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भारत के मुसलमान शिक्षा मंत्रियों के खिलाफ खुला नया मोर्चा इस्लामोफोबिया की उपज है

भारत पर अपने राज को मजबूती देने के लिए अंग्रेजों ने सांप्रदायिक चश्मे से इतिहास का लेखन करवाया और आगे चलकर इतिहास का यही संस्करण सांप्रदायिक राजनीति की नींव बना और उसने मुसलमानों के बारे में मिथ्या धारणाओं को बल दिया.

Voices

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मजदूर एकता केंद्र ने श्रम क़ानूनों में बदलाव के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल में निभाई हिस्सेदारी!

मजदूर एकता केंद्र मांग करता है कि श्रम-क़ानूनों के स्थगन को तुरंत वापस लिया जाये| साथ ही, राज्य सरकारों से कंपनियों और कॉर्पोरेटों के हित में मजदूरों के अति-शोषण की इजाज़त देने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग करता है|

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हिरोशिमा के पचहत्तर साल: भारत में किसका अगस्त है?

आज भारत के प्रधानमंत्री ने इस पर पहले जैसी रस्म-अदायगी के तौर पर भी कुछ नहीं कहा है जबकि उनके ट्विटर पर मंदिर की भव्यता और ऐतिहासिकता पर एक दर्जन से अधिक टीपें शाया हुई हैं.

Lounge

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भारत छोड़ो आंदोलन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सैद्धांतिक असहमतियाँ क्या थीं?

सावरकर गांधी जी की अहिंसक रणनीति से इस हद तक असहमत थे कि गांधी जी की आलोचना करते करते कई बार वे अमर्यादित लगने वाली भाषा का प्रयोग करने लगते थे। सावरकर की पुस्तक गांधी गोंधल पूर्ण रूप से गांधी की कटु आलोचना को समर्पित है।

COLUMN

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तन मन जन: कोरोना से बची जान तो दिल और गुर्दे कमज़ोर, फेफड़े खराब!

वुहान में अप्रैल 2020 तक ठीक हो चुके कोरोना वायरस संक्रमित लोगों पर हुए इस सर्वे ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। सर्वे के पहले चरण के परिणामों में कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक हुए मरीजों में 90 फीसद के फेफड़ों का वेंटिलेशन और गैस एक्सचेंज फंक्शन काम नहीं कर रहा है।

Review

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सत्ता और जरायम की समकालीन दुरभिसंधियों के बीच दो अतिकथनों पर खड़ा ‘पाताल लोक’

मूल वस्तु, बड़े स्टार्स, कंटेन्ट, निवेश आदि से निर्मित किए गए इस अतिकथन को हिन्दी के बड़े कवि सच्चिदानंद हीरानंद वात्सयायन ‘अज्ञेय’ की एक बहुत छोटी सी कविता की सामयिक व्याख्या से समझा जा सकता है। अज्ञेय की मूल कविता है- “साँप/तुम सभ्य तो हुए नहीं/ नगरों में बसना/ तुम्हें नहीं आया/ एक बात पूछूं/ ये डसना कहाँ से सीखा/ ये विष कहाँ से पाया?”

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एक महामारी का आविष्कार: इतालवी दार्शनिक जॉर्जो आगम्बेन का चर्चित ब्‍लॉग

इतालवी दार्शनिक जॉर्जो आगम्बेन कोविड के दौर में चर्चा में रहे हैं। अकादमिया में संभवत: वे पहले व्यक्ति थे, जिसने नावेल कोरोना वायरस के अनुपातहीन भय के खिलाफ आवाज़ उठाई। कोविड से संबंधित उनकी टिप्पणियों का हिंदी अनुवाद प्रमोद रंजन की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक “भय की महामारी” के परिशिष्ट में संकलित है।