क्या महामारी की आड़ में भारत के ‘कम जनतंत्र’ की ओर उन्मुख होने के रास्ते को सुगम किया जा रहा है?

क्या एक समुदाय विशेष को निशाना बनाने में उनकी कथित भूमिका को लेकर तथा उनके हाशियाकरण को लेकर कभी हुक्मरानों को या उनसे संबंधित तंजीमों को कभी जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा? क्या वह अपने इन कारनामों को लेकर कभी जनता से माफी मांगेंगे?

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फ़ैसल खान की गिरफ़्तारी साझा संस्कृति के नये नारे की जरूरत को रेखांकित करती है

भारत के अन्दर तेजी से बदलता यह घटनाक्रम दरअसल सदिच्छा रखने वाले तमाम लोगों- जो तहेदिल से सांप्रदायिक सद्भाव कायम करना चाहते हैं, जहां सभी धर्मों के तथा नास्तिकजन भी मेलजोल के भाव से रह सकें- के विश्वदृष्टिकोण की सीमाओं को भी उजागर करता है।

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ब्रिटेन सरकार का फ़रमान और ‘फारेनहाइट 451’ के मुहाने पर खड़ी दुनिया

दक्षिण एशिया के इस हिस्से में सांस्‍कृतिक युद्ध- जो पहले के विशाल ब्रिटिश साम्राज्‍य का ही हिस्सा था- उसी गतिमानता के साथ आगे बढ़ रहा है जहां हम देख रहे हैं कि पाकिस्तान अब अरबीकरण की दिशा में आगे बढ़ा है जबकि भारत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रणीत हिन्दू राष्ट्र की दिशा में तेजी से डग बढ़ा रहा है।

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गाँधी स्मृति: कितनी दूर, कितनी पास?

मेरे मित्र एवं प्रसिद्ध बुद्धिजीवी अपूर्वानन्द इस प्रश्न को अपनी कई सभाओं में उठा चुके हैं। उनका यह भी कहना है कि दिल्ली के तमाम स्कूलों में उन्होंने यह जानने की कोशिश की और उन्होंने यही पाया कि लगभग 99 फीसदी छात्रों ने इस स्थान के बारे में ठीक से सुना नहीं है, वहां जाने की बात तो दूर रही।

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Article 21 पर यह संजीदा होने का वक्‍त है, ताकि दफ़न न होने पाएं बेगुनाहों को मिले ज़ख्‍म

अगर हम अपने करीब देखें तो ऐसे तमाम लोग मिल सकते हैं जो इसी तरह व्यवस्था के निर्मम हाथों का शिकार हुए- मामूली अपराधों में न्याय पाने के लिए उनका लम्बे समय तक जेलों में सड़ते रहना या फर्जी आरोपों के चलते लोगों का अपनी जिन्दगी के खूबसूरत वर्षों को जेल की सलाखों के पीछे दफना देना।

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क्या भारत का जनतंत्र फ़ेसबुक-ग्रस्त हो चुका है?

एक विशालकाय कम्पनी की सक्रियताओं को जानने के लिए जांच जरूरी ही है, लेकिन हमें लिबरल जनतंत्र के भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए, जिसकी तरफ प्रोफेसर डीबर्ट ने इशारा किया है।

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नफरत बेचो, मुनाफ़ा कमाओ: फेसबुक की इंडिया स्‍टोरी और उससे आगे

दुनिया भर में फेसबुक की जितनी आलोचना हो रही है, उससे यह मुमकिन भी है कि वह अपने अन्दर के दक्षिणपंथी तत्वों पर लगाम लगाने का प्रयास करे, लेकिन यह मान लेना बेवकूफी की इन्तहा होगी कि कहानी का यही अन्त है।

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घेरेबन्दी में पड़े देश और खेल के नये नियमों के बीच हम क्‍या कर सकते हैं?

भारत में हम, स्‍मृति और स्‍मृतिलोप के बीच लम्बे समय से लटके हुए हैं। फिलवक्त कोई बमबारी नहीं चल रही है, न हम अपने सामने मासूमों का बहता खून देख रहे हैं जो ‘इतिहास की गलतियों’ को ठीक करने के नाम पर बहाया जा रहा है, न ही सड़कों पर हथियारबन्द दस्ते मौजूद हैं जो ‘अधर्मियों’ और ‘अन्यों’ को ढूंढ रहे हैं।

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आज़ाद जनतंत्र में सत्तर साल बाद भी वेल्लोर से विरमगाम तक श्मशान भूमि से वंचित हैं दलित

जब दलितों ने सार्वजनिक तालाब से पानी का उपयोग शुरू किया, ऊंची जाति के लोगों ने रफ्ता-रफ्ता इसके प्रयोग को बन्द किया क्योंकि उनका कहना था कि अब पानी अशुद्ध हो गया है। मामला वहीं तक नहीं रुका।

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बिहार चुनाव आते ही प्रतिबंधित रणवीर सेना को एक बार फिर कौन हवा दे रहा है?

ऐसा कोई भी शख्स जिसने इस संगठन की यात्रा पर गौर किया होगा और उत्तर भारत की वर्चस्वशाली जाति के साथ उसके नाभिनालबद्ध रिश्ते को देखा होगा, वह जानता होगा कि आज भी सत्ताधारी हलकों में उसका कितना रसूख है।

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