भारत में सहमति आधारित समावेशी राष्ट्रवाद का उभार और पतन: पुस्तक अंश

मेरी उम्र के भारतीय, जो आज़ादी के कुछ साल बाद पैदा हुए, उनके भीतर राष्ट्रवाद को किसी शासनादेश के माध्यम से नहीं भरा गया। माहौल ही कुछ ऐसा था कि वह अपने आप भीतर अनुप्राणित होता गया। हमें इस बात को परिभाषित करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि हम भारतीय क्यों और कैसे थे, बावजूद इसके कि हमने बिलकुल तभी विभाजन की खूंरेज़ त्रासदी झेली थी जिसे सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के नाम पर अंजाम दिया गया था।

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भारत क्या है? राज्यों का संघ या एक राष्ट्र?

आधुनिक युग में सामान्य रूप से राष्ट्र शब्द इंग्लिश शब्द नेशन का हिंदी रूपांतर माना जाता है। राष्ट्र, राज्य, राष्ट्रीयता, संघ सब अलग-अलग शब्द हैं, उनके अलग-अलग अर्थ हैं और उनकी अलग-अलग व्याख्याएं हैं, यह सभी समानार्थी नहीं हैं। सामान्यतया राष्ट्र और राज्य को एक मान लिया जाता है, जबकि दोनों अलग-अलग हैं।

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अनुभव, कल्पना और न्याय: एक समतापूर्ण समाज के निर्माण पर औपनिवेशिक छायाएं

समाज की नेतृत्वकारी भूमिकाओं और शक्ति-संरचना को नियंत्रित करने वाले दायरों में जब नए समूह जैसे दस्तकार, अछूत, महिलाएँ, छोटे किसान और श्रमिक शामिल हुए तो उन्होंने उस दुनिया पर सवाल उठाए जिसके बारे में कहा जा रहा था, इसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने ईश्वर के द्वारा बनायी गयी दुनिया और उसकी व्याख्या में अपने अनुभवों के वृत्तांतों से धक्का मार दिया।

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संविधान में वर्णित स्वतंत्र नागरिक नये भारत में आखिर कैसे बन गया दया का पात्र लाभार्थी?

यह कैसे हो गया कि आजादी के 75 साल बाद भी देश के नागरिक दो जून की रोटी भी जुटा पाने में असमर्थ है? तो क्या यही आर्थिक रूप से असमर्थ नागरिक लाभार्थी में बदल दिए गए हैं? सवाल है कि क्या हमारे देश के स्वतन्त्र नागरिक अब लाभार्थी हो गए?

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राज्य-विभाजन की ओर बढ़ते झारखंड के भाषा आंदोलन को अतीत के आईने में कैसे समझें

भाषा, क्षेत्रीयता, धर्म, संप्रदाय, जातिवाद, राजसत्ता के ऐसे हथियार हैं जिसका समय-समय पर प्रयोग करके सत्ताएं जनता की एकता को तोड़ती रहती हैं। महाराष्ट्र और गुजरात में क्षेत्रीयता के नाम पर दूसरे प्रान्तों के मजदूरों के साथ क्या हुआ था? इस घटना को बीते अभी बहुत साल नहीं हुए।

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मारिबू पाछे डरिबु नाहि, जनम माटि छाड़िबु नाहि! POSCO से JSW तक ओडिशा के किसानों का संघर्ष

ढिंकिया की घटनाएं इस क्षेत्र से बाहर रहने वालों से एक बार फिर पूछ रही हैं कि क्या उपजाऊ कृषि भूमि को इस्पात उत्पादन उद्यमों द्वारा निगलने दिया जा सकता है? पूर्वी तटरेखा इक्‍कीसवीं सदी की पारिस्थितिकीय बर्बादी की गवाह बन रही है। अधिक मुनाफ़ा कमाने की नीयत से इस इलाक़े में जिंदल स्टील वर्क्स का प्रवेश पूंजीवाद के बेलगाम अभियान में अंतर्निहित पारिस्थितिक संकट की एक जीती-जागती मिसाल है।

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पूंजीवाद और लोकतंत्र के ऐतिहासिक रिश्तों के आईने में संवैधानिक मूल्यों की परख

चिली से यह नवउदारवाद शुरू हुआ था। आज वहां शिक्षा के व्यावसायीकरण के खिलाफ चलने वाले आन्दोलन का छात्र नेता राष्ट्रपति चुना गया है। चक्र पूरा हो चुका है। अलेंदे को हटा कर पिनोचे को बैठा कर जो प्रयोग किया गया, पूरी दुनिया में जिसे फैलाया गया वह वहीं अपनी पुरानी जगह फिर पहुँच गया। जिन मुल्कों में 30 साल पहले नवउदारवादी नीतियां और सुधार लागू किये गये उन सभी मुल्कों में सत्र पूरा होने की घंटी बज रही है।

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आधार को वोटर ID से जोड़ना क्यों एक नरसंहार को निमंत्रण है?

वोटर ID कार्ड को आधार से लिंक करने वाला चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 विपक्ष के विरोध के बावजूद 21 दिसंबर को राज्य सभा से भी पास हो गया। ये विधेयक एक दिन पहले ही लोकसभा से पास हुआ था। विधेयक को स्थाई समिति के पास भेजने की मांग को ठुकरा दिया गया। चुनाव कानून (संशोधन) बिल, 2021 में वोटर ID कार्ड को आधार संख्या से लिंक किए जाने का प्रावधान है।

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विशालकाय डैनों वाला एक नितांत बूढ़ा आदमी

बंदी बनाये गए फ़रिश्ते की ख़बर इतनी तेज़ी से फैली कि कुछ ही घंटों में आँगन में बाज़ार जैसी चहल-पहल हो गयी। भीड़ घर को ही ढहाने पर तुली थी। उसे काबू में करने के लिए संगीनों से लैस सैन्य दस्‍ता बुलाना पड़ा। एल्सिंदा की कमर भीड़ का फेंका कचरा बुहारते-बुहारते अकड़ चुकी थी। तभी उसे आँगन में बाड़ लगाने और फ़रिश्ते की एक झलक के लिए पाँच सेंट वसूलने का ख़याल आया।

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पांच दशक से कविता के ‘अंधेरे में’ भटकता मुक्तिबोध का कहानीकार

मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया में कविता चूंकि कहानी लिख पाने में हासिल विफलता के बाद आती है (जिसका उद्देश्य महज खुद को प्रकट कर के खो देना है), फलस्वरूप मुक्तिबोध के ही लेखे ‘‘साहित्यिक फ्रॉड’’ का अनुपात उनकी कविताओं में उनकी कहानियों के बनिस्बत कहीं ज्यादा है।

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