नालंदा से कोलकाता वाया जर्मनी: किताबों से डरने वाली राजनीति जारी है

पुस्तकें किसी एक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं होतीं। उनमें सत्ता के पक्ष में लिखे गए ग्रंथ भी होते हैं और सत्ता की आलोचना करने वाले दस्तावेज भी; धार्मिक दर्शन भी होता है और नास्तिक चिंतन भी; राष्ट्र के गौरव का आख्यान भी होता है और उसके इतिहास की असुविधाजनक पड़ताल भी। पुस्तक का मूल स्वभाव ही यह है कि वह एक से अधिक दृष्टियों के लिए जगह बनाती है। इसीलिए स्वतंत्र विचार से भयभीत राजनीति को उन पुस्तकों से विशेष परेशानी होती है जो उसके बनाए नैरेटिव के बाहर खड़ी होकर सवाल करती हैं।

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पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व

जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।

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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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आज के तकनीकी युग में भी किताबों का महत्त्व कम क्यों नहीं हुआ है…

जब व्यक्ति पढ़ता है, तो वह यह सीखता है कि किसी भी बात को आँख मूँदकर स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। यही पढ़ने की आदत धीरे-धीरे तर्कवादी दृष्टि को जन्म देती है, जहाँ “क्यों” और “कैसे” जैसे प्रश्न केंद्रीय हो जाते हैं।

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समाज में फैल रहे असहिष्णुता के ज़हर को कैसे रोकें? विरोधी विचारों का सह-अस्तित्व कैसे कायम हो?

सदियों से इस धरती पर – जिसे हम आज भारत कहते हैं – परस्पर विरोधी विचारों, मान्यताओं और दर्शनों का सहअस्तित्व था, उनके बीच गर्मजोशी से बहसें हुआ करती थीं और ये तमाम बहसें किन्हीं स्वीकार्य तौर-तरीकों के तहत की जाती थीं। मतलब, दूसरे पक्ष की बात को सुनना, उसके खण्डन के लिए तर्क देना और फिर अपनी बात रखना … यह बेहत सख़्ती से लेकिन खुद की और प्रतिपक्षी की गरिमा को बनाए रखते हुए किया जाता था।

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लोकतंत्र आइसीयू में है, लोकतंत्र की सभी संस्थाएं और समाज बीमार हैं: प्रो. रूपरेखा वर्मा

नागरिक समाज, वाराणसी द्वारा भगत सिंह की 117वीं जयंती पर “लोकतंत्र की चुनौतियां एवं नए भारत का निर्माण” विषय पर पराड़कर भवन, मैदागिन, वाराणसी में सेमिनार का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो।. रूपरेखा वर्मा और विशिष्ट वक्ता पीयूसीएल की उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सीमा आज़ाद रहीं।

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चुनाव से पहले किए जाने वाले लोकप्रिय वादों और दावों पर रोक का जटिल सवाल

उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान राजस्थान और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों द्वारा लगातार की जा रही घोषणाओं पर संबन्धित राज्य सरकारों, केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने को कहा है।

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क्या नये भारत में राज्य की इच्छा ही न्याय है?

अंतरराष्ट्रीय संधियों की बाध्यता को आधार बनाकर अपनी सुविधानुसार सत्ता नागरिक अधिकारों में कटौती कर रही है जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून के उन उदार अंशों को रद्दी की टोकरी में डाला जा रहा है जो शरणार्थियों एवं अल्पसंख्यकों के अधिकारों से संबंधित हैं। ऐसे समय में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद लगाये आम आदमी की हताशा स्वाभाविक ही है।

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गांधी बनाम मोदी: लोकतंत्र में सियासी जंग का आखिरी मोर्चा सज चुका है!

भाजपा को अपने इस अभियान को सफल करना है तो गांधी परिवार को राजनैतिक रास्ते से हटाना होगा क्योंकि गांधी परिवार ने दंडवत होने से या रास्ता छोड़ देने से इनकार कर दिया है। सत्ता के चारों हथियार साम, दाम, दंड, भेद गांधियों को झुकाने में नाकाम रहे हैं।

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भारत क्या है? राज्यों का संघ या एक राष्ट्र?

आधुनिक युग में सामान्य रूप से राष्ट्र शब्द इंग्लिश शब्द नेशन का हिंदी रूपांतर माना जाता है। राष्ट्र, राज्य, राष्ट्रीयता, संघ सब अलग-अलग शब्द हैं, उनके अलग-अलग अर्थ हैं और उनकी अलग-अलग व्याख्याएं हैं, यह सभी समानार्थी नहीं हैं। सामान्यतया राष्ट्र और राज्य को एक मान लिया जाता है, जबकि दोनों अलग-अलग हैं।

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