गालीबाज व्‍यवस्‍था में गाली-विमर्श: क्या लड़कियां गाली सुनकर गजल गाएं?

पिछले 15 साल से समस्त भारत में ‘आधी आबादी’ आत्मनिर्भर होने के लिए अपनी चारदीवारी को लांघ चुकी है। यह न्यू इंडिया है। बाहर की दुनिया में उसे बस, मेट्रो, ऑटो, चौराहा, चाय-पान की दुकान, स्कूल, कॉलेज आदि में भी मर्दों के द्वारा गालियों को सुनना एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन इस देश के सामंती समाज से लेकर बहुसंख्यक अंधभक्त चाहेंगे कि लड़कियां गाली सुनकर ग़ज़ल गाएं?

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स्त्री-पूजक देश में गालियों का समाजशास्त्र

किसी समाज में प्रचलित गालियां ये बताती हैं कि सबसे बुरा अपमान कैसे हो सकता है। सामाजिक व्यवहार की सीमा क्या है। इनमें छुपी हुई लैंगिक हिंसा यह दिखाती है कि कैसे हम किसी को नीचा दिखा सकते हैं। स्त्री-शरीर ही इन गालियों का केंद्र होता है।

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