दक्षिणावर्त: ये सरकार डरी हुई है या मोदी जी महान बनने के चक्कर में हैं?

कहीं मोदी इन तथाकथित आंदोलनों को स्पेस देकर, सुरक्षा देकर प्रेशर कुकर की उसी सीटी का तो काम नहीं ले रहे, ताकि जनता बड़े औऱ असल मुद्दों को भूली रहे। आखिर, यह देश पिछले साल कोरोना की महामारी में लिपटा रहा है, अर्थव्यवस्था हलकान है, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और सच पूछें तो देश में फिलहाल ‘अच्छे दिन’ नहीं दिख रहे हैं।

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हिंसक कब्ज़ा बनाम कानूनी मंजूरी: लोकतंत्र में संसद पर एकाधिकार के दो चेहरे

संवैधानिक लोकतंत्र से छेड़छाड़ और उसमें बदलाव के दोनों तरीकों- भारतीय और अमेरिकी- में क्‍या कोई फ़र्क है? या दोनों एक ही सिक्‍के के दो अलग-अलग पहलू भर हैं?

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आर्टिकल 19: प्रधानमंत्री के डेढ़ घंटे तक चले भाषण को समझने के 10 सूत्र

इतने लंबे भाषण के जरिये वो साबित क्या करना चाहते थे? मोटे तौर पर दस सूत्रों में इसे समझना आसान होगा। इसको ठीक से समझना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने बहुत सारी बातें सुलझाने के बजाय उलझा दी हैं।

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बात बोलेगी: जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया…

एक साँचे में ढले, एक जैसा आइक्यू, एक जैसे ब्यौपारी, दोनों की देशों की जनता का एक जैसे चौंकना, एक जैसे चुनाव अभियान, एक जैसी शोहरत,एक जैसी नफ़रत, एक जैसे अनंत झूठ- क्या ही ज़ुदा करता है दोनों को?

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राग दरबारी: किसान आंदोलन के बीच ‘अचानक’ हुई एक यात्रा का व्याकरण

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा किसी भी रूप में सिर्फ गुरु तेग बहादुर को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए नहीं थी, बल्कि यह सामान्य हिन्दुओं के मन में आंदोलन कर रहे पंजाब के किसानों के प्रति घृणा फैलाने के लिए थी।

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दक्षिणावर्त: प्रधान सेवक के हाथ से क्या चीज़ें फिसल रही हैं?

भाजपा को सत्ता से 25 वर्षों तक दूर रखना है, तो 5 वर्ष के लिए सत्ता में ला दो। यह यूं ही नहीं कहा जाता।

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कच्छ के सिख किसान तो 15 तारीख को विरोध कर रहे थे, फिर PM के साथ बैठक में कौन था?

15 दिसंबर को कच्‍छ में जो बैठक हमें प्रधानमंत्री और पीड़ित सिख किसानों के बीच की बतायी गयी, वह दरअसल एक सुप्रीम नेता और उसके कार्यकर्ताओं के बीच की सामान्‍य शिष्‍टाचार बैठक थी।
इस बैठक का न तो किसान कानूनों से कोई लेना देना था, न ही कच्‍छ में बसे सिख किसानों की समस्‍या से।

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नयी संसद का भूमिपूजन: आधुनिक लोकतंत्र और संगठित धर्म के बीच आवाजाही का सवाल

प्रधानमंत्री बारंबार संसद भवन को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा देते रहे हैं किंतु मंदिर की भूमिका धर्म के विमर्श तक ही सीमित रहनी चाहिए। नए संसद भवन को तो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और तर्क के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

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तन मन जन: क्या आपको लगता है कि वैक्सीन लगाते ही ‘कोरोना प्रूफ’ हो जाएंगे? आप गलतफहमी में हैं!

जिसे भी देखिए वह थोड़े लापरवाह स्थिति में वैक्सीन के नाम से ही आश्वस्त है कि, ‘‘अब डर काहे का, वैक्सीन तो आ ही रही है।’’ ऐसा कहते चक्‍त यह भी जानिए कि विश्व स्वास्थ्य संगठन वैक्सीन को लेकर क्या कह रहा है। संगठन के हेल्थ इमरजेन्सी डायरेक्टर माइकल रेयान का वक्तव्य तो डराने वाला है। वे कहते हैं कि ‘‘हो सकता है हमें वायरस के साथ ही जीना पड़े।’’

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#देश_बिक्रेता: क्‍या निजीकरण के खिलाफ़ गीत गाने पर इस देश में जान जा सकती है?

शुक्रवार आधी रात देश बिक्रेता के नाम से एक हैशटैग अचानक ट्विटर पर वायरल हुआ। यह हैशटैग सपना और विशाल को मिली धमकियों के खिलाफ देश भर के बहुजनों का एक प्रतिरोध था।

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