Open Space

View All

इतिहास बहुत क्रूर होता है, प्रधानसेवक महोदय! जन्मदिन की शुभकामनाएं…

गडकरी की बात डराती है, सीएम और मिनिस्टर्स का डर डराता है, किसी को आपके अगले मूव, अगली चाल का पता न होना डराता है। सूचनाओं का एकतरफा प्रवाह डराता है, शासन का बिल्कुल केंद्रशासित हो जाना डराता है। आज ट्विटर पर हो रहे ख़तरनाक ट्रेंड डरा रहे हैं, एक गुट भक्तएंथम ट्रेंड कर रहा है, तो दूसरा अखंड पनौती दिवस ट्रेंड करवा रहा है, समाज का इतना तीखा बंटवारा डरा रहा है।

Voices

View All

जयपुर में हुआ किसान संसद का आयोजन, गुजरात से पहुंचा किसान दस्ता गाजीपुर!

अधिकांश कृषि घराने सरकार द्वारा घोषित एमएसपी से अनजान थे, और एपीएमसी मंडियों में फसल बेचने में सक्षम नहीं होने के लिए बुनियादी ढांचे की कमी (यानी मंडियों या खरीदारों की अनुपलब्धता) को जिम्मेदार ठहराया — उल्लेखनीय यह है कि इन दो दौर के सर्वेक्षणों के बीच एमएसपी और मंडी प्रणाली की स्थिति खराब हो गई है। ये तथ्य कॉरपोरेट के पक्ष में सरकारी मंडियों के कमजोर किए जाने के बड़े आख्यान में फिट होते हैं, और तीन कृषि कानूनों के वास्तविक उद्देश्य को प्रत्यक्ष करते हैं।

Editor’s Choice

View All

तालिबान : भू-राजनीतिक परदे के पीछे

तालिबान के सत्तारोहण को भी एक आभासी फ्रेमवर्क में रख कर अफगानिस्तान में उसके आने को नए-नए मायने दिए जा रहे हैं लेकिन इन सब के सार में एक ही बात है कि तालिबान के आने से अफगानिस्तान पीछे चला गया है.

Lounge

View All

मुक्तिबोध ने अपने को मारकर कविता को जिला लिया- हम लोगों तक पहुंचाने के लिए!

मुक्तिबोध की रचनाएं सृजन का विस्फोट हैं। वे सजग चित्रकार की भांति दुनिया का सुंदरतम उकेरना चाहते हैं। वे चाहते हैं उजली-उजली इबारत, मगर अंधेरे बार-बार उनकी राह रोक लेते हैं। अंधेरों के चक्रव्यूह में घिरे वे अभिमन्यु की तरह अकेले ही जूझते हैं अनवरत लगातार। यह युद्ध कभी खत्म नहीं होता, चलता ही रहता है उनके भीतर। वे लड़ते हैं आजीवन क्योंकि उन्हें लगता है कि उन जैसों के हाथ में सच की विरासत है; जिसे उन्हें आने वाले समय को, पीढ़ी को ज्यों का त्यों सौंपना है।

COLUMN

View All

बात बोलेगी: पालतू गर्वानुभूतियों के बीच खड़ी हिंदी की गाय

आप हिन्दी बरतते हैं क्योंकि आपको आसान लगता है। आप हिन्दी पढ़ते हैं, लिखते हैं, समझते हैं तो इसलिए क्योंकि उस भाषा में आप खुद को सहज पाते हैं और इसलिए भी कि वो आपके काम की ज़रूरत है और इसलिए भी कि क्योंकि उसमें आपको काम करने को कहा गया है। तब दुनिया में ऐसी कौन सी भाषा है जो इन तीनों में परिस्थितियों में ही बरती न जाती हो?

Review

View All

करनाल में किसानों के सिर फटे तो दिल्ली में संपादकों की आत्मा मर गयी!

हिंदुस्तान टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस, द एशियन ऐज, द हिंदू, द इकनॉमिक टाइम्स, द पायनियर जैसे किसी भी बड़े अंग्रेजी अखबार की संपादक मंडली को किसान नजर नहीं आए।

Blog

View All

ये महापंचायत नहीं, समारोह है! किसानों के जुटान से हलकान एक विद्वान का ज्ञान

विद्वान प्रोफेसर इतिहास को परखने की उस विधि का इस्तेमाल नहीं करते दिखते जिसे उन्होंने खुद ही अनगिनत बार पढ़ा-पढ़ाया होगा। कोई दागिस्तानी लेखक-शायर जरूर इस लहजे में कहता कि अगर वीरान सर्द रात में एक अदद​ चिंगारी के मायने नहीं मालूम तो आप भारी भूल कर रहे हैं। और चिंगारी को भूसे के ढेर पर पटक देने से भी अच्छे नतीजे की उम्मीद करना नासमझी होगी, चिंगारी को सुलगाए रखना सबसे जरूरी है।