ओडिशा: जमीन कब्जाने के लिए गांव को पुलिस ने बनाया बंधक, SKM का शांति मार्च और प्रेस वार्ता

शुक्रवार को हुई प्रेस मीट में एसकेएम, ओडिशा ने साफ तौर से बताया कि कैसे लोगों को उनके गांव में कैद कर दिया गया है। रात में पुलिस के छापे, थाने में ग्रामीणों का हिरासत में लिया जाना और अपने प्‍लॉट बेने के लिए डराया धमकाया जाना आम बात हो गयी है। अनगिनत ग्रामीणों पर फर्जी मुकदमे लाद दिए गए हैं जिससे आतंक का माहौल है। घरों में घुस कर पुलिस द्वारा महिलाओं को धमकाए जाने की बात भी सामने आयी है।

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गुणवत्तापरक शिक्षा तथा मानवाधिकार का सवाल और हमारी जिम्मेदारी

जिन मानवाधिकारों की कल्पना विश्व समुदाय द्वारा की गयी है उसका मूल आधार ही गुणवत्तापरक शिक्षा है और इसके अभाव में एक सशक्त स्वतंत्र जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। शिक्षा के अभाव में व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता में गिरावट आती है जिसका प्रभाव कालान्तर में राष्ट्रीय स्तर पर परिलक्षित होता है। गुणवत्तापरक शिक्षा के अभाव का सबसे ज़्यादा असर गरीबी में जीवनयापन करने वाले लोगों पर ही पड़ रहा है जो सीधे सीधे उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

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जातिगत भेदभाव का शिकार जेलों में पिसते दलित और पिछड़े वर्ग के कैदी

जिन मामलों में गिरफ्तारी किये बिना छानबीन पूरी हो सकती हो वहां आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। वर्ष 2000 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों में भी यही हिदायत दी गयी थी।

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एनकाउंटर और न्यायेतर हत्याएं: उत्तर प्रदेश पर YHRD की रिपोर्ट

इन मौतों और घटनाक्रमों पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी संज्ञान लिया है। इनकी समीक्षा संयुक्त राष्ट्र के पांच विशेष दूतों (रेपोर्तार) ने की है। इन हत्याओं की निष्पक्ष जांच की मांग करने वाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में लंबित हैं।

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जाति और रसूख के हिसाब से न्याय और मुआवजे का ‘राम राज्य’!

पहले जिन्हें थाने से न्याय नहीं मिलता था उसे एसपी कार्यालय से उम्मीद होती थी। ब्लॉक से न्याय नहीं मिल पाता था तो तहसील और जिला अधिकारी कार्यालय से उम्मीद रहती थी लेकिन अब पीड़ितों के सामने इस बात का भी संकट है कि ऐसे अधिकारियों के रहते वह न्याय पाने के लिए जाएं तो कहां जाएं?

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बात बोलेगी: मुखिया ‘मुख’ सों चाहिए…

अगर यह तोहमत है तब ‘किसने किस पर’ लगायी का सवाल खड़ा हो जाता। और कह भी कौन रहा है? जिसमें छप्पन छेद हैं? मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा से सेलेक्टिव रहा हो वह किसी और पर यह तोहमत कैसे लगा सकता है कि कोई सेलेक्टिव क्यों है? इसलिए यह मुखिया होने की चुनौती है।

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पेट पर लात और पीठ पर लाठी: लॉकडाउन में पुलिस उत्पीड़न का हाल बताती एक रिपोर्ट

कोविड-19 में पुलिस व्यवस्था पर कॉमन कॉज नामक स्‍वयंसेवी संस्‍था द्वारा किये गए एक अध्ययन में सामने आया है कि हर तीन पुलिसकर्मियों में से केवल एक ने लॉकडाउन के दौरान कानून और व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जांच करते हुए कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया।

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न्याय की अवधारणा, मानवाधिकार और विलंबित न्याय: संदर्भ BK-16

अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर यदि बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’।

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अल्मोड़ा में ‘परिवर्तन शिविर’ का आयोजन, वक्ताओं ने कहा- सत्ता की देन हैं तमाम समस्याएं

उत्तराखंड में लोकतांत्रिक अधिकारों का संघर्ष और मानवाधिकार विषय पर 26-27 दिसंबर को द्वाराहाट अल्मोड़ा में राज्य स्तरीय विमर्श हेतु दो दिवसीय परिवर्तन शिविर का आयोजन हुआ। इस शिविर के …

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भीमा कोरेगाँव: गिरफ्तारियों के आईने में राजनीति और पुलिसबल का चरित्र-परिवर्तन

ऐमनेस्टी इंटरनेशनल की डिजिटल-सिक्युरिटी टीम, ऐमनेस्टी टेक, ने बाद में यह खोज की कि इनमें से एक कंप्यूटर में मालवेयर मौजूद था जिससे उसमें दूर से घुसपैठ करना संभव था। इस आधार पर उन्होंने यह आरोप लगाया कि ये पत्र ‘प्लांटेड’ हो सकते हैं। ये पत्र गढ़ंत होंगे, इस आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता, यह देखते हुए कि नक्सलियों के संचार [पत्राचार] ज़बरदस्त कूट-भाषा में होते हैं।

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