मनीषा के बहाने एक देश की सम्प्रभुता को ठेंगा दिखाने वाले शासक वर्ग के पिट्ठू पत्रकार

किसी चैनल पर तर्कपूर्ण ढंग से यह देखने को नहीं मिला कि कालापानी, लिपुलेक विवाद वस्तुत: क्या है

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तानाशाही सत्ता में गिटार बजाने की आज़ादी के लिए हेलिन-इब्राहीम ने अपनी जान दे दी…

एर्दोआन की बर्बर हुक़ूमत ने इस बैंड पर इसलिए प्रतिबन्ध लगा दिया गया था क्योंकि वे उसकी ज़ालिम और दकियानूस सत्ता का विरोध करते थे और समाजवाद और मज़दूर वर्ग के गीत गाते थे।

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पहला पत्रकार कोरोना का शिकार, बाकी की गृहस्थी तबाह कर रहे अख़बार और सरकार

पंकज कुलश्रेष्ठ की मौत कोरोना से होने वाली देश में पहले पत्रकार की मौत है। कोरोना महामारी के चक्कर में जिस तरीके से दूसरी बीमारियों और पुराने रोगों की उपेक्षा की जा रही है, उसके चलते मौतें ज्यादा हो रही हैं।

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बनारस से लेकर दिल्ली तक सब ने कहा- तुम्हें इस तरह तो न जाना था, रिज़वाना!

कमरे में एक संक्षिप्त सुसाइड नोट भी बरामद हुआ जिस पर लिखा था, “शमीम नोमानी जिम्मेदार है”। पुलिस ने यह सुसाइड नोट, रिज़वाना का लैपटॉप और मोबाइल ज़ब्त कर लिया।

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खुल जाए शहर का ताला: अहमदाबाद और सूरत में प्रवासी मजदूरों पर आजीविका ब्यूरो का अध्ययन

यह अध्ययन दो प्रमुख भारतीय शहरों अहमदाबाद और सूरत में कोविड के महामारी का रूप लेने से पहले किया गया। प्रस्तुत है अध्ययन का सार

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अगर लॉकडाउन नहीं होता तो क्या ऋषि कपूर आज ज़िंदा होते? उनकी ट्विटर टाइमलाइन कुछ कहती है…

जनता कर्फ्यू से लेकर रामनवमी के बीच गुजरे 10 दिन के लॉकडाउन में हम देखते हैं कि काफी तेज़ी से ऋषि कपूर की मानसिक स्थिति बदल रही है। एक जद्दोजेहद दिखलायी देती है, विचार प्रक्रिया अस्पष्ट है और सबके कल्याण के लिए वे बंदिशाें को और मज़बूत करने के हक में भी हैें।

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सुलतान क्या होता है, ये आपने कभी सोचा है? महमूद गज़नी को अल-बिरूनी उर्फ़ इरफ़ान का जवाब

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के लिखे डिस्कवरी आफ इंडिया पर बने दूरदर्शन के सीरियल भारत एक खाेज में इरफ़ान खान जिन छह अध्यायों में हमें नज़र आते हैं, उनमें एक एपिसोड महमूद गज़नी पर है। इसमें वे दार्शनिक अल-बिरूनी के किरदार में हैं।

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किसी ने पीठ पर ठोंक कर कहा था, “आपका स्टेशन आ रहा है, प्लीज़ उतर जाएं”!

कैंसर के इलाज के दौरान उन्होंने अजय ब्रह्मात्मज को एक चिट्ठी लिखी थी। उस चिट्ठी को दोबारा पढ़ा जाना चाहिए आज।

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