‘जिधर देखिए उधर पूंजीपतियों की घुड़दौड़ मची हुई है। किसानों की खेती उजड़ जाये उनकी बला से…’!

वह भली-भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानि बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उन पर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले कुछ थोड़े से पूंजीपति, जमींदार, व्यवसायी ही नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग/मध्यवर्ग (सेवक/नौकर) भी उतना ही दोषी था।

Read More

आर्टिकल 19: जनता सड़कों पर है, लेखक दड़बों में!

लेखकों की अक्सर शिकायत रहती है कि लोग उन्हें सुनते नहीं। उन्हें पढ़ते नहीं। लेकिन इन सवालों से पहले जो सवाल बनता है वो ये कि जब लेखक अपने समय के सवालों से लड़ेगा नहीं तो उसे पढ़ेगा कौन? और क्यों पढ़े। उससे क्यों जुड़े।

Read More

स्त्री-पात्रों के चित्रण में प्रेमचंद खुद को केवल समस्या तक सीमित नहीं रखते, समाधान सुझाते हैं

प्रेमचंद ने यहाँ भी सुधार की बात की हैं। किस तरह वेश्या को सही मार्ग पर लाया जाए, इस समस्या के समाधान हेतु उन्होंने वेश्याओं के लिए एक आश्रम बनाने की बात कही हैं। इस समाधान को कई आलोचकों ने आदर्शवादी करार दिया है।

Read More

प्रेमचंद का सूरदास आज भी ज़मीन हड़पे जाने का विरोध कर रहा है और गोली खा रहा है!

भारतीय विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र एक विषय के रूप में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पढ़ाया जाना शुरू हुआ और इतिहास उससे पहले से पढ़ाया जा रहा था, लेकिन आधुनिक भारतीय समाज के बनने की प्रक्रिया को उसकी पूरी जटिलता के साथ दर्ज करने वाले प्रेमचंद पहले आधुनिक साहित्यकार कहे जा सकते हैं।

Read More