तीनों कृषि विधेयक केवल किसानों पर ही नहीं, हमारी थाली पर भी सीधा हमला हैं!

विधेयक में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक अनाज व तेल के दाम पिछले साल के औसत मूल्य की तुलना में डेढ़ गुना व आलू-प्याज, सब्जी-फलों के दाम दोगुने से ज्यादा नहीं बढ़ेंगे, तब तक सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसका अर्थ है कि खाद्य वस्तुओं में महंगाई को 50-100% की दर से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ाने की कानूनी इजाज़त दी जा रही है

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GDP के ऐतिहासिक पतन के बीच कृषि क्षेत्र में वृद्धि के क्या मायने हैं?

पिछले तीन दशकों में इस देश के किसानों ने लाखों की संख्या में आत्महत्या की है और दूसरी ओर देश के विकास में उद्योग और सेवा क्षेत्र का प्रतिशत बढ़ता गया है। चूँकि नब्बे के बाद मूलतः पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली देश में लागू करने की कोशिश की गई, इसलिए जब जब पूँजीवाद आर्थिक मंदी का शिकार हुआ है, तब उसके उत्पादन की श्रृंखला टूट गई है।

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लॉकडाउन के बाद किसानों की कमर तोड़ने आ रहे हैं टिड्डे, समझिए टिड्डी दलों का विज्ञान

यह समझना कि टिड्डी दल कैसे बनते हैं तथा उसे कैसे अलग किया जा सकता है, एक महत्वपूर्ण सवाल है।

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किसानों-उद्यमियों का माल बिके और तुरंत मूल्य मिले, पैकेज में इसका इंतज़ाम नहीं है

कोरोना संकट में किसानों और उद्यमों के हाथ में नकद पैसा चाहिए। उनका माल बिके और मूल्य तुरंत मिले, इसकी व्यवस्था इस पैकेज में कहीं नहीं नज़र आती।

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झूठ बोलने की व्‍यवस्‍थागत मजबूरी: पी. साइनाथ का दिल्ली में वक्तव्य

पी. साइनाथ ने यह व्‍याख्‍यान दिल्‍ली के कांस्टिट़यूशन क्‍लब में पिछले साल दिया था। उसके संपादित अंश प्रस्‍तुत हैं। A Structural Compulsion  To Lie जिस तरह किसी जंग को जनरलों के …

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