मौत के ‘तांडव’ के बीच शासकों का निर्मम चुनावी स्नान?

कोरोना महामारी का प्रकोप शुरू होने के साल भर बाद भी देश उसी जगह और बदतर हालत में खड़ा कर दिया गया है जहां से आगे बढ़ते हुए महाभारत जैसे इस युद्ध पर तीन सप्ताह में ही जीत हासिल कर लेने का दम्भ भरा गया था।

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‘धृतराष्ट्र’ की मुद्रा में हैं मीडिया के ‘संजय’ इस समय?

पत्रकारिता समाप्त हो रही है और पत्रकार बढ़ते जा रहे हैं! खेत समाप्त हो रहे हैं और खेतिहर मज़दूर बढ़ते जा रहे हैं, ठीक उसी तरह। खेती की ज़मीन बड़े घराने ख़रीद रहे हैं और अब वे ही‌ तय करने वाले हैं कि उस पर कौन सी फसलें पैदा की जानी हैं। मीडिया संस्थानों का भी कार्पोरेट सेक्टर द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है और पत्रकारों को बिकने वाली खबरों के प्रकार लिखवाए जा रहे हैं। किसान अपनी ज़मीनों को ख़रीदे जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। मीडिया की समूची ज़मीन ही खिसक रही है पर वह मौन हैं। गौर करना चाहिए है कि किसानों के आंदोलन को मीडिया में इस समय कितनी जगह दी जा रही है? दी भी जा रही है या नहीं? जबकि असली आंदोलन ख़त्म नहीं हुआ है। सिर्फ़ मीडिया में ख़त्म कर दिया गया है।

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चुनाव बंगाल का, दांव पर राजनीति दिल्ली की!

गौर किया जा सकता है कि ममता बनर्जी इतनी डरी हुईं, घबराई हुईं और आशंकित पिछले एक दशक में कभी नहीं देखी गईं। वे अभी तक तो कोलकाता में बैठकर ही दिल्ली को ललकारती रहीं हैं पर अब दिल्ली स्वयं उनके दरवाज़े पर है और चुनौती भी दे रही है। बंगाल में कुछ भी हो सकता है!

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नीतीश कुमार नए पुलिस कानून से बिहार की नयी राजनीतिक नस्ल को कुचल देना चाहते हैं!

मैं नीतीश कुमार को भी जानता हूं और इन विधायकों को भी। पूरे जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि मुख्यमंत्री को इन विधायकों के साथ संवाद करना चाहिए। लोकतंत्र और राजनीति के कुछ अभिनव पहलुओं को वह उनसे सीख सकते हैं।

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COVID-19 लॉकडाउन का एक साल पूरा होने पर मानव समाज के लिए एक घोषणापत्र

कोविड-19 की वार्षिकी पर, हमें निश्चित रूप से मनुष्य जीवन पर केंद्रित विश्व – परस्पर देखभाल, समानता और लोक सार्वभौमिकता से भरपूर दुनिया का निर्माण करना होगा।

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देश भर में LIC वाले हड़ताल पर क्यों चले गए? क्या है IPO और क्यों हो रहा है विरोध?

सरकार निगम मे विनिवेश क्यों करना चाहती है? क्या निगम ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका नहीं निभाई है? क्या निगम ने जनता के पैसे को मोबि‍लाइज नहीं किया है? क्या निगम ने उस पैसे का राष्ट्रीय और सामाजिक उपयोग नहीं किया है? क्या निगम ने जनता का विश्वास बरकरार नहीं रखा है? क्या निगम ने प्रतियोगी माहौल का सामना सफलतापूर्वक नहीं किया है?

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अनामिका को साहित्य अकादमी: हिंदी की पुरस्कारधर्मी लॉबी का नया तर्कशास्त्र

हिंदी में पुरस्कारधर्मी मानसिकता और उससे जुड़े साहित्यिक भ्रष्टाचार के सवाल न तो किसी एक संस्था से जुड़े हैं न किसी एक व्यक्ति या पुरस्कार से और न ही वे …

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जर्मनी में नाज़ी शासन और आइंस्टीन: कुज़नेत्सोव की पुस्तक से एक प्रसंग

वैज्ञानिकों की सूची में आइंस्टीन शीर्ष स्थान पर थे और उन्हें पता था कि किसी भी समय बगल के देश जर्मनी का कोई नाजी एजेंट मुसीबत बनकर आ सकता है और यह भी उन्हें पता था कि जर्मनी में रहने वाले उनके घनिष्ठ मित्र भी उनके प्रति चिंतित रहते हैं।

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आंदोलन उम्मीद जगाता है कि बैलों की तरह मनुष्य खेती से चुपचाप बेदखल नहीं किए जा सकते!

आंदोलन उम्मीदें जगाते हैं, मनुष्यों की चेतना का परिष्कार करते हैं। किसान आंदोलन भी उम्मीदें जगा रहा है, चेतनाओं का परिष्कार कर रहा है। तभी तो, बेरोजगारों के मानस में भी उथल-पुथल के संकेत नजर आने लगे हैं, छात्रों का जुड़ाव भी आंदोलित किसानों से होता जा रहा है, कामगारों के बीच भी हलचल मच रही है।

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हिन्दुत्व की परिभाषा: ‘दिनमान’ में 8 दिसम्बर, 1968 को छपा कवि-संपादक अज्ञेय का संपादकीय

संघ का ऐब यह नहीं है कि वह ‘हिंदू’ है; ऐब यह है कि वह हिंदुत्व को संकीर्ण और द्वेषमूलक रूप देकर उसका अहित करता है, उसके हज़ारों वर्ष के अर्जन को स्खलित करता है, सार्वभौम सत्यों को तोड़-मरोड़ कर देशज या प्रदेशज रूप देना चाहता है यानी झूठा कर देना चाहता है.

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