नालंदा से कोलकाता वाया जर्मनी: किताबों से डरने वाली राजनीति जारी है

पुस्तकें किसी एक विचारधारा की प्रतिनिधि नहीं होतीं। उनमें सत्ता के पक्ष में लिखे गए ग्रंथ भी होते हैं और सत्ता की आलोचना करने वाले दस्तावेज भी; धार्मिक दर्शन भी होता है और नास्तिक चिंतन भी; राष्ट्र के गौरव का आख्यान भी होता है और उसके इतिहास की असुविधाजनक पड़ताल भी। पुस्तक का मूल स्वभाव ही यह है कि वह एक से अधिक दृष्टियों के लिए जगह बनाती है। इसीलिए स्वतंत्र विचार से भयभीत राजनीति को उन पुस्तकों से विशेष परेशानी होती है जो उसके बनाए नैरेटिव के बाहर खड़ी होकर सवाल करती हैं।

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