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समरकंद में प्रधानमंत्री का सम्बोधन दार्शनिक है या महत्त्वाकांक्षी?

समरकंद सम्मेलन के दौरान भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुखों के बीच द्विपक्षीय संवाद की आशा बहुत से प्रेक्षकों ने लगाई थी, किंतु स्वयं प्रधानमंत्री इनके प्रति अनिच्छुक नजर आए। चीन से सीमा विवाद और कश्मीर के मसले पर मोदी को वही भाषा बोलनी पड़ती है जो पुतिन यूक्रेन के विषय में बोल रहे हैं।

Voices

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समाज के सवालों का हल आंदोलन तय करेंगे: मुहम्मद शुऐब

सामाजिक कार्यकर्ता रवि शेखर ने कहा कि आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। किसानी के संकट ने देश की किसानों-नौजवानों के सामने जीवन का संकट खड़ा कर दिया है।

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भारत में सहमति आधारित समावेशी राष्ट्रवाद का उभार और पतन: पुस्तक अंश

मेरी उम्र के भारतीय, जो आज़ादी के कुछ साल बाद पैदा हुए, उनके भीतर राष्ट्रवाद को किसी शासनादेश के माध्यम से नहीं भरा गया। माहौल ही कुछ ऐसा था कि वह अपने आप भीतर अनुप्राणित होता गया। हमें इस बात को परिभाषित करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि हम भारतीय क्यों और कैसे थे, बावजूद इसके कि हमने बिलकुल तभी विभाजन की खूंरेज़ त्रासदी झेली थी जिसे सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के नाम पर अंजाम दिया गया था।

COLUMN

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संक्रमण काल: इस देश में मौत की भी जाति होती है!

इस शोध से सामने आए तथ्यों से भारत में मौजूद भयावह सामाजिक असमानता उजागर होती है तथा हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे विकास की दिशा ठीक है। क्या सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के कथित कल्याण के लिए राज्य द्वारा उठाए गए कदम पर्याप्त हैं?

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मट्टो की सायकिलः विकास की राजनीति और जाति के दंश का सिनेमाई आईना

यह कहानी सिर्फ़ मट्टो की नहीं है। यह उस दर्ज़े के लोगों की कहानी है जो हिंदुस्तान के निर्माण में अपना सब कुछ लगा देते हैं। जिनके दम पर इंडिया फ़र्राटे भरता है, पर मट्टो जैसे लोग रेंगने को मजबूर हैं। आगे बढ़ने वाले देश में पीछे छूट जाने वाले लोगों की कहानी, जो सिर्फ़ आर्थिक वजह से पीछे नहीं छूटते बल्कि अपनी जाति की वजह धकेल दिए जाते हैं।

Blog

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पुस्तक संस्कृति का ह्रास

आज लेखक अपने पैसों से पुस्तकें छपवा कर स्वप्रचार कर रहे हैं। यह एक दयनीय स्थिति है। इस स्थिति में साहित्य के नाम पर लेखन, सृजन आत्मभिव्यक्ति भर ही है।