महाबंदी, महामारी, मज़दूर और मुग़ालते

ट्रोजन हॉर्स बनाये कौन? बन भी जाये तो हर खेमे में पलटू राम जैसे कई नेता हैं। फिर ये सारा खर्च उठाये कौन? वो भी तब, जब सारे धन का आभूषण पहने हाथी बैठा इठला रहा है।

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न रैली, न सभा, न आयोजन! 134 साल में पहली बार वेबिनार पर मनाया गया मजदूर दिवस

इंदौर में श्रम संगठनों, जन संगठनों, कला-संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत संगठनों एटक, सीटू, सन्दर्भ, प्रलेस, इप्टा, एन. एफ. आई. डब्ल्यू. और रूपांकन के संयुक्त तत्वाधान में एक अनूठा और सार्थक कार्यक्रम आयोजित किया।

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मजदूरों का झंडा सफेद से लाल कब और कैसे हुआ?

मजदूरों ने अपने खून से लथपथ कपड़ों को अपनी बस्तियों में घरों के आगे व खिड़कियों पर टांग दिया था। इससे पूरी बस्ती लाल झंडे से शराबोर दिखाई देने लगी। और यहीं से पूरी दुनिया में लाल रंग, लाल झंडा और लाल सलाम हिंसक कार्यवाहियों, दमन व शोषण के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।

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दुनिया के मजदूर थके हैं, पस्त हैं, अपनी मुक्ति के बारे में वे नहीं सोच पाएंगे!

मज़दूरों से क्रांति या विरोध की उम्मीद करना. ऐसा कभी इतिहास में नहीं हुआ है. उसके लिए या तो क्रांतिकारी मज़दूर की विशेष पृष्ठभूमि होनी चाहिए या फिर उसे अन्य वर्ग से नेतृत्व मिले.

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काश, कोई मजदूर अनुवादक होता तो तुम अभागे न होते, मेरे मजदूर साथियों!

क्या तुम्हें लेनिन के बारे में पता है? मुझे पता है। उनके संकलित कार्य 40 अंकों में प्रकाशित हुए हैं, एक का मूल्य 2,000 रुपए है। क्या कभी उनको, अपने भाग्यविधाता को पढ़ पाओगे? इसलिए अभागे हो तुम।

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कोरोना और पूंजीवाद के दौर में काम और कामगार

भारत में पहली बार मजदूर दिवस पहली मई, 1923 को ‘मद्रास’ में ‘मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार’ के नेतृत्व में मनाया गया। एम. सिंगारवेलु ने उसी दिन मजदूर संघ के रूप में ‘लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान’ की स्थापना की। इस दिन भारत में पहली बार ‘लाल झंडा’ भी इस्तेमाल किया गया।

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