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अस्पतालों में महिलाओं का यौन उत्पीड़न और समाज की भूमिका: संदर्भ भागलपुर

अस्पतालों और मेडिकल क्लीनिकों में यौन उत्पीड़न की और भी अनगिनत मौखिक कहानियां हैं जिन्‍हें सार्वजनिक करने की अनुमति न तो पीड़िता देती है और न ही उसका समाज. इसलिए बिहार की उस महिला के साहस को सलाम करना होगा कि उन्होंने अपनी व्यथा के माध्यम से पूरे भारत में व्याप्त अस्पतालों में इस तरह की मानसिकता का परदाफाश किया.

Voices

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जेल में बंद DU के शिक्षक हैनी बाबू की जिंदगी खतरे में, परिवार ने जारी की अपील

आज भी वकील पायोशी राय के जरिये कई बार जेल में फोन करने के बाद भी हमें किसी तरह का जवाब नहीं मिला है। हमें यह भय है कि यह मलिन व्यवस्था कई जेलों में होगी और वहां भी लोगों को इस तरह का अपूरणीय नुकसान उठाना पड़ रहा होगा।

Editor’s Choice

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‘विफल स्टेट’ और ‘स्टेट की विफलता’ दो अलग बातें हैं, शातिर मीडिया का खेल समझिए!

मीडिया इतना शातिर बन गया है, यह इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी है क्योंकि वही है जो स्टेट के शीर्ष पर बैठे लोगों की विफलताओं को स्टेट की विफलता घोषित कर लोगों के आक्रोश की धार को मोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह हमें बताना चाहता है कि हमने ऐसा ही स्टेट बनाया है तो आज इस भयंकर त्रासदी में तमाम विफलताओं के सबसे बड़े दोषी हम ही हैं।

Lounge

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‘दुनिया के मजदूरों एक हो’, लेकिन कैसे? भारत में श्रम के परिदृश्य पर एक नज़र

कोरोना से बचाव की हमारी यह कोशिशें हमारी आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप में व्यापक और कई क्षेत्रों में तो आमूलचूल परिवर्तन ला रही हैं। नयी कार्य संस्कृति तकनीकी के प्रयोग द्वारा एक ऐसी व्यवस्था बनाने की वकालत करती है जिसमें ह्यूमन इंटरफेस न्यूनतम हो। ऐसे में तकनीकी का प्रयोग धीरे-धीरे मनुष्य की भूमिका को नगण्य और गौण बना देगा।

COLUMN

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बात बोलेगी: बीतने से पहले मनुष्यता की तमाम गरिमा से रीतते हुए हम…

हम पिछली सदी से ज़्यादा नाकारा साबित हुए। हमने संविधान को अंगीकार किया और अपनी आवाजाही और बोलने की आज़ादी पर बलात् तालाबन्दी को भी अंगीकार किया। हम एक अभिशप्त शै में तब्दील हो गये। हम न मनुष्य रहे, न नागरिक हो सके। हम कुछ और बन गये, जिसके बारे में अगली सदी में चर्चा होगी।

Review

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दक्षिणावर्त: दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख…

टीवी सीरीज में या पूरे समाज में जो हो रहा है, वह एक-दूसरे का पूरक है या प्रतिबिंब? यदि प्रतिबिंब है तो जो बेचैनी, जो क्रांति न्यूज-चैनल्स को देख कर महसूस होती है, वह मोटे तौर पर समाज में अनुपस्थित क्यों है, जो समस्याएं या टकराव बहुमत वाले समाज में हैं, वह टीवी या सिनेमा से अनुपस्थित क्यों है?

Blog

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आप यहूदियों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे गोएबल्स की मौत का शोक मनाएं?

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद दंगल के ‘मुस्लिम-मुक्त भारत’ जैसे शो से प्रभावित होकर तुम्हारा पड़ोसी जो तुम्हारे हर सुख दुःख में साथ रहा हो और तुम उसके सुख दुःख में साथ रहे हो, अचानक एक दिन आकर तुम्हारे सामने तुम्हारे पिता जी से कहे कि मुझे तुम्हारा घर पसन्द है, जाते वक्त (पाकिस्तान) मुझे देकर जाना। ये सुनकर आप पर क्या गुजरेगी?