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गोवा: चौपट धंधा, सूने पड़े बीच और ओमिक्रॉन के साये में चुनावी पर्यटकों के सियासी करतब

खूबसूरत समुद्री किनारोंवाला गोवा सभी को लुभाता है लेकिन कोरोना की कसक के बीच खराब आर्थिक हालात से लोग हैरान हैं। धंधा चौपट है, फिर भी चुनाव तो होना ही है, सो दुष्कर हालात में भी गोवा अपनी राजनीति के नये प्रतिमान गढ़ने की तरफ बढ़ रहा है।

Voices

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सर्वोच्च न्यायालय सुधा जी को बिना किसी देरी के तत्काल रिहाई का आश्वासन दे: छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा

सुधा भारद्वाज को यह जमानत इसलिए मिली क्योंकि निर्धारित समय में उनका चालान अधिकृत न्यायालय के समक्ष पेश नहीं किया गया था। साथ ही उसी मामले में 8 और साथियों की जमानत अर्जी ख़ारिज किए जाने पर गंभीर निराशा व्यक्त करते हैं।

Editor’s Choice

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किसान आंदोलन की मांगें WTO की उन शर्तों के विरोध में हैं जिन पर भारत सरकार पहले ही सहमति दे चुकी है!

जनता को अब यह मांग करनी ही पड़ेगी कि भारत सरकार विश्‍व व्‍यापार संगठन से अपने पांव वापस खींचे, उसके चंगुल से राष्‍ट्रीय अर्थव्‍यवस्‍था से जुड़े फैसलों को मुक्‍त करे और देश को बहुराष्‍ट्रीय साम्राज्‍यवादी कंपनियों के बजाय जनता की हित में चलाए।

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पांच दशक से कविता के ‘अंधेरे में’ भटकता मुक्तिबोध का कहानीकार

मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया में कविता चूंकि कहानी लिख पाने में हासिल विफलता के बाद आती है (जिसका उद्देश्य महज खुद को प्रकट कर के खो देना है), फलस्वरूप मुक्तिबोध के ही लेखे ‘‘साहित्यिक फ्रॉड’’ का अनुपात उनकी कविताओं में उनकी कहानियों के बनिस्बत कहीं ज्यादा है।

COLUMN

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बात बोलेगी: विस्मृतियों के कृतघ्न कारागार में एक अंतराल के बाद

सूचनाओं ने हमारे दिल-दिमाग को इस कदर भर दिया है कि उसमें सब कुछ केवल समाया जा रहा है। किसी सूचना का कोई विशिष्ट महत्व नहीं बच रहा है। मौजूदा हिंदुस्तान एक घटना प्रधान हिंदुस्तान बन गया है। इसमें घटनाएं हैं और केवल घटनाएं हैं। जब घटनाएं हैं तो उनकी सूचनाएं हैं। सूचनाएं हैं तो उनकी मनमाफिक व्याख्याएं भी हैं। व्याख्याएं हैं तो उसमें मत-विमत हैं। मत-विमत हैं तो वाद-विवाद हैं और वाद-विवाद हैं तो जीतने-हारने की कोशिशें भी हैं। पक्ष-विपक्ष अब केवल सत्ता के प्रांगण की शब्दावली नहीं रही बल्कि अब वह कटुता का एक नया रूप लेकर उसी खम के साथ एकल परिवारों से लेकर संयुक्त परिवारों, पड़ोस से लेकर मोहल्ले और मोहल्ले से लेकर गाँव तक बसेरा करती जा रही है।

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खड़ी बोली काव्य के स्तम्भ पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय

बीसवीं सदी के प्रथम दशक में खड़ी बोली और ब्रज का संघर्ष जोरों पर था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नये विषयों, नई शैली और भाषा योजना द्वारा नवयुग का शंखनाद किया। वे गद्य में तो खड़ी बोली के पक्षपाती थे, परन्तु पद्य रचना में ब्रज माधुरी का मोह छोड़ नहीं सके। एक जगह उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है, चाहने पर भी उनसे खड़ी बोली में सरस कविता नहीं बनती लेकिन भारतेन्दु युग में श्रीधर पाठक ने अंग्रेजी की अनूदित रचनाओं द्वारा काव्य रचना के लिए खड़ी बोली का द्वार खोल दिया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, गुप्त, अयोध्या सिंह उपाध्याय, पं. रामचरित उपाध्याय तथा लोचनप्रसाद पाण्डेय ने उन्हीं का अनुगमन किया।

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पक्षियों के जौहरी सालिम अली की कहानी

सालिम अली ने कई पत्रिकाओं के लिए लिखा, मुख्य रूप से जर्नल ऑफ द बॉम्बे नेचुरल हिस्टरी सोसायटी के लिए लगातार लिखा। साथ ही उन्होंने कई लोकप्रिय और शैक्षिक पुस्तकें भी लिखी, जिनमें से कुछ अभी भी प्रकाशित नहीं हुई हैं। इसके लिए अली ने तहमीना को श्रेय दिया है जिसने इनकी अंग्रेजी में सुधार करने के लिए इंग्लैंड में अध्ययन किया था।