कोरोना, दिव्यांग और यूनिवर्सल डिज़ाइन का संकट

कोरोना त्रासदी हमें याद दिलाती हैं कि कई लोगों का जीवन हमारे मुकाबले कितना मुश्किल है और एक इंसान के रूप में हमारे क्या कर्तव्य हैं

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परंपरागत शिक्षा पद्धति के लिए तकनीक से दोस्ती उसके अस्तित्व का सवाल बन चुकी है

परिवर्तन यदि समाज के लाभ के लिए हो रहा है तो उसे न स्वीकारना, समाज के विकास में बाधक बनना है

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एक महामारी और तीन तहों में बंटी ज़िंदगी की अपनी-अपनी बीमारी

जितने भी सुविधा के साधन हमने ईजाद किए हैं इस दौरान वे सभी फेल हो गए हैं। पैसे से लेकर मशीनरी तक।

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एक काला पहाड़ के पापों का बोझ भी सबको बांटना ही पड़ेगा…

जब हरेक राज्य का मुख्यमंत्री दावा कर रहा है कि उसने हालात को बिल्कुल संभाल लिया है, तो स्थिति इतनी बेकाबू क्यों है

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एक महामारी से कैसे न लड़ें? मध्य प्रदेश के शिवराज ‘मॉडल’ में छुपा है जवाब

जब महामारी से बचाव के उपाय किये जाने थे तब मध्य प्रदेश में सरकार गिराने और बचाने का खेल खेला जा रहा था

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गैर-मजदूर नागरिकों और अ-नागरिक मजदूरों से कुछ सवाल

जो दूसरों की नागरिकता के संदिग्ध होने की संभावना और उससे उनके च्युत कर दिए जाने की आशंका पर त्योहार मनाने की सोच रहे थे क्या वे अपने घरों को लौटते इन हजारों-लाखों सड़क पर रेंगते, घिसटते, भूखे प्यासे मजदूरों को इस देश का नागरिक मानते हैं या नहीं?

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कोरोना महामारी में आख़िर मजदूरों की स्थिति इतनी बदतर क्यों हैं?

मजदूरों पर केंद्र या राज्य सरकारों की असफल, जनविरोधी नीतियों और प्रशासन की मार को रोक पाना फिलहाल असंभव है

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मध्य प्रदेश में ‘सरकारात्मक पत्रकारिता’ का कोरोना-कालीन मुजरा

कुछेक अपवाद को छोड़कर इन दिनों लगभग सभी अखबार कोरोना महामारी को लेकर सारी खबरें वैसी ही छाप रहे हैं जैसा सरकार चाहती है

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