‘धृतराष्ट्र’ की मुद्रा में हैं मीडिया के ‘संजय’ इस समय?

पत्रकारिता समाप्त हो रही है और पत्रकार बढ़ते जा रहे हैं! खेत समाप्त हो रहे हैं और खेतिहर मज़दूर बढ़ते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह। खेती की ज़मीन बड़े घराने ख़रीद रहे हैं और अब वे ही‌ तय करने वाले हैं कि उस पर कौन सी फसलें पैदा की जानी हैं। मीडिया संस्थानों का भी कार्पोरेट सेक्टर द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है और पत्रकारों को बिकने वाली खबरों के प्रकार लिखवाए जा रहे हैं। किसान अपनी ज़मीनों को ख़रीदे जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। मीडिया की समूची ज़मीन ही खिसक रही है पर वह मौन हैं। गौर करना चाहिए है कि किसानों के आंदोलन को मीडिया में इस समय कितनी जगह दी जा रही है? दी भी जा रही है या नहीं? जबकि असली आंदोलन ख़त्म नहीं हुआ है। सिर्फ़ मीडिया में ख़त्म कर दिया गया है।

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कौशिक बसु के साथ राहुल गांधी की बातचीत में जो अनकहा रह गया, उसे भी समझें

पैंतालीस साल पहले के आपातकाल और आज की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच एक और बात को लेकर फ़र्क़ किए जाने की ज़रूरत है। वह यह कि इंदिरा गांधी ने स्वयं को सत्ता में बनाए रखने के लिए सम्पूर्ण राजनीतिक विपक्ष और जेपी समर्थकों को जेलों में डाल दिया था पर आम नागरिक मोटे तौर पर बचे रहे। शायद यह कारण भी रहा हो कि जनता पार्टी सरकार का प्रयोग विफल होने के बाद जब 1980 में फिर से चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी और भी बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापस आ गईं। इस समय स्थिति उलट है।

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अमेरिका: वॉशिंगटन में 15 दिन के लिए इमर्जेंसी, अब तक 4 उत्पातियों की मौत

यूएस कैपिटल में हुई हिंसा के दौरान मारी गईं महिला की स्थानीय पुलिस ने पहचान कर ली है. बताया गया है कि मृतका का नाम एशली बैबिट था जो सैन डिएगो की रहने वाली थीं.

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थाईलैंड: तानाशाही के खिलाफ़ महीनों से प्रदर्शन कर रहे युवाओं से घबरायी सरकार, इमरजेंसी लागू

तमाम खतरों के बावजूद पहली बार खुल कर राजा की भूमिका और जरूरत के बारे में वे बात कर रहे हैं। #WhyDoWeneedAKing जैसे अहम सवाल उठा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि नया संविधान बने और चुनाव हो ताकि एक जनतांत्रिक सरकार का गठन हो।

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“भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां तानाशाह नहीं चलेगा”: इमरजेंसी की 45वीं बरसी पर रामबहादुर राय

आखिर 45 साल बाद इमरजेंसी पर बात करना क्यों जरूरी है? क्या उस समय इमरजेंसी लगाया जाना जरूरी था? क्या परिस्थितियां इतनी ज्यादा बेकाबू हो चुकी थी कि इमरजेंसी ही एकमात्र रास्ता थी? आखिर क्यों लगाई गई इमरजेंसी? इन सभी प्रश्नों पर रामबहादुर राय ने विस्तार से बात की।

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