बात बोलेगी: भेद खोलेगी बात ही…

बात तो करना ही पड़ेगी। बोलना तो पड़ेगा ही। बात बोलेगी भी और अपने समय के भेद भी खोलेगी और ज़ुबान पर चढ़ती जा रही बर्फ की मोटी सिल्लियों को पिघलाने का काम भी करेगी।

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महाबंदी, महामारी, मज़दूर और मुग़ालते

ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।

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प्रेस की आज़ादी ही लोकतंत्र है!

स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है, विपक्ष के प्रति उदासीनता, सरकारों का निरंकुश और तानाशाही रवैया तोड़ने का काम भी मीडिया ही करती है।

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