पुलिस और नागरिक : सत्ता बनाम स्वतंत्रता का द्वंद्व

जब पुलिस नागरिक को नियंत्रित करने को अपना प्राथमिक दायित्व समझती है और नागरिक पुलिस को अपने अधिकारों के लिए बाधा मानने लगता है, तब दोनों के बीच कानून का संबंध कमजोर होकर शक्ति का संबंध बन जाता है। पुलिस कहती है – हमारे पास शक्ति है। नागरिक कहता है- मेरे पास अधिकार है। लोकतंत्र का प्रश्न है- अंततः किसकी चलेगी? इसका उत्तर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए-कानून की।

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न्याय की अवधारणा, मानवाधिकार और विलंबित न्याय: संदर्भ BK-16

अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर यदि बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’।

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पुलिस रिफॉर्म के आईने में विकास दूबे केस, मथुरा के पुलिसवालों को सज़ा और जूलियस रिबेरो की चिट्ठी

आज ही प्रतिष्ठित रिटायर्ड पुलिस अधिकारी जिन्हें सुपर कॉप कहा जाता है, जूलियस रिबेरो ने देश भर के आइपीएस अधिकारियों के नाम एक खुला पत्र लिख कर पुलीस हिरासत में हुई मौतों और फर्जी मुठभेड़ों पर ही नहीं बल्कि वर्तमान सियासी व्यवस्था पर भी दुःख और नाराजगी ज़ाहिर की हैI

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