जंतर-मंतर पर छात्रों-युवाओं के आंदोलन से निकलते कुछ जरूरी सबक

ऐसा क्यों है कि जो तरीके कभी सरकारों को हिला देने में सक्षम लगते थे, वे अब उन्हें टस से मस करने में भी नाकाम दिखते हैं? क्या गांधीवादी राजनीति की नैतिक ताकत कम हो गई है? या फिर वे हालात ही बुनियादी तौर पर बदल गए हैं जिन्होंने कभी इसे राजनीतिक रूप से असरदार बनाया था?

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आप जंतर-मंतर जाएं या नहीं, पर दो गलत सवाल की जगह एक सही सवाल पूछें!

सोनम वांगचुक और युवा साथियों का सत्याग्रह केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का सवाल नहीं है। यह शिक्षा, बेरोजगारी, लोकतंत्र और जवाबदेही के गहरे संकट का आईना है। ऐसे समय में असली सवाल यह नहीं कि कौन जंतर-मंतर पहुँचा, बल्कि यह है कि सरकार अब तक चुप क्यों है।

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भारत के नागरिकों, छात्रों-युवाओं से भारत जोड़ो अभियान की अपील

हम देश के सभी विपक्षी दलों, जन आंदोलनों, संगठनों और नागरिकों, विशेषकर छात्रों और युवाओं से अपील करते हैं कि वे इस दिशा में चल रहे सभी लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलनों का समर्थन करें तथा 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद भवन मार्च में शामिल हों।

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लद्दाख में जनवादी आंदोलनों पर पुलिस दमन के ख़िलाफ़ PUDR की अपील

24 सितम्बर को लद्दाख में पुलिस कारवाई में चार प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई, 50 से अधिक लोग घायल हुए और 70 से अधिक युवकों को गिरफ्तार किया गया था

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लद्दाख : जनता के अहिंसक आन्दोलन और लोकतांत्रिक मांगों के समर्थन व समाधान की राष्ट्रहित में अपील

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जबकि पूरा पश्चिमी हिमालय प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ चुका है, लद्दाख की आवाज को गंभीरता से सुनने की जरूरत हैl दो विरोधी पड़ोसियों से घिरे इस संवेदनशील क्षेत्र के मुद्दों को हल करने में सरकार की लापरवाही देश पर भारी पड़ सकती हैl

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हमारी नदियों को बचाने के लिए -20 डिग्री में उपवास कर रहे सोनम वांगचुक ‘नजरबंद’ हैं!

उन्होंने 26 जनवरी से पांच दिन के लिए दुनिया की सबसे ऊंची सड़क 18 हजार फुट पर स्थित खारदुंगला में -40 डिग्री के तापमान में अनशन शुरू करने का ऐलान किया था मगर खराब मौसम और स्थानीय प्रशासन की मनाही के चलते उनका ऐसा करना संभव नहीं हो पाया।

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