? लोकतन्त्र के दंगल में राज्यपाल नामक जीव की रक्षा करने के लिए “सेव दी गवर्नर” नामक स्टिकर भी उपलब्ध है। राजनीतिक दलों ने “सेव दी गवर्नर” का स्टिकर लगाया हुआ है।

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बात बोलेगी: लोकतंत्र के ह्रास में बसी है जिनकी आस…

एक बड़ा वर्ग ऐसे ही तैयार हुआ है, जिसके लिए पूरी व्यवस्था के जो सह-उत्पाद यानी बाय-प्रोडक्ट हैं वे उसी के उपभोक्ता के तौर पर तैयार किये गये हैं

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राग दरबारी: कितनी छोटी होगी लोकतंत्र में अवमानना की लकीर?

जब राजसत्ता के इशारे पर सारे निर्णय लिए जा रहे हैं तो लिखित कानून और उसे पालन करने वाले संस्थानों की क्या भूमिका रह जाएगी? हमारे संवैधानिक अधिकारों की गारंटी कौन करेगा जो हमें भारतीय कानून के तहत एक नागरिक के तौर पर मिले हुए हैं? उस नागरिक स्वतंत्रता का क्या होगा जिसकी दुहाई बार-बार दी जाती है?

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समकालीन राजनीतिक इतिहास पर हज़ार साल बाद एक क्लास में छात्र-रोबो संवाद

यदि रोबोटिक गुरु के स्थान पर कोई जीवित गुरु होता तो इस उत्तर से शायद हताश होता कि एक हजार साल बाद भी भारतीय जनता परिवर्तन के लिए चमत्कारों पर ही उम्मीद लगाए हुए है, लेकिन वह तो रोबोट था, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। बिल्कुल वैसे ही जैसे आज हम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ते देखकर भी मौन हैं।

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