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चालीस प्रतिशत महिला प्रत्याशी का फैसला यदि ‘राजनीति’ है, तो यही अच्छी और खालिस राजनीति है!

जिस प्रदेश में आज तक कमोबेश श्मशान-कब्रिस्तान, धर्म और जाति जैसे जहरीले मुद्दों पर चुनाव लड़ा गया वहां इस तरह की क़वायद एक बड़ी उम्मीद लेकर आती दिख रही है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले से सब अच्छा हो गया है, लेकिन यह फैसला एक बुनियादी गैर-बराबरी को पाटने की तरफ बढ़ाया गया उम्मीद भरा कदम है जिसका चतुर्दिक स्वागत होना चाहिए।

Voices

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असंचारी रोगों (NCD) से होने वाली मौतों पर केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव को NHRC का नोटिस

राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जनपथ पर प्रकाशित एक स्‍तम्‍भ के आधार पर दायर की गयी याचिका का संज्ञान लेते हुए भारत सरकार के स्‍वास्‍थ्‍य सचिव को एक नोटिस भेजा है और चार सप्‍ताह के भीतर जवाब मांगा है। मामला पैकेज्‍ड खाद्य पदार्थों के कारण होने वाले असंचारी रोगों से जुड़ा है जो देश में हो रही असमय मौतों का एक बड़ा कारण है।

Editor’s Choice

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अमित शाह को क्यों कहना पड़ा कि मोदी निरंकुश नहीं हैं!

सवाल यह है कि मोदी के गुजरात और दिल्ली में सफलतापूर्वक दो दशकों तक सरकारें चला लेने के बाद अचानक से इस तरह के सवाल के पूछे जाने (या पुछवाये जाने) की ज़रूरत क्यों पड़ गयी होगी? जनता तो इस आशय की संवेदनशील जानकारी की साँस रोककर प्रतीक्षा भी नहीं कर रही थी। सरकार और पार्टी में ऐसे मुद्दों पर बंद शयनकक्षों में भी कोई बातचीत नहीं होती होगी।

Lounge

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क्या स्वाधीनता संग्राम को गति देने के लिए सावरकर जेल से बाहर आना चाहते थे?

इतिहास के नए पाठ में इस बात को बार-बार रेखांकित किया जा रहा है कि सावरकर के माफीनामे जेल से बाहर निकलकर पुनः क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने का मौका प्राप्त करने की रणनीति का हिस्सा थे। यह देखना रोचक होगा कि सेल्युलर जेल से रिहा होने के बाद सावरकर के साथी क्रांतिकारियों का जीवन किस प्रकार बीता।

COLUMN

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बात बोलेगी: बिजली आ गयी है, लेकिन अर्द्ध-सत्य का अंधेरा कायम है!

सावरकर ने माफी मांगी यह सच है और गांधी ने ऐसा करने को कहा यह झूठ है। जब ये दोनों एकमेक हो गए तब जो परिणाम आए वो ये कि या तो दोनों बातें झूठी हैं या दोनों ही बातें सच हैं या दोनों ही आधा सच और आधा झूठ है। इस तरह से एक अर्द्ध-सत्य पैदा हो गया।

Review

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एक देश बारह दुनिया: एक पत्रकार के भीतर बैठे साहित्यकार का शोकगीत

यह किताब यात्रा की तो है, लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!

Blog

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खूब पहचान लो असरार हूं मैं, जिन्स-ए-उल्फत का तलबगार हूं मैं…

। दुर्भाग्य यह कि हमारे देश के नक्काद (आलोचक) उन्हें कभी इंकलाब के सांचे में फिट करते तो कभी उर्दू का कीट्स करार दे अपनी ऊर्जा जाया करते रहे। मजाज़ को मजाज़ की नजर से देखने की कोशिश नहीं की गई।