आम बजट: गांव और किसान की अनदेखी कर के सरकार ने क्या आंदोलन का बदला लिया है?

इस नीरस और निराशाजनक बजट की प्रशंसा के लिए एक अनूठा और हास्यास्पद तर्क गढ़ा गया- पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के बाद भी सरकार ने आम लोगों को राहत पहुंचाकर उनका दिल जीतने की कोशिश नहीं की, कोई लोकलुभावन घोषणा इस बजट में नहीं की गई।

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पंजाब: जहां मंडियों के सहारे चलती है जीवन की गाड़ी

पंजाब के किसानों का कहना है कि पूरे प्रदेश में व्याप्त मंडियों का विशाल और सुलभ नेटवर्क उनके अनुकूल है और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) व दूसरी अन्य भरोसेमंद प्रक्रियाओं के साथ-साथ व्यापार के लिहाज़ से उन्हें तनिक सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराता है। अब किसानों को इस बात का डर लगातार सता रहा है कि नए कृषि कानूनों के लागू होने का सीधा असर इस नेटवर्क पर पड़ेगा।

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आंदोलन उम्मीद जगाता है कि बैलों की तरह मनुष्य खेती से चुपचाप बेदखल नहीं किए जा सकते!

आंदोलन उम्मीदें जगाते हैं, मनुष्यों की चेतना का परिष्कार करते हैं। किसान आंदोलन भी उम्मीदें जगा रहा है, चेतनाओं का परिष्कार कर रहा है। तभी तो, बेरोजगारों के मानस में भी उथल-पुथल के संकेत नजर आने लगे हैं, छात्रों का जुड़ाव भी आंदोलित किसानों से होता जा रहा है, कामगारों के बीच भी हलचल मच रही है।

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किसानों के लिए यह बजट निराशाजनक है, ऐसा कहना सरकारी कठोरता को कम कर के आंकना होगा

सरकार इस बजट के माध्यम से किसानों को यह संदेश देना चाहती है कि उनके आंदोलन से प्रभावित होकर वह अपनी प्राथमिकताओं में बदलाव करने वाली नहीं है, बल्कि किसानों के लिए पिछले बजटों में जो थोड़े बहुत प्रावधान किए गए थे उन्हें लेकर भी वह कंजूसी बरतने का दुस्साहस अवश्य करने वाली है।

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बजट ने साबित किया किसान-मजदूर सरकार की अंतिम प्राथमिकता: KSS

बजट ने सरकार के किसानों की आय को दुगना करने के दावे की पोल भी खोल दी है। सरकार ने फिर से एक बार झूठ बोला है कि देश में लागत से डेढ़ गुना दाम पर खरीद की जा रही है। जबकि गेहूं और धान भी पूरे देश मे समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदा जा रहा है। 23 कृषि उत्पादों की समर्थन मूल्य पर खरीद की बात बहुत दूर है।

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केरल के बारे में PM की टिप्पणी उनकी अज्ञानता को दर्शाती है: किसान सभा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सवाल उठाया है कि केरल में एपीएमसी और मंडियां नहीं हैं, तो केरल में कोई विरोध क्यों नहीं हो रहे हैं? वे वहां आंदोलन क्यों नहीं शुरू करते?

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तीनों कृषि विधेयक केवल किसानों पर ही नहीं, हमारी थाली पर भी सीधा हमला हैं!

विधेयक में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक अनाज व तेल के दाम पिछले साल के औसत मूल्य की तुलना में डेढ़ गुना व आलू-प्याज, सब्जी-फलों के दाम दोगुने से ज्यादा नहीं बढ़ेंगे, तब तक सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसका अर्थ है कि खाद्य वस्तुओं में महंगाई को 50-100% की दर से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ाने की कानूनी इजाज़त दी जा रही है

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GDP के ऐतिहासिक पतन के बीच कृषि क्षेत्र में वृद्धि के क्या मायने हैं?

पिछले तीन दशकों में इस देश के किसानों ने लाखों की संख्या में आत्महत्या की है और दूसरी ओर देश के विकास में उद्योग और सेवा क्षेत्र का प्रतिशत बढ़ता गया है। चूँकि नब्बे के बाद मूलतः पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली देश में लागू करने की कोशिश की गई, इसलिए जब जब पूँजीवाद आर्थिक मंदी का शिकार हुआ है, तब उसके उत्पादन की श्रृंखला टूट गई है।

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लॉकडाउन के बाद किसानों की कमर तोड़ने आ रहे हैं टिड्डे, समझिए टिड्डी दलों का विज्ञान

यह समझना कि टिड्डी दल कैसे बनते हैं तथा उसे कैसे अलग किया जा सकता है, एक महत्वपूर्ण सवाल है।

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किसानों-उद्यमियों का माल बिके और तुरंत मूल्य मिले, पैकेज में इसका इंतज़ाम नहीं है

कोरोना संकट में किसानों और उद्यमों के हाथ में नकद पैसा चाहिए। उनका माल बिके और मूल्य तुरंत मिले, इसकी व्यवस्था इस पैकेज में कहीं नहीं नज़र आती।

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