बंद सामुदायिक रसोइयों, भ्रष्ट PDS और गहराती भुखमरी के आईने में मुफ़्त राशन का सरकारी वादा

दिवाली तक 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्‍ध करवाने की प्रधानमंत्री की घोषणा की ज़मीनी हकीकत बहुत जुदा है। अगर लोगों को निशुल्क राशन और कम्युनिटी किचन जैसी सुविधाएं मिल पा रही होतीं तो ग्राउंड से वो आवाजें नहीं आती जो मोबाइलवाणी तक पहुंच रही हैं।

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मेरा मुखिया कैसा हो? पंचायत चुनावों के मुहाने पर खड़ी हिन्दी पट्टी से जमीनी आवाज़ें

पंचायत चुनावों को निचले दर्जे का समझना भूल हो सकती है। आखिर ये ग्रामीण समझ और ग्रामीण विकास का मामला है। इस बार लगता है कि बात कुछ और होगी क्योंकि ग्रामीण जनता पिछले चुनावों से काफी सबक ले चुकी है। इस बार वे ये नहीं चाहते कि कोई भी आए और मुखिया का पद संभाल ले। इस बार जनता चाहती है कि उनका मुखिया ऐसा हो जो साक्षर हो, जनता को समान दृष्टि से देखता हो, भेदभाव कम करता हो, स्थानीय स्तर पर रोज़गार और दूसरी योजनाओं के क्रियान्वयन में जनता की भागीदारी और सबसे अहम् ग्रामसभा और समितियों के संचालन और ग्रामीणों को आ रही समस्याओं के समाधान की पहल करने योग्य हो। लोग ऐसे ही प्रत्‍याशियों को अपना समर्थन देंगे।

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नए कृषि कानून का विरोध और आंदोलन बड़े किसानों का मसला है! चुनावी बिहार से प्रतिक्रियाएं…

एक ऐसे वक़्त में जब किसान अपनी आवाज मीडिया में दर्ज नहीं करा पा रहे हैं, मोबाइल वाणी ने उन्‍हें कृषि बिल पर अपनी राय दर्ज करवाने का एक मौका दिया और उनकी बात रिकॉर्ड की। आइए जमीन से आयी किसानों की आवाज़ के जरिये समझते हैं कि कृषि बिल को लेकर वे क्‍या सोच रहे हैं।

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लोग अपना पेट काटकर मिटा रहे हैं बच्‍चों की भूख, कहां गया 68% बच्‍चों के मिड-डे मील का पैसा?

जून में अनलॉक के बाद मोबाइलवाणी ने राशन कार्ड के संबंध में सर्वे किया, जिसमें 637 लोगों ने अपनी बात मोबाइलवाणी पर रिकॉर्ड की और उनमें से 77 फीसदी राशन कार्ड धारकों ने बताया कि उन्हें राशन नहीं मिला और बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों से पोषण आहार।

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भूखे पेट, खाली खाता, सूनी थाली! मिड डे मील का राशन और पैसा बन गया ‘आपदा में अवसर’

सरकार का दावा है कि उसने तो बहुत पहले ही पके हुए मध्याह्न भोजन या फिर उसके बदले की राशि बच्चों के खाते में डाल दी है, पर ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है।

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