बात बोलेगी: मुखिया ‘मुख’ सों चाहिए…

अगर यह तोहमत है तब ‘किसने किस पर’ लगायी का सवाल खड़ा हो जाता। और कह भी कौन रहा है? जिसमें छप्पन छेद हैं? मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा से सेलेक्टिव रहा हो वह किसी और पर यह तोहमत कैसे लगा सकता है कि कोई सेलेक्टिव क्यों है? इसलिए यह मुखिया होने की चुनौती है।

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पेट पर लात और पीठ पर लाठी: लॉकडाउन में पुलिस उत्पीड़न का हाल बताती एक रिपोर्ट

कोविड-19 में पुलिस व्यवस्था पर कॉमन कॉज नामक स्‍वयंसेवी संस्‍था द्वारा किये गए एक अध्ययन में सामने आया है कि हर तीन पुलिसकर्मियों में से केवल एक ने लॉकडाउन के दौरान कानून और व्यवस्था बनाए रखने और अपराधों की जांच करते हुए कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह से पालन किया।

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न्याय की अवधारणा, मानवाधिकार और विलंबित न्याय: संदर्भ BK-16

अदालती फैसलों में पांच-छह साल लगना तो सामान्य-सी बात है, पर यदि बीस-तीस साल में भी निपटारा न हो तो आम लोगों के लिए यह किसी नारकीय त्रासदी से कम नहीं है। वैसे तो न्याय का मौलिक सिद्धांत यह है कि ‘न्याय में विलंब होने का मतलब न्याय को नकारना है’।

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अल्मोड़ा में ‘परिवर्तन शिविर’ का आयोजन, वक्ताओं ने कहा- सत्ता की देन हैं तमाम समस्याएं

उत्तराखंड में लोकतांत्रिक अधिकारों का संघर्ष और मानवाधिकार विषय पर 26-27 दिसंबर को द्वाराहाट अल्मोड़ा में राज्य स्तरीय विमर्श हेतु दो दिवसीय परिवर्तन शिविर का आयोजन हुआ। इस शिविर के …

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भीमा कोरेगाँव: गिरफ्तारियों के आईने में राजनीति और पुलिसबल का चरित्र-परिवर्तन

ऐमनेस्टी इंटरनेशनल की डिजिटल-सिक्युरिटी टीम, ऐमनेस्टी टेक, ने बाद में यह खोज की कि इनमें से एक कंप्यूटर में मालवेयर मौजूद था जिससे उसमें दूर से घुसपैठ करना संभव था। इस आधार पर उन्होंने यह आरोप लगाया कि ये पत्र ‘प्लांटेड’ हो सकते हैं। ये पत्र गढ़ंत होंगे, इस आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता, यह देखते हुए कि नक्सलियों के संचार [पत्राचार] ज़बरदस्त कूट-भाषा में होते हैं।

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लोकतंत्र की अंतिम क्रिया अभी बाकी है!

हम सभी एक सामूहिक, राष्ट्रव्यापी मदहोशी के शिकार हो गए थे. किस चीज़ का नशा कर रहे थे हम? हम तक एनसीबी का परवाना क्यों नहीं पहुंचा? सिर्फ बॉलीवुड के लोगों को ही क्यों बुलाया जा रहा है? कानून की नज़र में हम सभी बराबर हैं कि नहीं?

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Article 21 पर यह संजीदा होने का वक्‍त है, ताकि दफ़न न होने पाएं बेगुनाहों को मिले ज़ख्‍म

अगर हम अपने करीब देखें तो ऐसे तमाम लोग मिल सकते हैं जो इसी तरह व्यवस्था के निर्मम हाथों का शिकार हुए- मामूली अपराधों में न्याय पाने के लिए उनका लम्बे समय तक जेलों में सड़ते रहना या फर्जी आरोपों के चलते लोगों का अपनी जिन्दगी के खूबसूरत वर्षों को जेल की सलाखों के पीछे दफना देना।

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मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भूपेश बघेल को लिखा पत्र: कल्लूरी पर करें कार्रवाई

पत्र में मुआवजा राशि की प्राप्ति की सूचना देते हुए मुख्यमंत्री बघेल को सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग के निर्देशों का अनुपालन करने के लिए धन्यवाद दिया गया है और आशा जाहिर की गयी है कि मानवाधिकार हनन से प्रताड़ित हजारों आदिवासियों और नागरिकों को भी न्याय मिलेगा।

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धर्म, न्याय और बन्धुत्व की बात करने वाले एक वैदिक समाजवादी का जाना

धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता और असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई में भी वे अग्रिम पंक्ति में डटे रहे. खासकर बहुसंख्यकवादी “हिंदुत्व” विचारधारा के खिलाफ उनका मानना था कि हिन्दुत्व की विचारधारा हिंदू धर्म का अपहरण करना चाहती है.

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मुआवजे की रकम बेगुनाह आदिवासियों के नाम, अपराधी को मिले सज़ा: विनीत तिवारी

उन्होंने कहा कि हम लोगों की तो आवाज़ सुन ली गयी लेकिन न जाने कितने ही गरीब और अनपढ़ आदिवासियों को झूठे मामलों में फंसाया गया, फर्जी मुठभेड़ों में मारा गया और महिलाओं के साथ ज़्यादतियां की गईं। उनके अपराधियों को भी सजा मिलनी चाहिए।

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