हिंदुत्व की भ्रामक अवधारणा के बरक्स भारत की विवेकवादी परंपरा

प्रकृति और मानव शरीर के सजग निरीक्षक के रूप में भारत के प्रारंभिक वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने मानवीय ज्ञानेन्द्रियों का अध्ययन किया, स्वप्न, स्मरण शक्ति और चेतना का विश्लेषण किया। उनमें जो सर्वश्रेष्ठ थे उन्होंने प्रकृति के द्वंद को गुणात्मक और परिमाणात्मक दोनों रूप से समझा तथा आधुनिक परमाणु सिद्धांत के एक प्रारंभिक ढांचे की भी परिकल्पना कर ली। यह तर्कवादी आधार ही था जिस पर भारतीय सभ्यता पल्लवित हुई।

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वियना में सपना उर्फ़ न्यूक्लियर डील के सोलह साल

18 जुलाई 2005 को हिन्दुस्तान नाम की ‘तूफ़ान से निकालकर लायी कश्ती’ ने खुद को ऐसे ग्लोबल जहाज से जोड़ लिया जिसे हांकने का तरीका, रफ़्तार, ईंधन और तासीर सब कुछ काफी अलग था। और इसलिए इस ‘डील’ के बाद देश की राजनीति, समाज और हमारी सामूहिक नैतिकता में कई खामोश लेकिन दूरगामी परिवर्तन संपन्न हुए, जिनमें से कुछ की शुरुआत नब्बे के दशक के व्यापार समझौतों से हुई थी।

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भारतीय आधुनिकता, स्वधर्म और लोक-संस्कृति के एक राजनीतिक मुहावरे की तलाश

इस कड़वे सच को स्वीकार करना होगा कि पिछले 25-30 साल की हार, खासतौर से राम जन्मभूमि के आंदोलन के बाद की हार, सिर्फ चुनाव की हार नहीं है, सत्ता की हार नहीं है, बल्कि संस्कृति की हार है। हम अपनी सांस्कृतिक राजनीति की कमजोरियों की वजह से हारे हैं।

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राजनीतिक उत्प्रेरक के रूप में सांप्रदायिकता का इस्तेमाल और राष्ट्रीय आंदोलन से सबक

दुर्भाग्य से हमारे कुछ बुद्धिवादियों के पास साम्प्रदायिकता एक ऐसा बांड है जिसे वे कभी भी और कहीं भी भुना सकते हैं। साम्प्रदायिकता पर उनका इतना विशद अध्ययन है कि अब उनसे कोफ़्त होने लगी है क्योंकि पूरे भारतीय समाज की हर समस्या को वे साम्प्रदायिकता से कमतर आंकते हैं। यह भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है।

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‘दुनिया के मजदूरों एक हो’, लेकिन कैसे? भारत में श्रम के परिदृश्य पर एक नज़र

कोरोना से बचाव की हमारी यह कोशिशें हमारी आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप में व्यापक और कई क्षेत्रों में तो आमूलचूल परिवर्तन ला रही हैं। नयी कार्य संस्कृति तकनीकी के प्रयोग द्वारा एक ऐसी व्यवस्था बनाने की वकालत करती है जिसमें ह्यूमन इंटरफेस न्यूनतम हो। ऐसे में तकनीकी का प्रयोग धीरे-धीरे मनुष्य की भूमिका को नगण्य और गौण बना देगा।

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सांप्रदायिक माहौल में चुनावी हार-जीत का मतलब: संदर्भ पश्चिम बंगाल

जब सांप्रदायिक और नफ़रत की राजनीति के पक्ष में हम वोट देते हैं तो दरअसल हम उन्हें चुन रहे होते हैं। ऐसा करते हुए हम अपनी सांप्रदायिक सोच के मुताबिक काम कर रहे होते हैं। इसलिए सांप्रदायिकता के विरोध में खड़े हर किसी को इस खतरे को पहचानना होगा।

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कोरोना वायरस और ‘चेर्नोबिल मोमेंट’ का प्रहसन

इसी तरह की अदृश्यता का आतंक 26 अप्रैल 1986 को चेर्नोबिल के निवासियों ने झेला जब उन्हें घंटों के अन्दर अपना सब कुछ जैसे-का-तैसा छोड़कर जाना पड़ा. जैसे अभी गली-चौराहों पर लोग बायोटेक्नोलॉजी और एपिडेमियोलॉजी की शब्दावली में दीक्षित हो रहे हैं वैसे ही चेर्नोबिल और उसके बाद फुकुशिमा दुर्घटना ने रेडियेशन से जुड़ी पारिभाषिकी को जिंदा रहने की शर्त बना दिया.

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भारत, पूंजीवाद, राष्ट्रवाद, साहित्य और राजनीति पर अरुंधति रॉय से सात सवाल

किसी नदी को आप विषमुक्‍त कैसे करते हैं? मेरे खयाल से, विष खुद-ब-खुद उसमें से निकल जाता है। बस, बहती हुई धारा अपने आप ऐसा कर देती है। हमें उस धारा का हिस्सा बने रहना होगा।

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कथा कलकत्ता: एक बौद्धिक समाज के अवसान के सात दशक की आंखों देखी स्मृतियां

जिस कलकत्ते का मैंने जिक्र किया वह तो विलुप्त हो गया। अब तो बस दो-चार नामलेवा लेखक-कवि रह गए हैं जो जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। कविता के क्षेत्र में युवा पीढ़ी की संख्या इतनी है कि आप गिन नहीं सकते जबकि इनकी कविता में सबकुछ होता है पर कविता नहीं होती। कहानी लेखन का भी वही हाल है। संस्थाओं और मंचों पर कब्ज़ा ऐसे लोगों का है जो अपने प्रिय और प्रियाओं को मंच देते हैं। गंभीर लिखने वालों को दूर रखते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं उनको मंच दिया तो इनकी विद्वता की कलई न खुल जाए।

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“…ताकि स्‍पार्टकस का सपना हमारे समय में सच हो सके”: हॉवर्ड फास्ट कृत महान उपन्यास के 70 साल

संघर्ष की असली पराजय आत्मा की पराजय है और सभी श्रेष्ठ मानवतावादी कलाकारों की भांति हावर्ड फास्ट के यहां भी आत्मा कभी पराजित नहीं होती, उसका अजेय स्वर कभी मन्द नहीं पड़ता। दास युग के बाद भी वह आदिविद्रोही, वह स्पार्टकस वह हमारा पुरखा लौटा है और बार-बार लौटा है, करोड़ों की संख्या में लौटा है जहां-जहां भी न्याय और स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिये संघर्ष हुए हैं और रक्त बहा है, स्पार्टकस वहां मौजूद रहा है।

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