‘अंतिका’ का पचपनिया विमर्श: ब्राह्मणों के हाथ से खिसक रही है मैथिली की सत्ता

ये सच है कि मैथिली भाषा पर जिनकी सत्ता है और इस भाषा के सरकारी और गैर सरकारी संस्थान पर जिनका वर्चस्व है वो इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाली है। मगर जिस तेजी से मैथिली के सोशल डायनामिक्स का पहिया घूम रहा है तो वो दिन अब दूर नहीं जब मैथिली की सत्ता मैथिल ब्राह्मणों के हाथ से खिसक कर मैथिली भाषा के मूल हकदार बहुजन और दलितों के हाथ में चली जाएगी।

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भाषा चर्चा: त्रिभाषा की जगह द्विभाषा फॉर्मूले को रखने में ही क्या दिक्कत थी?

अंग्रेजी के सर्वमान्य आधिपत्य से हमारा फायदा होने की जगह नुकसान अधिक हुआ है, यह तो इतिहास ने ही साबित कर दिया है। आप संपर्क भाषा हिंदी को बनाते और बाकी भारतीय भाषाओं को जरूरत के मुताबिक ‘न्यूमिरो ऊनो’ बनाते।

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भारतीय भाषाएँ, अंग्रेजी और औपनिवेशिक सत्ता के सांस्कृतिक वर्चस्व का सवाल

वर्तमान में अंग्रेजी और भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के सन्दर्भ में जहां हैं वहां इसलिए नहीं है कि भारतीय भाषाएँ अपने मूल रूप में प्रतिगामी हैं, बल्कि इसलिए कि एक तरफ उत्पीड़न का इतिहास है और दूसरी तरफ उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध का इतिहास।

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भाषा-चर्चा: तकनीक की ‘अंधाधुन’ गोलीबारी में टूटता हिंदी का संयुक्त परिवार

जिस तरह एकल परिवारों की वजह से चाचा-चाची, मौसा-मौसी, फुआ-फूफा जैसे रिश्ते सिमटते गए और एक ‘अंकल’ और ‘आंटी’ में समा गए, उसी तरह विष, ज़हर, हलाहल आदि का भी समायोजन एक ‘प्वाइज़न’ में हो गया। हम हिंदी वाले अब ‘कज़न ब्रदर’ या ‘कज़न सिस्टर’ का प्रयोग करते हैं।

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नई शिक्षा नीति कहीं आरक्षण को खत्म करने का ऐलान तो नहीं?

नई शिक्षा नीति, 2020 आरक्षण के सवाल पर मौन है। कहीं यह आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के उस ऐलान की परिणति तो नहीं जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा पर बात कही थी। आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े आरक्षण विरोधी मंच गाहे बगाहे आरक्षण को ख़त्म करने की बात उठाते रहे हैं।

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