किसानों के खिलाफ करदाताओं को खड़ा करने वाले विभाजनकारी अर्थशास्त्र के सहारे सरकार

अनेक ऐसे आलेखों और विश्लेषणों से समाचार माध्यम भरे पड़े हैं जिनका सार संक्षेप मात्र इतना ही है कि किसानों का यह अनुचित और मूर्खतापूर्ण हठ पूरे देश को ले डूबेगा। जो तर्क दिए जा रहे हैं वह पुराने जरूर हैं लेकिन उनकी प्रस्तुति में जो आक्रामकता अब है वह पहले नहीं थी।

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बैकफुट पर सरकार: दो मांगें मानी, दो पर नये साल में चर्चा, आज की ट्रैक्टर रैली स्थगित

बैठक के बाद कृषि मंत्री ने कहा है कि सरकार कह रही है कि एमएसपी लागू रहेगा और सरकार लिखित में भी देने को तैयार हैं, किंतु किसान यूनियन के नेता एमएसपी पर क़ानूनी मोहर चाहते हैं इसलिए इस पर और अन्य मुद्दों पर चर्चा के लिए चार जनवरी दोपहर 2 बजे अगली बैठक होगी.

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प्रधानमंत्री जी! लोकतांत्रिक सरकार की गाड़ी बिना रिवर्स गियर के चलाने की कोशिश मत करिए!

आदरणीय मोदी जी बोले तो अवश्य किंतु उनके लंबे भाषण में प्रधानमंत्री को तलाश पाना कठिन था। कभी वे किसी कॉरपोरेट घराने के कठोर मालिक की तरह नजर आते जो अपने श्रमिकों की हड़ताल से नाराज है; कभी वे सत्ता को साधने में लगे किसी ऐसे राजनेता की भांति दिखाई देते तो कभी वे उग्र दक्षिणपंथ में विश्वास करने वाले आरएसएस के प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्त्ता के रूप में दिखते।

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अडानी-अम्बानी से बयाना मोदी ने लिया है, सांसदों ने नहीं, इसलिए वे इस्तीफ़ा दें: शिवाजी राय

पूर्वांचल के बड़े किसान नेता, किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष और किसान आंदोलन समर्थन समिति, लखनऊ के संयोजक शिवाजी राय मंगलवार को टिकरी बॉर्डर पर किसानों के मंच पर थे. जनपथ की ओर से पत्रकार नित्यानंद गायेन ने इस मौके पर उनसे बात की है.

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राग दरबारी: प्रधानमंत्री का ‘मन’ किसके साथ है?

प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार कुल मिलाकर किसानों के लिए जो तीन कानून संसद द्वारा बनाए गए हैं उससे किसानों को बहुत लाभ मिल रहा है, जिसका जीता-जागता उदाहरण जितेन्द्र भोई हैं। इसी जितेन्द्र भोई की कहानी का खुलासा 4 दिसंबर के दैनिक भास्कर ने किया है।

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राग दरबारी: खुद को ‘किसान’ कहने वाले 25% से ज्यादा सांसदों की हैसियत क्या कुछ भी नहीं?

किसानों के पास किसी तरह की कोई आर्थिक ताकत नहीं रह गयी है जबकि संसद में सिर्फ 25 (2.73 फीसदी) सांसद ऐसे हैं जो अपने को उद्योगपति कहते हैं, लेकिन इनके हितों को लाभ पहुंचाने के लिए पूरा देश तैयार है।

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पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी के किसान आंदोलन क्‍यों कर रहे हैं? बुनियादी सवाल का आसान जवाब

मीडिया आपको बताएगा कि सरकार एमएसपी को खत्‍म करने नहीं जा रही। किसान कह रहे हैं कि ठीक है, एक काम करो कि कानून में ये डाल दो कि एमएसपी से नीचे की खरीद दंडनीय अपराध होगी। सरकार ये करने से मना कर रही है।

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तीनों कृषि विधेयक केवल किसानों पर ही नहीं, हमारी थाली पर भी सीधा हमला हैं!

विधेयक में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक अनाज व तेल के दाम पिछले साल के औसत मूल्य की तुलना में डेढ़ गुना व आलू-प्याज, सब्जी-फलों के दाम दोगुने से ज्यादा नहीं बढ़ेंगे, तब तक सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। इसका अर्थ है कि खाद्य वस्तुओं में महंगाई को 50-100% की दर से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ाने की कानूनी इजाज़त दी जा रही है

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