‘साझा कम्युनिकेशन’ के जरिये FRA को कमजोर करने की कोशिश, नोडल एजेंसी पर MOTA की बहाली की मांग

किसान सभा नेताओं ने कहा कि वनाधिकार कानून बनने के बाद भी वन मंत्रालय वनों पर अपने आधिपत्य को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि उसने वन अधिनियम में आदिवासी विरोधी संशोधनों को प्रस्तावित किया था।

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बात बोलेगी: आदिम शिकारियों के कानूनी जंगल में ‘मादा’ जद्दोजहद के दो चेहरे

मूल कथा भले ही एक शेरनी (टी-12) के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, लेकिन यह दो मादाओं (स्त्रीलिंग) की बराबर जद्दोजहद भी है जिसमें उन्हें ही खेत होना है। एक महिला के लिए हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारी नौकरशाही ठीक वही रवैया अपनाती है जो एक शेरनी के लिए शिकारी अपनाता है, यह बात बिना किसी उपदेश के इस फिल्म में सतह पर आ जाती है।

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पंचतत्व: वनों का प्रबंधन स्थानीय समुदायों के हाथ में देने से कौन रोक रहा है?

उत्तराखंड की खासियत है कि हर वन पंचायत स्थानीय जंगल के उपयोग, प्रबंधन और सुरक्षा के लिए अपने नियम खुद बनाती है. ये नियम वनरक्षकों के चयन से लेकर बकाएदारों को दंडित करने तक हैं. सरमोली के विर्दी गांव में, जंगल की सुरक्षा के पंचायती कानून के तहत जुर्माना 50 रुपये से 1,000 रुपये तक है.

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बेदखली नहीं, आदिवासियों को जंगल पर अधिकार दे सरकार- AIPF

प्रतिनिधिमंडल द्वारा दिए पत्रक में कहा गया कि माननीय सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदिवासियों और वनवासियों की उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखली पर रोक लगाई हुई है. इस संबंध में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी शासनादेश जारी किया है और कहा है कि वनाधिकार कानून के तहत दाखिल दावों का पुन: परीक्षण कराया जाए. खुद विशेष सचिव ने दौरा करके निर्देश दिए थे. बावजूद इसके घोरावल तहसील में वन विभाग द्वारा बेदखली की कार्रवाई की जा रही है.

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कोरोना की आपदा के बीच कोल ब्लॉक की नीलामी किसको आत्मनिर्भर बनाने के लिए है?

कोरोना की आपदा को क्या खनन कंपनियों के लिये अवसर में बदलने की तैयारी चल रही है? कोल ब्लॉक को लेकर केंद्र सरकार जो कुछ करने जा रही है, उससे …

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