“बनारस में रह कर मैं बनारस से कितना दूर था और गिरीश कितने पास”!

बात 1990 के दशक की है जब मैं प्रो. इरफ़ान हबीब के एक आमंत्रण पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास, उच्च अध्ययन केंद्र में एक माह की विज़िटरशिप के लिए …

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सीताराम सिंह: समाजवाद का एक आफ़ताब

सीताराम सिंह जी आज हमारे बीच होते तो हम उनकी 101वीं सालगिरह मना रहे होते। वे सौ की उम्र पूरी करने से पहले 2018 में हमारे बीच से चले गए

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मोहब्बत, इंसानियत और खुलूस के अधूरे सपने का नाम है कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी का मानना था कि शायरी और कविता का इस्तेमाल समाज में बदलाव लाने वाले हथियार के रूप में होना चाहिए

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