बंदरों को आदमी होना ही नहीं था: विभांशु केशव की दस लघु कथाएं

डॉक्टर साहब सोचते- मेरी जानकारी में मेरे खानदान ने पैसे के अतिरिक्त कुछ कमाया नहीं। फिर लड़की इज्जत लेकर कैसे चली गई? मेरे खानदान वालों ने इज्जत का खजाना कहाँ छुपा रखा है?

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UP चुनाव: अखबारों, प्रत्याशियों और प्रशासन ने मिल कर कैसे उड़ायी आदर्श आचार संहिता की धज्जियां

सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के बांगरमऊ, उन्नाव से प्रत्याशी अनिल कुमार मिश्र के मुताबिक हफीजाबाद में 22 फरवरी 2022 को चुनाव से पहले वाली शाम भाजपा के लोगों द्वारा पैसे बांटे गए। अनिल कुमार मिश्र ने उन्नाव जिले के चुनाव अधिकारी को रात सवा नौ बजे लिखित शिकायत भेजी।

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भाजपा और संघ की असली समस्या कांग्रेस और ‘परिवार’ नहीं बल्कि देश की जनता है!

‘विश्व गुरु’ बनने जा रहे भारत देश के प्रधानमंत्री को अगर अपना बहुमूल्य तीन घंटे का समय सिर्फ़ एक निरीह विपक्षी दल के इतिहास की काल-गणना के लिए समर्पित करना पड़े तो मान लिया जाना चाहिए कि समस्या कुछ ज़्यादा ही बड़ी है।

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जो मांग के लिए जाए वह सम्मान ही क्या है और देने वाले की अपनी प्रामाणिकता क्या है?

इन सम्मानों का लालच इतना बढ़ गया है कि पद्मश्री जैसा सम्मान पाने के लिए लोग लाखों रु. देने को तैयार रहते हैं। समाज के प्रतिष्ठित और कुछ तपस्वी लोग ऐसे नेताओं के आगे नाक रगड़ते रहते हैं, जो उनकी तुलना में पासंग भर भी नहीं होते।

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केरल: सच को झूठ से अलग न कर पाने की मजबूरी से निकला ‘न्याय’!

सुप्रीम कोर्ट द्वारा किसी और मामले में पूर्व में दिए गए निर्णय का हवाला देते हुए जज ने अपने ऑर्डर में कहा कि जब सच को झूठ से अलग करना सम्भव न हो, जब अनाज और भूसा पूरी तरह आपस में मिल गए हों; विकल्प यही बचता है कि सभी साक्ष्यों को ख़ारिज कर दिया जाए।

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UP: चुनाव में ऊंट की करवट भांप कर उससे पहले ही उधर लेट जाने वाले

मौर्य ने अपने इस्तीफे के जो कारण बताए हैं, वे तो सिर्फ बताने के लिए हैं लेकिन उनके इस्तीफे का असली संदेश यह है कि उ.प्र. के चुनाव में ऊँट दूसरी करवट बैठनेवाला है। जिस करवट ऊँट बैठेगा, उसी करवट हम पहले से लेटने लगेंगे। वरना क्या वजह है कि मौर्य-जैसे कई नेता बार-बार अपनी पार्टियां बदलने लगते हैं? ऐसे नेता ही आज की राजनीति को उसके पूर्ण नग्न रुप में उपस्थित कर देते हैं।

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प्रधानमंत्री दोहरे दबाव में हैं, बठिंडा प्रकरण को मतदान होने तक भुला दिया जाना चाहिए

किसी भी जीते-जागते लोकतंत्र में उस देश के मतदाताओं/नागरिकों द्वारा अपनी माँगों को लेकर किए जाने वाले शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को देश के अतिमहत्वपूर्ण व्यक्तियों की जान पर ख़तरे की आशंका से जोड़कर देखना अथवा प्रचारित करना प्रजातांत्रिक मूल्यों और व्यवस्थाओं में किस सीमा तक उचित समझा जाना चाहिए! क्या दुनिया की अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी हमारी तरह का ही सोच क़ायम है?

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महात्मा गांधी: मसीहा और सुपरमैन में फर्क होता है

जब तक महात्मा गांधी के अनुयायियों का राज रहा, तब तक उनकी मूर्ति पूजा होती रही। अब जब दूसरे किस्म के लोगों के हाथ में सत्ता आई है तो उन्होंने वे तमाम चमत्कारी बातें गांधी जी से हटा दीं। ऐसे में बहुत से सामान्य लोग जो मसीहा की पूजा भी सुपरमैन की तरह करना चाहते हैं उनके लिए महात्मा गांधी एक बूढ़े, निरीह, लुंज पुंज, वृद्ध बन कर रह गए।

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संत क्यों करें हिंदुत्व की बदनामी?

क्या उन्हें पता नहीं है कि हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री और सभी सांसद उस संविधान की रक्षा की शपथ लेते हैं, जो धर्म-निरपेक्ष है? ये लोग अपने आपको संत कहते हैं तो क्या इनका बर्ताव संतों की तरह है? ये तो अपने आपको उग्रवादी नेताओं से भी ज्यादा नीचे गिरा रहे हैं।

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COP26: गहराते जलवायु संकट के बीच देशों और निगमों का जबानी जमाखर्च व पाखंड

ऐसा लगता है कि ये देश अपने यहां के कॉरपोरेट प्रतिष्‍ठानों के प्रवक्‍ता के रूप में काम कर रहे हैं जो ग्‍लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेंटिग्रेड (प्राक्-औरद्योगिक दौर से) तक सीमित रखने के लक्ष्‍य के प्रति बेपरवाह हैं। स्‍पष्‍ट है कि इन देशों के निगमों ने अंतिम समझौते को कमजोर करने के लिए भारत का इस्‍तेमाल किया है। ये वही निगम हैं जो भारत के सत्‍ताधारी राजनीति दलों को बेनामी चंदा देते हैं।

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