क्या लालू और उनकी पार्टी का राजनीतिक शुद्धिकरण कर रहे हैं तेजस्वी?

ऐसा पहली बार है जब बिहार के चुनाव में बात नौकरी और रोजी-रोटी की हो रही है और ये सब उस पार्टी से हो रही है जिसके सरकार पर बिहार में जंगलराज लाने का आरोप लगाया जाता रहा है. अचानक से चुनावी पोस्टर-बैनर और पर्चे से लालू का गायब हो जाना क्या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर राजद में लालू युग का ‘द एंड’ हो गया है?

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चुनावीबिहार-8: मोदी की तीन सभाएं और तेजस्वी की दो गलतियां ‘गेमचेंजर’ हो सकती हैं!

तेजस्वी के साथ अनुभवहीनता और बिना जिम्मेदारी के बड़ी कुर्सी मिलने से जुड़े तमाम दोष समा गए हैं। लालू की तरह उनके पास रघुवंश प्रसाद, अब्दुल बारी सिद्दीकी जैसे दोस्त भी नहीं हैं, ऊपर से पार्टी पर उन्होंने नियंत्रण कायम तो कर लिया है, लेकिन यह कब तक रहेगा यह कहना बहुत मुश्किल है।

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‘जंगल का युवराज’ उर्फ दस साल बाद मुखिया का भोज-भंग प्रतिशोध

प्रधानमंत्री जी आप सचमुच महान हो. नीतीश कुमार की जड़ें इतने तरीके से काट सकोगे, मुझे उम्मीद नहीं थी. आप की होशियारी लाजवाब है.

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दलित राजनीति की त्रासदी को इसका स्वर्णिम युग कहना मसखरापन है!

जिन दलित पार्टियों ने जाति की राजनीति को अपनाया था वे भाजपा के हाथों बुरी तरह से परास्त हो चुकी हैं क्योंकि उनकी जाति की राजनीति ने भाजपा फासीवादी हिन्दुत्व की राजनीति को ही मजबूत करने का काम किया है।

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बात बोलेगी: ‘टिकाऊ’ और ‘बिकाऊ’ बटमारों के दो लोकतांत्रिक शगल

बिहार पर बहुत बात हो रही है। लगभग एक तरह की ही बात हो रही है। बदलते मौसम की बात करना वैसे भी सबसे बड़ा शगल है हमारे समाज का। चुनाव के संदर्भ में यह शगल सत्‍ताधारी दल के बदलाव को लेकर है। इस बीच मध्य प्रदेश का उपचुनाव मेले के किसी कोने में लगी उस दुकान की तरह है जहां आम तौर पर सट्टेबाज बैठते हैं जिन पर ध्यान सबका रहता है पर वहां कोई जाता नहीं।

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#जनरल_डायर_नीतीश_कुमार और #मुंगेर_नरसंहार के साये में पहला मतदान

भाजपा के लिए टर्फ केवल मुंगेर का ही कठिन नहीं है, आज जिन 16 जिलों में चुनाव हो रहे हैं, वे आरजेडी का मजबूत दुर्ग हैं और 2015 में लालटेन और तीर ने मिलकर कमल को बर्बाद कर दिया था।

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राग दरबारी: 28 लाख बिहारी मजदूरों की पीड़ा को जाति के खांचे में डाल के आप खारिज कर देंगे?

अधिकांश राजनीतिक टिप्पणीकार एनडीए व महागठबंधन में मौजूद घटक दलों, किस मजबूत जाति का नेता किस गठबंधन के साथ है और किसका वोट परंपरागत रूप से किसे पड़ता रहा है, या फिर मोदी जी कितने चमत्कारिक रह गये हैं- के आधार पर बातों का विश्लेषण कर रहे हैं जबकि पिछले 15 वर्षों में बिहार कितना बसा और कितने बिहारी उजड़े- यह कहीं भी विश्लेषण में दिखायी नहीं पड़ता है।

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नीतीश जी! आपको क्या हुआ है? आप किससे लड़ रहे हैं?

आखिर वह कर क्या रहे हैं? बोल क्या रहे हैं? किस के खिलाफ वह लड़ रहे हैं? किस के पक्ष में वह लड़ रहे हैं? उन्हें आगे करके उनके चमचों को बिहार लूटना है. उन्हें गलत जानकारियां दी जा रही हैं. जिस चौकड़ी से नीतीश घिरे हैं, वह भ्रष्ट तो है लेकिन बहुत चालाक है. इनसे यदि वह बाहर नहीं आए तो यह उनका और बिहार का दुर्भाग्य होगा.

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उनके पेट में दांत है, लेकिन वे खुद चक्रव्यूह के भीतर हैं!

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, जो कि पिछले 15 सालों से बिहार के सत्ता पर काबिज है और जिसका नेतृत्व सुशासन बाबू फेम “नीतीश कुमार” सफलतापूर्वक करते आए हैं, इस बार अपने भीतर ही एक चक्रव्यूह रचे हुए है। इसका मूल मक़सद नीतीश जी को निपटा देना है।

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बिहार में NDA के खिलाफ लोगों के विरोध और खाली मैदान दिखाने से मीडिया शरमाता है

इस बार बिहार के मतदाताओं में मौजूदा सरकार यानी बीजेपी-जदयू वाले गठबंधन के खिलाफ़ भारी आक्रोश है. हालत यह है कि खाली सभाओं को छिपाने के लिए पुरानी तस्वीरें लगाकर सोशल मीडिया पर झूठा प्रचार तक किया गया.

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