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पंजाब: एक सजायाफ्ता मुजरिम के भरोसे हो रहे चुनाव में डेरे का रुझान किधर?

राजनीतिक तौर पर डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत सिंह राम रहीम की परोल के कई मायने हो सकते हैं। कांग्रेस की अंदरूनी कलह ने अभी से पंजाब में कांग्रेस की कोई लहर बनने की संभावनाओं को हाशिये पर डाल दिया है। डेरा का झुकाव कांग्रेस के तरफ होना मुमकिन नहीं लगता । शिरोमणि अकाली दल (बादल) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कोई समर्थन अब अपनी साख के सवाल पर गुरमीत सिंह से ले नहीं पाएगा। भाजपा अकेले पंजाब में इतनी सीट जीतने की स्थिति में फ़िलहाल दिखाई दे नहीं रही है कि वो सरकार बना सके। आम आदमी पार्टी के प्रति असंतोष इस क्षेत्र में बहुत बढ़ा हुआ है।

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पुनर्वास नहीं, नर्कवास : केन-बेतवा परियोजना पर CPI के प्रतिनिधिमंडल की रिपोर्ट

भारत सरकार और सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा  भी है कि विस्थापित लोगों का पुनर्वास इस प्रकार करना चाहिए कि उनसे जो जीवन छीना गया है, उनके लिए उससे बेहतर जीवन सुनिश्चित किया जा सके। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना में बेहतर जीवन तो दूर की बात है, सामान्य मनुष्यों की तरह का जीवन भी उन लोगों को नहीं दिया गया है, जिनसे उनका जंगल, खेत, खलिहान, गाँव, सबकुछ सरकार ने विकास के नाम पर छीन लिया गया।

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जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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सुविधा और दृश्यता के एक ईवेंट में नैतिक वैधता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का प्रश्न

राजनीतिक सफलता का अर्थ केवल सही तर्क होना नहीं है। उसका अर्थ सही तर्क को उस भाषा में प्रस्तुत करना भी है जिसे समाज का बड़ा हिस्सा समझ सके। गांधी इसी कला के उस्ताद थे। उन्होंने जटिल राजनीतिक विचारों को अत्यंत सरल प्रतीकों में बदल दिया। यही कारण था कि उनका संदेश देश के सबसे दूरस्थ गाँव तक पहुँच गया।

COLUMN

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संक्रमण काल: CJP के आंदोलन और उसके चेहरों की सामाजिक पृष्ठभूमि

सीजेपी नया और तेजी से बदलता आंदोलन है। उसके सामाजिक चरित्र पर अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी। फिर भी सवाल महत्वपूर्ण है: क्या यह केवल एक राजनीतिक आंदोलन है, या भारतीय समाज में किसी गहरे बदलाव की आहट भी है?

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काशी: पुस्तक परिचर्चा के दौरान शहर की बहुलतावादी संस्कृति पर सघन बहस

काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष 1957 से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है, इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।

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आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान

डॉ.  जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता।