भारत, पूंजीवाद, राष्ट्रवाद, साहित्य और राजनीति पर अरुंधति रॉय से सात सवाल

किसी नदी को आप विषमुक्‍त कैसे करते हैं? मेरे खयाल से, विष खुद-ब-खुद उसमें से निकल जाता है। बस, बहती हुई धारा अपने आप ऐसा कर देती है। हमें उस धारा का हिस्सा बने रहना होगा।

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कथा कलकत्ता: एक बौद्धिक समाज के अवसान के सात दशक की आंखों देखी स्मृतियां

जिस कलकत्ते का मैंने जिक्र किया वह तो विलुप्त हो गया। अब तो बस दो-चार नामलेवा लेखक-कवि रह गए हैं जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। कविता के क्षेत्र में युवा पीढ़ी की संख्या इतनी है कि आप गिन नहीं सकते जबकि इनकी कविता में सबकुछ होता है पर कविता नहीं होती। कहानी लेखन का भी वही हाल है। संस्थाओं और मंचों पर कब्ज़ा ऐसे लोगों का है जो अपने प्रिय और प्रियाओं को मंच देते हैं। गंभीर लिखने वालों को दूर रखते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनको मंच दिया तो इनकी विद्वता की कलई न खुल जाए।

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“…ताकि स्‍पार्टकस का सपना हमारे समय में सच हो सके”: हॉवर्ड फास्ट कृत महान उपन्यास के 70 साल

संघर्ष की असली पराजय आत्मा की पराजय है और सभी श्रेष्ठ मानवतावादी कलाकारों की भांति हावर्ड फास्ट के यहां भी आत्मा कभी पराजित नहीं होती, उसका अजेय स्वर कभी मन्द नहीं पड़ता। दास युग के बाद भी वह आदिविद्रोही, वह स्पार्टकस वह हमारा पुरखा लौटा है और बार-बार लौटा है, करोड़ों की संख्या में लौटा है जहां-जहां भी न्याय और स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिये संघर्ष हुए हैं और रक्त बहा है, स्पार्टकस वहां मौजूद रहा है।

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नत ग्रीव, धैर्य धन: एक रिपोर्टर की नज़र से देखें सौ दिन का किसान आंदोलन

किसान नेताओं का किसानों पर दबाव होने के बजाय अब किसानों का दबाव किसान नेताओं पर कायम हो चुका है। किसानों के बीच अब यह आम सहमति बन चुकी है कि वे कानून बिना वापस कराए आंदोलन से उठने वाले नहीं हैं। सरकार के खिलाफ अविश्वास की लकीर भी मोटी होती जा रही है। यह खाई आने वाले दिनों में सरकार पाट पाएगी, इसकी उम्मीद न के बराबर है।

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एक लड़ाई मुहब्बत की: यलगार परिषद 2021 में अरुंधति रॉय का भाषण

हमें उन फंदों से सावधान रहना होगा, जो हमें सीमित करती हैं, हमें बने-बनाए स्टीरियोटाइप सांचों में घेरती हैं. हममें से कोई भी महज अपनी पहचानों का कुल जोड़ भर नहीं है. हम वह हैं, लेकिन उससे कहीं-कहीं ज्यादा हैं. जहां हम अपने दुश्मनों के खिलाफ कमर कस रहे हैं, वहीं हमें अपने दोस्तों की पहचान करने के काबिल भी होना होगा. हमें अपने साथियों की तलाश करनी ही होगी, क्योंकि हममें से कोई भी इस लड़ाई को अकेले नहीं लड़ सकता.

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मेरी यादों में मंगलेश: पांच दशक तक फैले स्मृतियों के कैनवास से कुछ प्रसंग

एक दिन पहले ही मैंने फोन पर किसी का इंटरव्यू किया था और फोन का रिकॉर्डर ऑन था। दो दिन बाद मैंने देखा कि मेरी और मंगलेश की बातचीत भी रिकॉर्ड हो गयी है। उसे मैंने कई बार सुना- ‘‘आनंद अभी मैं मरने वाला नहीं हूं’’ और सहेज कर रख लिया।

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असाधारण, अप्रत्याशित, अभूतपूर्व: एक नज़र में 2020 का पूरा बहीखाता

एक ऐसा वर्ष जो चार जीवित पीढ़ियों ने अपने जीते जी नहीं देखा! एक ऐसा वर्ष जिसकी न हमने कल्पना की, न आगे करेंगे। 2020- असामान्य, अप्रत्याशित और अभूतपूर्व साल, जिसे हम भूलना चाहेंगे पर भुला नहीं पाएंगे। एक परिक्रमा पूरे वर्ष की घटनाओं के आईने में।

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पूंजी-विस्तार और संसाधनों की लूट के बीच हाशिये की औरतों की जिंदगी, श्रम और प्रतिरोध

जाति, जातीयता, वर्ग के पदानुक्रम और राज्‍य के प्रभुत्‍व सहित कलंकीकरण के सभी औज़ारों के साथ मिलकर पितृसत्‍ता औरतों के श्रम का शोषण करती है, उनकी आवाजाही व मेहनत पर नियंत्रण कायम करती है। नतीजतन, साधनों-संसाधनों तक उनकी पहुंच को और कम कर देती है।

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सड़क से सलाखों तक: CAA विरोधी आंदोलन की पहली बरसी पर मऊ में हुए दमन की रिपोर्ट

16 दिसंबर 2019 को मऊ शहर में भी व्यापक तौर पर विरोध दर्ज किया गया। यूपी में मऊ पहला जिला था जहां से आम जनता इस असंवैधानिक नागरिकता कानून के खिलाफ बड़े पैमाने पर सड़कों पर उतरी जिसके बाद देखते-देखते पूरा सूबा आंदोलन में शामिल हो गया। आन्दोलन की बढ़ती व्यापकता से डर कर योगी सरकार ने गैंगेस्टर, गुंडा एक्ट, जिलाबदर, रासुका जैसे हथियार इस्तेमाल किए।

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नयी संसद का भूमिपूजन: आधुनिक लोकतंत्र और संगठित धर्म के बीच आवाजाही का सवाल

प्रधानमंत्री बारंबार संसद भवन को लोकतंत्र के मंदिर की संज्ञा देते रहे हैं किंतु मंदिर की भूमिका धर्म के विमर्श तक ही सीमित रहनी चाहिए। नए संसद भवन को तो स्वतंत्रता, समानता, न्याय और तर्क के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए।

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