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आजमगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा: विकास के नाम पर लूट और विनाश का एक और खेल

लोग यह पूछ रहे हैं कि आजमगढ़ के आसपास वाराणसी, कुशीनगर, गोरखपुर, अयोध्या और अब तो लखनऊ (क्योंकि पूर्वांचल एक्सप्रेसवे बन जाने से दो-ढाई घंटे में लखनऊ पहुंचा जा सकता है) में भी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे होते हुए आखिर यहां हवाई अड्डे की क्या जरूरत है और दूसरा बनाना भी है, तो उपजाऊ जमीन पर क्यों बनाया जा रहा, कोई बंजर भूमि क्यों नहीं चुनी गई?

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‘साम्प्रदायिकता और कॉरपोरेट, दोनों ही खतरों से लेखक लेंगे लोहा’! प्रलेस सम्मेलन में लेखकों ने लिया संकल्प

‘प्रगतिशील लेखन आंदोलन- चुनौतियां और दायित्व तथा बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में लेखकों की भूमिका’ विषय पर सम्मेलन में अनेक विद्वान वक्ताओं ने अपने विचार रखे। संपन्न आयोजन में साहित्य संस्कृति के अनेक रंग देखे गए।

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दिल्ली में धर्मांतरण: भाजपा और आप दोनों डरपोक

भाजपा से भी ज्यादा डरपोक निकली आप पार्टी! उसने अपने मंत्री को इस्तीफा क्यों देने दिया? वह डटी क्यों नहीं? उसने वैचारिक स्वतंत्रता के लिए युद्ध क्यों नहीं छेड़ा? क्योंकि भाजपा, कांग्रेस और सभी पार्टियों की तरह वह भी वोट की गुलाम है। हमारी पार्टियों को अगर सत्य और वोट में से किसी एक को चुनना हो तो उनकी प्राथमिकता वोट ही रहेगा

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संवैधानिक मूल्यों का प्रसार और बंटे हुए दिमाग की दिक्कतें: आत्म-निरीक्षण के लिए कुछ बिन्दु

संवैधानिक मूल्यों पर अपने ऊपर काम करने की प्रक्रिया में अपने भीतर बैठे बंटवारे/पहचानों को संबोधित करना ही सबसे जरूरी बात है। ‘हम’ बनाम ‘वे’ का बंटवारा हल किये बगैर मूल्‍यों के रास्‍ते पर कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए अनुभव के रास्ते मूल्यों को आत्‍मसात करने का काम और अपने भीतर के बंटवारों को संबोधित करने का काम एक साथ चलाया जाना चाहिए।

COLUMN

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संक्रमण काल: डेढ़ दशक पहले निकली एक लघु-पत्रिका में प्रासंगिक तत्वों की तलाश का उद्यम

यह अनायास ही नहीं कहा जा रहा कि मशीनें जिस तेज गति से चिकित्सा विज्ञान में नई-नई खोजें करने में सफल हो रही हैं, उससे संभावना है कि अगर नोबल देने का मौजूदा पैमाना बरकरार रहा तो वर्ष 2036 तक नोबेल पुरस्कार किसी मशीन को देना होगा।

Review

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मट्टो की सायकिलः विकास की राजनीति और जाति के दंश का सिनेमाई आईना

यह कहानी सिर्फ़ मट्टो की नहीं है। यह उस दर्ज़े के लोगों की कहानी है जो हिंदुस्तान के निर्माण में अपना सब कुछ लगा देते हैं। जिनके दम पर इंडिया फ़र्राटे भरता है, पर मट्टो जैसे लोग रेंगने को मजबूर हैं। आगे बढ़ने वाले देश में पीछे छूट जाने वाले लोगों की कहानी, जो सिर्फ़ आर्थिक वजह से पीछे नहीं छूटते बल्कि अपनी जाति की वजह धकेल दिए जाते हैं।

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शिक्षा में तत्कालीन चुनौतियां और महात्मा गांधी

देश में व्याप्त तत्कालीन जितनी भी समस्याएं हैं, उनके निवारण हेतु महात्मा गाँधी द्वारा 1937 (वर्धा शिक्षा योजना) में प्रस्तावित शिक्षा नीति जिसे ‘बेसिक शिक्षा’ के नाम से जाना जाता है, बहुत ही उपयुक्त है।