बात बोलेगी: ‘लोक’ सरकारी जवाब पर निबंध रच रहा है, ‘तंत्र’ खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है!

बात यहां केवल उन तीन सौ या दो हज़ार लोगों की नहीं होना चाहिए जिनके नाम छाप रहे हैं। बात उनकी भी होना चाहिए जिनके अंगूठे के निशान और आँखों की पुतलियों की आभा नुक्कड़ की दुकानों पर सरेआम बिक रही है। दो किलो धान या चावल के बदले, अपना ही टैक्स अदा करने के बदले, विदेश जाने की ख़्वाहिश के बदले हम सब ने अपनी-अपनी हैसियत और औकात के हिसाब से अपनी निजता खुद बेची है।

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बात बोलेगी: आप पहले पैदा हो गए हैं, केवल इसलिए आगे किसी और के पैदा होने का अधिकार छीन लेंगे?

जनसंख्या नियंत्रण के विचार मात्र को भी इसी कसौटी पर परखने की ज़रूरत है कि क्या इस देश में पहले जन्म ले चुके लोगों को मात्र पहले आ जाने की वजह से ये अधिकार हासिल हैं कि भावी पीढ़ियों को आने ही न दिया जाए?

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बात बोलेगी: जिन्हें कहीं नहीं जाना, उन्हें यहीं पहुंचना था…!

अब केवल दो काम ही दिये जा रहे हैं मंत्रियों को। एक सुबह उठते ही मोदी जी के ट्वीट को रीट्वीट करना। आइटी सेल से आयी किसी पोस्ट को री-पोस्ट करना। थैंक यू अभियान में घर बैठे-बैठे हिस्सा लेना और वक़्त पर राहुल गांधी पर ‘बार्क’ करना।

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बात बोलेगी: एक दूजे की प्रार्थनाओं और प्रतीक्षाओं में शामिल हम सब…

सब एक-दूसरे का किस-किस तरह से इंतज़ार करते हैं यह बात शायद सामूहिक स्मृति से भुलायी जा चुकी थी। इसे इस महामारी ने फिर से साकार कर दिया है। यहां पूरा देश और समाज एक दूसरे के इंतज़ार में है। अगर ठीक से इस इंतज़ार की ध्वनियाँ सुनी जाएं तो असल में सारे लोग एक-दूसरे की बेहतरी के इंतज़ार में हैं। कोई केवल अपने लिए प्रार्थना नहीं कर रहा है, बल्कि उसकी प्रार्थना में सबके लिए कुछ न कुछ मांगा जा रहा है।

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बात बोलेगी: आदिम शिकारियों के कानूनी जंगल में ‘मादा’ जद्दोजहद के दो चेहरे

मूल कथा भले ही एक शेरनी (टी-12) के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, लेकिन यह दो मादाओं (स्त्रीलिंग) की बराबर जद्दोजहद भी है जिसमें उन्हें ही खेत होना है। एक महिला के लिए हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारी नौकरशाही ठीक वही रवैया अपनाती है जो एक शेरनी के लिए शिकारी अपनाता है, यह बात बिना किसी उपदेश के इस फिल्म में सतह पर आ जाती है।

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बात बोलेगी: ‘नये भारत’ के नागरिकों के लिए क्यों न एक भयदोहन कोष बनाया जाए!

ज़रूरी तो नहीं कि मंदिर के लिए वसूले गये चंदे से मंदिर से सम्‍बन्धित काम ही हो। जैसे पीएम केयर्स से भी ज़रूरी तो नहीं हुआ कि केवल कोविड संबंधी काम ही हुए। कोष एक, काम अनेक। फिर मंदिर के लिए माहौल बनाये रखना भी ज़रूरी है।

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बात बोलेगी: सब सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है

यह सब एक ऐसे समय में लिखा जा रहा है जब किसी को किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी के साथ कुछ हो जाने से खुद उसे ही कुछ फर्क नहीं पड़ता। जब पीड़ितों को पीड़ा से फर्क न पड़े और उत्पीड़कों के लिए भी उत्पीड़न एक सामान्य बात हो जाए और यह सब एक व्यवस्था के तहत हो रहा हो तब सामुदायिक जीवन में फर्क पड़ने जैसा कोई भाव नहीं रह नहीं जाता है।

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बात बोलेगी: बारहवीं की सरकारी तेरहवीं और मेरिटोक्रेसी का मिडिल क्लास अचार

अचार की तरह हिंदुस्तान में बारहवीं कक्षा का इम्तिहान भी भविष्य के महलों की बुनियाद है। बारहवीं कक्षा की अंकसूची और उसका पर्सेंटाइल भी अचार की तरह का एक जायका है। इन दोनों तरह के जायकों पर ही जैसे मोदीयुग में संकुचित होते मध्यवर्ग का वजूद टिका है।

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बात बोलेगी: परेशानियों को पहचानने की सलाहियत से महरूम सरकार पर मुस्कुराता बुद्ध का चाँद

आज किसान पूरी दुनिया में भारत के राजदूत बन गये हैं। दुनिया सरकार की कम, किसानों की बातें ज़्यादा सुन रही हैं। सरकार इस बात से हलकान है। वह अपनी भड़ास उन माध्यमों पर निकाल रही है जिनके मार्फत आज के बुद्ध अपनी बात दुनिया तक पहुँचा रहे हैं। बुद्ध अगर आज हुए होते तो उन्हें दीक्षाभूमि में ही महदूद किये जाने की कोशिशें की जा रही होतीं। ठीक वैसे ही जैसे किसानों को सिंघू, गाजीपुर, टिकरी में घेर देने की कोशिशें की जा चुकी हैं।

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बात बोलेगी: खुलेगा किस तरह मज़मूं मेरे मक्तूब का या रब…

जिसके कहे पर देश चलने लगा था या उतना तो चलने ही लगा था जितनों की उँगलियों में देश की बागडोर सौंपने का माद्दा था, आज वे उँगलियां उस नीली स्याही को कोसती नज़र आ रही हैं जिसे वोट करते वक्‍त उन्‍होंने लगवाया था। ऐसी हर कम होती उंगली का एहसास इस विराट सत्ता को हो चुका है।

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