दक्षिणावर्त: More Power to You, Anushka! (ये शीर्षक नहीं, डिसक्लेमर है)

हाल यह है कि हम पोस्ट-ट्रुथ के युग में जी रहे हैं, जहां लिखे हुए शब्दों पर ही भरोसा नहीं है। जिस वक्त कुछ भी लिखा या कहा जा रहा है, लोगों के दिमाग में यह बात आती है कि यह झूठ तो नहीं, फ़ेक तो नहीं?

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सिनेमाई संघर्ष में औरत की जिंदगी का मुरब्बा खराब क्यों हो जाता है?

पिछले कुछ वर्षों में रीलिज हुई पुरुषों की बायोपिक पान सिंह तोमर, भाग मिल्खा भाग और एम एस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी आदि को देखने हुए समझ में आया कि पुरुष बायोपिक में जहां पराक्रमपूर्ण दृश्यों की भरमार होती है और इससे फिल्म भरी-भरी लगती है वहीं स्त्रियों की बायोपिक में चमत्कार रचने की प्रवृत्ति फिल्म को पटरी से ही उतार देती है। बचता क्या है?

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दक्षिणावर्त: फ्रैक्चर आधुनिकता के ट्विटर विमर्श

आखिर ट्विटर पर हो रहा जन-जागरण किसे संबोधित था? अंधविश्वासों में जकड़ी हिन्दू औरतें ट्विटर पर मिलती हैं क्या? अव्वल तो ये विरोध, ये हैश टैग क्रांति, ‘मिसप्‍लेस्‍ड’ थी, लेकिन यहां मेरा विषय यह है ही नहीं।

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