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किसान आंदोलन: बॉर्डरों पर मोर्चा गरम, सरकारी राशन पर बुराड़ी मैदान में फंसे नेता नरम

AIKSCC को अब निर्णायक रूप से पंजाब के किसानों का संदेश मिल गया है। शायद इसी वजह से आज दिन में जब वीएम सिंह ने निरंकारी मैदान से अपील जारी की, तो उन्‍होंने केवल उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखण्‍ड के किसानों को मैदान में आने को कहा। पंजाब और हरियाणा के किसानों का उन्‍होंने जिक्र तक नहीं किया।

Voices

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खेत मजदूरों के हालात और संघर्ष: AITUC का ताज़ा वेबिनार

जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज (जैस), दिल्ली द्वारा भारत में श्रमिक संघर्षों पर केंद्रित वेबिनार का आयोजन किया जा रहा है। यह वेबिनार श्रृंखला की छठवीं कड़ी है।

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किसान आंदोलन के साथ जनता का सिर्फ़ पेट नहीं, उसकी बोलने की आज़ादी भी जुड़ी हुई है!

किसान आंदोलन से निकलने वाले परिणामों को देश के चश्मे से यूँ देखे जाने की ज़रूरत है कि उनकी माँगों के साथ किसी भी तरह के समझौते का होना अथवा न होना देश में नागरिक-हितों को लेकर प्रजातांत्रिक शिकायतों के प्रति सरकार के संकल्पों की सूचना देगा।

Lounge

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A Rabari Woman

लोकतंत्र में हिस्सेदारी और आज़ादी के अनुभव: घुमंतू और विमुक्त जन का संदर्भ

पिछले 12 अक्टूबर 2020 को भारत भर के घुमंतू एवं विमुक्त समुदाय के बुद्धिजीवियों, नेताओं और शोधकर्ताओं ने 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ की 150वीं वर्षगाँठ मनाने का निर्णय लिया है। यह भारतीय इतिहास का कोई गौरवशाली क्षण नहीं है बल्कि यह अन्याय और हिंसा की राज्य नियंत्रित परियोजनाओं का सामूहिक प्रत्याख्यान है।

COLUMN

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दक्षिणावर्त: विश्वास के संकट से घिरा दर्शक और किसान आंदोलन का रंगमंच

जिस वक्‍त हमें सामाजिक क्रांति की जरूरत सबसे अधिक है, उस वक्‍त हम राजनीतिक छद्म में व्यस्त हैं। मूल्य या वैल्यू-सिस्टम को दुरुस्त करने की दरकार मौजूदा वक्त में सबसे अधिक है, तो हम चौबीसों घंटे सोप-ऑपेरा देखते हुए जीवन को भी वही बना चुके हैं।

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लोकप्रिय आध्यात्मिकता की आड़ में पूंजी, सियासत और जाति-अपराधों के विमर्श का ‘आश्रम’

आश्रम सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह सिखाती है कि धर्म को केवल एक पहलू से समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। वो भी भारतीय समाज में तो और नहीं, जिसका आधार ही धार्मिक मान्यताओं पर टिका हो।

Blog

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सुलगती ईंटों का धुआँ: माता जुगरी देवी गाँव के लोग कथा सम्मान प्राप्त दलित चेतना की कहानी

कहानी की चयन समिति के सदस्य वरिष्ठ दलित-चिंतक प्रो. किशोरी लाल रैगर ने अपनी संस्तुति में लिखा है कि “सुलगती ईंटों का धुआँ” दलित चेतना की सशक्त कहानी है जिसमें कहानीकार ने जातिवाद व सामंती सोच के विरुद्ध मिन्ती जैसे जीवट पात्र की रचना की है।