जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!

सोनम वांगचुक और युवा साथियों का सत्याग्रह केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है। यह शिक्षा, बेरोजगारी, लोकतंत्र और जवाबदेही के गहरे संकट का आईना है। ऐसे समय में असली सवाल यह नहीं कि कौन जंतर-मंतर पहुँचा, बल्कि यह है कि सरकार अब तक चुप क्यों है।

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बात बोलेगी: जो सीढ़ी ऊपर जाती है, वही सीढ़ी नीचे भी आती है!

ये सरकारें आती हैं आंदोलनों से और जाती भी हैं आंदोलनों से ही। आंदोलन, सरकार के लिए सीढ़ी हैं। इन सीढि़यों पर सरकारें चढ़ती हैं शौक से लेकिन उतरती हैं बेआबरू होकर। उतरती क्या, उतारी जाती हैं।

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