बनारस ने उन्हें बहिष्कृत किया, लेकिन नामवर ने अपने गुरु का वैचारिक ध्वज कभी झुकने नहीं दिया!

बनारस में बंगला नवजागरण और रवीन्द्रनाथ टैगोर की चेतना से शिक्षित-दीक्षित और संस्कारित होकर हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जब आए तब उन्हें अनेक तरह का विरोध झेलना पड़ा। इसकी झलक नामवर जी की किताब ‘दूसरी परंपरा की खोज’ और विश्वनाथ त्रिपाठी की किताब ‘व्योमकेश दरवेश’ में मिलती है। नामवर सिंह ने ऐसे में यदि द्विवेदी जी को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया तब यह बतलाने की जरूरत नहीं रह जाती कि उनकी विचारधारा क्या थी।

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दिलीप कुमार: मेरे जीवन भर की प्रेमासक्ति

मैंने कभी इस उम्मीद को नहीं छोड़ा कि एक दिन वो अपने घर के किसी कोने में एक दुबली-पतली शर्मीली लड़की जिसकी आँखों में उनके लिए प्यार था ज़रूर महसूस करेंगे।

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सामाजिक परिवर्तन के लिए सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत पर हमेशा जोर देते थे लालबहादुर वर्मा

जब वर्मा सर इलाहाबाद से दिल्ली आये, थोड़े समय बाद ही उन्हें डेंगू हो गया। उस समय मैं दिल्ली में उनके घर पर ही था। उन्होंने मुझे भी अस्पताल में बुला लिया मिलने पर सबसे पहला वाक्य यह कहा- यह भी एक दुनिया है।

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ग्यारह साल बाद शाहिद आज़मी की याद

सुदूर आज़मगढ़ से मुंबई पहुंचे इस युवा वकील एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता को शायद अन्दाज़ा था कि यह घड़ी कभी भी आ सकती है। इसीलिए उन्होंने पुलिस को कई बार इत्तेला दी थी कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं। कहा जाता है कि ऐसे कुछ लोग पुलिस महकमे में भी थे, जिन्हें उनका जिन्दा रहना नागवार गुजर रहा था।

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मेरी यादों में मंगलेश: पांच दशक तक फैले स्मृतियों के कैनवास से कुछ प्रसंग

एक दिन पहले ही मैंने फोन पर किसी का इंटरव्यू किया था और फोन का रिकॉर्डर ऑन था। दो दिन बाद मैंने देखा कि मेरी और मंगलेश की बातचीत भी रिकॉर्ड हो गयी है। उसे मैंने कई बार सुना- ‘‘आनंद अभी मैं मरने वाला नहीं हूं’’ और सहेज कर रख लिया।

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बिटवीन द लाइंस: सृजन और विध्वंस के बीच एक कलाकार की याद

अकादमी परिसर के बाहर आयोजित की गयी सभा के अंत में मुख्य अतिथि जस्टिस शास्त्री ने भावुक होकर नीता जी से अपने घरेलू रिश्तों और तमाम यादगार पलों को साझा किया और इसके बाद कला दीर्घा में प्रज्वलित कर चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। खास बात यह कि गैलरी में रजनीगंधा भी था। यह फूल नीता कुमार का पसंदीदा फूल था।

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जातिवाद, ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता के खिलाफ सामाजिक न्याय का एक किसान-बहुजन योद्धा

चौधरी चरण सिंह को जनसामान्य ‘किसान मसीहा’ और भारत के पांचवें प्रधानमन्त्री के तौर पर तो जानता है लेकिन कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व को उनके मूल विचारों और कृतित्व से उलट ही जानता और समझता आया है।

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हिन्दू-मुस्लिम एकता और आज़ादी के नायक मौलाना मोहम्मद अली जौहर

भारत में स्वतंत्रता की घोषणा मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने की थी। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यह मोहम्मद अली थे जिन्होंने देश के सबसे बड़े नेताओं में से एक सी.आर. दास को आंदोलन में शामिल होने के लिए राजी किया था। इसलिए उनके जीवन और योगदान को समझने के लिए इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता।

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आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण भारत का इंदिरा का सपना अब भी बाकी है…

साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद, अलगाववाद तथा सामाजिक व्यवस्था के विचारहीन पहलू भारतीय एकता को तोड़ रहे थे। जहां उन्हें आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न भारत का निर्माण करना था, वहीं दूसरी ओर एक अभिशप्त सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर न्यायपूर्ण व्यवस्था का सृजन करना था। श्रीमती गांधी ने जीवनपर्यन्त और प्राण देकर भी इसका निर्वहन किया।

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कॉमरेड ए.बी. बर्द्धन की याद में भारत के मज़दूर आंदोलन पर एक व्‍यापक नज़र

कॉमरेड ए. बी. बर्धन के 95वें जन्मदिवस तथा श्रम संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन काँग्रेस (एटक) की स्थापना के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज द्वारा 25 और 26 सितम्बर को आयोजित ज़ूम मीटिंग का विषय था “भारत के मजदूर आंदोलन की विरासत और आज के संघर्ष”।

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