अमित शाह को क्यों कहना पड़ा कि मोदी निरंकुश नहीं हैं!

सवाल यह है कि मोदी के गुजरात और दिल्ली में सफलतापूर्वक दो दशकों तक सरकारें चला लेने के बाद अचानक से इस तरह के सवाल के पूछे जाने (या पुछवाये जाने) की ज़रूरत क्यों पड़ गयी होगी? जनता तो इस आशय की संवेदनशील जानकारी की साँस रोककर प्रतीक्षा भी नहीं कर रही थी। सरकार और पार्टी में ऐसे मुद्दों पर बंद शयनकक्षों में भी कोई बातचीत नहीं होती होगी।

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अधिनायकवाद की आहट और पोलैंड के विद्रोही जजों का एक प्रयोग

गोरखपुर में एक टीवी चैनल के साथ मुलाक़ात में मुख्यमंत्री योगी ने जब यह कहा कि बिना सबूत के कोई गिरफ़्तारी नहीं होगी तो जनता सवाल करने लगी थी कि अदालत को सबूत जुटाकर देने का काम किसका है और आरोपियों को कौन और क्यों बचा रहा है? क्या दोनों ही काम कोई एक ही एजेंसी तो साथ-साथ नहीं कर रही है?

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दिमित्री मुरातोव को मिला नोबेल पुरस्कार और अन्ना पोलित्कोव्सकाया की अधूरी कहानी…

जनपथ के पाठकों के लिए 15 साल पुरानी अन्ना की लिखी यह अधूरी स्टोरी एक बार फिर प्रस्तुत है, जिसके एवज में उन्हें अपनी जन गंवानी पड़ी लेकिन पंद्रह साल बाद जिसका सिला उनके सम्पादक के लिए नोबेल पुरस्कार के रूप में सामने आया है।

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लाल जोहार: शहादत के तीस बरस बाद भी एक ज़िंदा सपने का नाम है शंकर गुहा नियोगी!

देश के प्रसिद्ध श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के जीवन संघर्ष को लेकर निर्मित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘लाल जोहार’ वैसे तो यू ट्यूब पर जारी कर दी गई है लेकिन फिल्म का एक विशेष प्रदर्शन 28 सितंबर को लौह नगरी दल्ली राजहरा में होने जा रहा है। इस प्रदर्शन के दौरान फिल्म की टीम से जुड़े सभी सदस्य मौजूद रहेंगे।

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दक्षेस के नहले पर जन-दक्षेस का दहला

दक्षेस बिल्कुल पंगु हुआ पड़ा है। यह 1985 में बना था लेकिन अब 35 साल बाद भी इसकी ठोस उपलब्धियां नगण्य ही हैं, हालांकि दक्षेस-राष्ट्रों ने मुक्त व्यापार, उदार वीजा-नीति, पर्यावरण-रक्षा, शिक्षा, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में परस्पर सहयोग पर थोड़ी बहुत प्रगति जरूर की है लेकिन हम दक्षेस की तुलना यदि यूरोपीय संघ और ‘एसियान’ से करें तो वह उत्साहवर्द्धक नहीं है।

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तालिबान : भू-राजनीतिक परदे के पीछे

तालिबान के सत्तारोहण को भी एक आभासी फ्रेमवर्क में रख कर अफगानिस्तान में उसके आने को नए-नए मायने दिए जा रहे हैं लेकिन इन सब के सार में एक ही बात है कि तालिबान के आने से अफगानिस्तान पीछे चला गया है.

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सुंदरबन से धीरे-धीरे गायब क्यों हो रहे हैं छात्र?

यहां के गांवों में स्कूली शिक्षा के सामने बाधाओं का अंबार लगा हुआ है। बार-बार आते तूफ़ान, बढ़ता खारापन, जो खेती और मछली पकड़ने को नुकसान पहुंचाता है, और लॉकडाउन- सभी ने छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर, कम उम्र में शादियां और छात्रों के बीच रोज़गार की तलाश को बढ़ा दिया है

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तालिबान: भारत-पाक रिश्तों को नयी दिशा देने का मौका

काबुल हवाई अड्डे पर हुए हमले पर तालिबान को अमेरिका ने बिल्कुल निर्दोष बताया तो अब भारत ने अध्यक्ष के नाते जो बयान जारी किया है, उसमें आतंकवाद का विरोध तो किया गया है लेकिन उस विरोध में तालिबान शब्द कहीं भी नहीं आने दिया है जबकि 15 अगस्त के बाद जो पहला बयान था, उसमें तालिबान शब्द का उल्लेख था।

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अफगानिस्तान: बैठे रहो और देखते रहो?

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि विदेश सेवा का एक अनुभवी अफसर हमारा विदेश मंत्री है और हमारे पड़ोस में हो रहे इतने गंभीर उथल-पुथल के हम मूक दर्शक बने हुए हैं। अफसोस तो हमारे राजनीतिक दलों के नेताओं पर ज्यादा है, जो अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं।

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काबुल: अभी असल सवाल सभी जातियों और कबीलों को मिला के सरकार बनाने का है

पिछले 200 साल में ब्रिटेन, रूस और अमेरिका को पठान धूल चटा चुके हैं। अब शायद चीन की बारी है। पाकिस्तान को मोहरा बनाकर यदि अब चीन अपनी चाल चलेगा तो वह भी मुँह की खाएगा।

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