कोरोनाकाल में स्कूली शिक्षा के अभाव ने बच्चों का भविष्य अंधेरे में छोड़ दिया है

आभासी कक्षा उनके लिए वरदान सिद्ध हुई हैं जो घर बैठे पढ़ना चाहते हैं-जैसे विवाह के बाद तमाम लड़कियों की शिक्षा बाधित हो जाती है, तो वे इसका लाभ ले सकती हैं। पैर टूट जाए तो भी कोई छात्र घर पर कक्षाएं कर सकता है पर सामान्‍य स्थिति में बच्चों के लिए यह बिल्कुल कारगर नहीं है। गाँधी जी ने जो ट्रिपल एच (मस्तिष्क, हृदय और हाथ) के विकास की अवधारणा दी है उसमें यह बिल्कुल असफल है। ऑनलाइन कक्षा केवल विकल्प है, इससे केवल काम चलाया जा सकता है, यह पूर्ण समाधान नहीं है।

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स्कूली शिक्षा का गहराता संकट और डिजिटल स्पेस में लटके बच्चों का भविष्य

जब ऑनलाइन कक्षाओं के सुचारू संचालन के दावे केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा बड़े जोर-शोर से लगातार किए जा रहे हैं तब यह यह दुःखद एवं चिंतनीय स्थिति कैसे बन गयी है?

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भारत के गांवों में कैसे सफल होगी ऑनलाइन शिक्षा?

अगर सरकार की नीतियों की दिशा ये है कि डिजिटल एजुकेशन से काम चलाया जाएगा, तो इसके लिए तीन कदम उठाने होंगे. एक, देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा का विस्तार करना होगा और लैपटॉप या टैबलेट हर छात्र को मिल सके, ऐसी व्यवस्था करनी होगी. दो, छात्रों से भी पहले शिक्षकों को डिजिटल एजुकेशन के लिए तैयार करना होगा और उनकी ट्रेनिंग करानी होगी. तीन, डिजिटल एजुकेशन के लिए सिलेबस को बदलना होगा और नए टीचिंग मैटेरियल तैयार करने होंगे.

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