बहुजन राजनीति के बेगमपुरा मॉडल की तलाश

बाबा साहेब द्वारा 1942 में स्थापित आल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के उद्देश्य और एजंडा को देखा जाय तो पाया जाता है कि डॉ. आंबेडकर ने इसे सत्ताधारी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों के बीच संतुलन बनाने के लिए तीसरी पार्टी के रूप में स्थापित करने की बात कही थी। इसकी सदस्यता केवल दलित वर्गों तक सीमित थी क्योंकि उस समय दलित वर्ग के हितों को प्रोजेक्ट करने के लिए ऐसा करना जरूरी था।

Read More

डॉ. आंबेडकर का सामाजिक सुधार और आज का परिदृश्य

आंबेडकर सामाजिक असमानता के ख़िलाफ़ हमेशा मुखर रहते थे। जहां कहीं भी उनको अवसर मिलता था वह इस मुद्दे को उठाते थे। संविधान सभा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था को लेकर आंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक लोकतंत्र से पहले सामाजिक लोकतंत्र की आवश्यकता है।

Read More

अंबेडकर और कम्युनिस्ट विचारधारा के रिश्तों को समझने की एक दस्तावेजी खिड़की

डॉ. अम्बेडकर की एक अधूरी पांडुलिपि का हालिया प्रकाशन हमें अम्बेडकर के साम्यवाद के साथ संबंधों की अधिक सूक्ष्म समझ प्राप्त करने में मदद करता है। इस पुस्तक का संपादन अंबेडकर के परिवार से जुड़े एक प्रसिद्ध दलित विद्वान आनंद तेलतुम्बडे ने किया है।

Read More

छान घोंट के: भारतीय राष्ट्रवाद के खिलाफ हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता का साझा इतिहास

मोहम्मद अली जिन्ना द्वारा दो-राष्ट्र सिद्धांत अपनाने के बहुत पहले से सावरकर इस सिद्धांत का प्रचार कर रहे थे और दोनों ही भारतीय राष्ट्रवाद के खिलाफ थे। एक खास गौरतलब तथ्य है कि मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन (मार्च 1940) में पाकिस्तान प्रस्ताव पारित करते समय जिन्ना ने अपने दो-राष्ट्र सिद्धांत के पक्ष में सावरकर के उपरोक्त कथन का हवाला दिया था।

Read More

जाति के सवाल पर बनी पहली कम्युनिस्ट पार्टी के संदर्भ में ‘माफुआ’ का विश्लेषण व सीमाएं

बंकिमचंद्र द्वारा निर्मित मुसलमान का मोनोलिथ हिंदू मोनोलिथ निर्माण प्रक्रिया की शुरुआत करता है। जाति व्यवस्था हिंदू धर्म का हिस्सा है, ऐसा कहते डॉ. आंबेडकर मोनोलिथ पक्का करते हैं और उस मोनोलिथ से बाहर निकलने के लिए धर्मातरण कर धर्म नाम के मोनोलिथ को और पक्का करते हैं। बंकिमचंद्र से लेकर बाबा साहब तक धर्म को मोनोलिथ बनाने की यात्रा विश्व पूंजीवाद के लिए उपकारक सिद्ध हुई है।

Read More