बसपा के ब्राह्मण सम्मेलनों की आलोचना सतही और राजनीति से प्रेरित है

बसपा ब्राह्मणों को अपनी पार्टी से जोड़ रही है तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह ब्राह्मणों के धर्म और दर्शन को स्वीकार करने जा रही है। वह चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए कि यह उसके वजूद से जुड़ा हुआ प्रश्न है। अपने वजूद को बचाने के लिए बसपा कोई जोखिम तो ले सकती है लेकिन स्वयं अपने पैर में कुल्हाड़ी मारेगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

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UP: सरकार से ब्राह्मण वोटर की नाराजगी का मुद्दा क्या फर्जी है?

ब्राह्मण वोटर सामान्‍यत: मंदिर निर्माण, हिंदुत्व, अनुच्‍छेद 370 के जम्‍मू-कश्‍मीर से हटाए जाने, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर काफी उत्साहित नजर आते हैं। कई ऐसे ब्राहमण हैं जो बीजेपी सरकार की बहुत सी नीतियों, महंगाई, बेरोजगारी से काफी नाराज भी हैं, लेकिन वोट के सवाल पर मुद्दा बदल जाता है।

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यूपी में बाकी जातियों की नाराजगी पर क्यों नहीं सवाल कर रहा है मीडिया?

मीडिया जब जाति पर चर्चा करने ही लगा है तो उसे एक जाति-विशेष के बजाय उत्तर प्रदेश की तमाम जातियों की नाराजगी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर चर्चा करनी चाहिए।

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राग दरबारी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती फैक्टर

बीजेपी के लिए परिस्थिति अगर विपरीत हुई और जो जाति या समुदाय भाजपा या सपा से सहज महसूस नहीं कर पा रहा है, अगर उसका छोटा सा तबका भी बसपा की तरफ शिफ्ट कर जाता है तो उत्तर प्रदेश के मुसलमान बीजेपी को हराने वाले उम्मीदवार को वोट देने से नहीं हिचकेंगे क्योंकि वह ऐसा समुदाय है जिसका एकमात्र लक्ष्य हर हाल में भाजपा को हराना होता है!

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