बात बोलेगी: त्रेता और द्वापर के लोकतांत्रिक कड़ाहे में लीला और मर्यादा का ‘डिस्ट्रक्टिव’ पकवान

हमारी संसद दो महान मिथकीय युगों के पहियों पर टिका ऐसा रथ है जिस पर जबरन लोकतंत्र को सवार कर दिया गया है। यह अनायास नहीं है कि त्रेता और द्वापर के बीच ग्रेगरि‍यन कैलेंडर से लयबद्ध आधुनिक लोकतंत्र कहीं लुप्त हो रहा है। हिंदुस्तान का मानस इसी त्रेता और द्वापर में कहीं अटक गया है। गलती उसकी नहीं है, उसे इस रथ पर यही मर्यादा और लीला दिखलायी दे रही है। वो उसी को देखकर जी रहा है।

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मत भूलिए, आपकी मातृसंस्था भी एक शताब्दी से आंदोलन ही कर रही है: एक आंदोलनकारी का PM के नाम खुला पत्र

अंग्रेजों के खिलाफ महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे लोगों ने भी आजादी के लिए आंदोलन किया, तो क्या वे भी आपकी नज़र में आंदोलनजीवी हैं? ढाई महीने से अधिक हो गए, देश का किसान दिल्ली की सड़कों पर कड़कड़ाती ठंड में पड़ा है। अपने वाजिब हक के लिए सरकार के सामने हाथ फैलाना गुनाह है?

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प्रधानमंत्री ने किसानों को परजीवी कहकर अन्नदाता का अपमान किया है: सुनीलम

यदि स्वतंत्रता आंदोलन नहीं होता तो देश आजाद नहीं होता। 1974 का आंदोलन नहीं होता तो देश में लोकतंत्र की बहाली नहीं होती। 1894 में अंग्रेजों के द्वारा बनाए गए भू-अधिग्रहण कानून के खिलाफ आंदोलन नहीं होता तो नया भू-अधिग्रहण कानून नहीं बनता। जन लोकपाल बिल को लेकर अन्ना आंदोलन नहीं होता तो देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ वातावरण नहीं बनता। लोकपाल की आवश्यकता स्थापित नहीं होती।

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देश की इस फ़िल्म में नायक और डॉक्टर दोनों ही नदारद हैं!

कोई सवाल नहीं करना चाहता कि इस समय बड़े-बड़े फ़ैसलों की असली ‘लोकेशन’ कहाँ है! देश को सार्वजनिक क्षेत्र के मुनाफ़ा कमाने वाले उपक्रमों की ज़रूरत है या नहीं और उन्हें रखना चाहिए अथवा उनसे सरकार को मुक्त हो जाना चाहिए, इसकी जानकारी बजट के ज़रिए बाद में मिलती है और संकेत कोई बड़ा पूर्व नौकरशाह पहले दे देता है। हो सकता है आगे चलकर यह भी बताया जाए कि राष्ट्र की सम्पन्नता के लिए सरकार को अब कितने और किस तरह के नागरिकों की ज़रूरत बची है।

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दक्षिणावर्त: ये सरकार डरी हुई है या मोदी जी महान बनने के चक्कर में हैं?

कहीं मोदी इन तथाकथित आंदोलनों को स्पेस देकर, सुरक्षा देकर प्रेशर कुकर की उसी सीटी का तो काम नहीं ले रहे, ताकि जनता बड़े औऱ असल मुद्दों को भूली रहे। आखिर, यह देश पिछले साल कोरोना की महामारी में लिपटा रहा है, अर्थव्यवस्था हलकान है, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और सच पूछें तो देश में फिलहाल ‘अच्छे दिन’ नहीं दिख रहे हैं।

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हिंसक कब्ज़ा बनाम कानूनी मंजूरी: लोकतंत्र में संसद पर एकाधिकार के दो चेहरे

संवैधानिक लोकतंत्र से छेड़छाड़ और उसमें बदलाव के दोनों तरीकों- भारतीय और अमेरिकी- में क्‍या कोई फ़र्क है? या दोनों एक ही सिक्‍के के दो अलग-अलग पहलू भर हैं?

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आर्टिकल 19: प्रधानमंत्री के डेढ़ घंटे तक चले भाषण को समझने के 10 सूत्र

इतने लंबे भाषण के जरिये वो साबित क्या करना चाहते थे? मोटे तौर पर दस सूत्रों में इसे समझना आसान होगा। इसको ठीक से समझना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने बहुत सारी बातें सुलझाने के बजाय उलझा दी हैं।

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बात बोलेगी: जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया…

एक साँचे में ढले, एक जैसा आइक्यू, एक जैसे ब्यौपारी, दोनों की देशों की जनता का एक जैसे चौंकना, एक जैसे चुनाव अभियान, एक जैसी शोहरत,एक जैसी नफ़रत, एक जैसे अनंत झूठ- क्या ही ज़ुदा करता है दोनों को?

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राग दरबारी: किसान आंदोलन के बीच ‘अचानक’ हुई एक यात्रा का व्याकरण

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा किसी भी रूप में सिर्फ गुरु तेग बहादुर को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए नहीं थी, बल्कि यह सामान्य हिन्दुओं के मन में आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों के प्रति घृणा फैलाने के लिए थी।

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दक्षिणावर्त: प्रधान सेवक के हाथ से क्या चीज़ें फिसल रही हैं?

भाजपा को सत्ता से 25 वर्षों तक दूर रखना है, तो 5 वर्ष के लिए सत्ता में ला दो। यह यूं ही नहीं कहा जाता।

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