गाज़ा: नरसंहार के 1000 दिन और कुर्बानियों की दास्तानें

काव्यात्मक शुरुआत के बाद सभा को कुछ कड़वे और कठोर तथ्यों तथा मुनाफ़े की भूखी साम्राज्यवादी ताकतों के छिपे हुए राजनीतिक मंसूबों से अवगत कराया गया, जिनके कारण फ़िलिस्तीन की सुंदर धरती और जीवन, तबाही और संकट में बदल गया है। गोआ से आए वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. रंजन सोलोमन इस दिन के मुख्य वक्ता थे।

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आगरा: दुनिया की बदलती तस्वीर और भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात पर व्याख्यान

डॉ.  जया मेहता ने कहा कि यह डॉलर वाले 220 अरबपति और जी-7 के देश हमारी पहचान नहीं हैं। हमारे लोग ही हमारी पहचान हैं और वे 95 फ़ीसदी ग़रीब हैं। पहले कांग्रेस और अब भाजपा के शासनकाल में जो आर्थिक नीतियाँ देश में अपनायी गईं हैं, उनसे अमीर-ग़रीब की खाई बहुत तेज़ी से चौड़ी हुई है। जितनी ज़्यादा ग़ैर बराबरी हमारे देश में बढ़ती जा रही है, उससे किसी भी समाज में शांति और स्थायित्व हो ही नहीं सकता। 

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फ़लस्तीन-इज़रायल: सात दशक पुराना एक अंतहीन टकराव और ताज़ा अध्याय

विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने इज़रायल का सिर्फ रस्मी विरोध किया है क्योंकि दोनों देश लगातार अपने संबंध को इज़रायल के साथ मजबूत कर रहे हैं। यूएई ने इज़रायल में अपना दूतावास भी बनाया है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध भी स्थापित हो चुके हैं। इसी का परिणाम है कि इज़रायल लगातार फ़लस्तीन को दबाने की कोशिश कर रहा है।

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