“इन 18 महीनों में हमने वो भी खो दिया जो हमारा था”: कश्मीर में विकास के दावों का ज़मीनी सच

जिन समुदायों के साथ यह बातचीत हुई, वे पुराने निज़ाम को फिर से याद करने लगे हैं जबकि कश्मीर के स्थापित परिवारों और खानदानों को लेकर उनके मन में कोई सहानुभूति नहीं है बल्कि वे तो यह मानते हैं कि ‘उनके साथ ठीक ही हुआ’।

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बात बोलेगी: वबा के साथ बहुत कुछ आता है और जाता भी है!

महामारी की पैदाइश से लेकर आज की विभीषिका के इतिहास को जब लिखा जाएगा तो उनका भी नाम यहां आना चाहिए जो इसे लेकर आलोचनात्मक और तार्किक नज़रिये से बात करते आए। तब भी उन्हें संख्या बल के सामने हुज्जत झेलनी पड़ी, लेकिन गत एक सप्ताह के दौरान हम देख रहे हैं कि उन्हें लगभग बेइज्जती नसीब हो रही है।

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बात बोलेगी: जो संस्थागत है वही शरणागत है!

शादी-ब्याह या किसी सामुदायिक आयोजन में किसे जाना है, किसे बुलाना है, कितनों को बुलाना है जैसे मसले कभी इन संस्थाओं के अधीन नहीं रहे, लेकिन कोरोना महामारी के बहाने राजकीय संस्थागत प्रभावों से मुक्त इस नितांत अनौपचारिक कहे जाने वाले कार्य-व्यवहार को संस्थागत राजनैतिक ढांचे में ला दिया है।

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बात बोलेगी: कश्मीर में बैठ के कश्मीर को समझने का अहसास-ए-गुनाह

आखिर को दिल्ली- जिसे देश की राजनैतिक राजधानी का दर्जा प्राप्त है और जिसके वैभव में कश्मीर से कम सभ्यताओं और शासकों के आवागमन का इतिहास दर्ज है- भी ठीक उसी गति को प्राप्त हुई है जिस गति को कश्मीर? क्या वाकई कोई नागरिक प्रतिरोध दिल्‍ली में देखा गया? याद नहीं पड़ता।

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बात बोलेगी: जो जीता वही सिकंदर, जो हारा वो जंतर-मंतर!

अगर बाहर यानी सदन के अलावा कहीं भी ठीक यही सुरक्षा, संरक्षण, मर्यादा व सभ्यता नहीं है तो सदन पर भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव होगा। सदन को मिली विशिष्टता उसे सुरक्षा देने में कभी भी चूक जाएगी।

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बात बोलेगी: दांडी की हांडी में पक रहा है “नियति से मिलन” का संदेश!

आने वाले 75 सप्ताहों तक ऐसा ही कुछ-कुछ होता रहेगा ताकि आज़ादी की हीरक यानी डायमंड जुबली मनाते समय आज़ादी के मूल आंदोलन में न सही, लेकिन उसके नाट्य रूपान्तरण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अत्यंत सक्रिय भूमिका का उल्लेख किया जा सके।

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बात बोलेगी: बिजली, पानी और बजटीय मद में 45 करोड़ की देशभक्ति भी मुफ़्त, मुफ़्त, मुफ़्त!

बिजली-पानी के साथ साथ अब देशभक्ति की मुफ्त डोज़। दिल्ली को देशभक्त होने से अब कोई नहीं रोक पाएगा। उम्मीद है जब इस महान कार्यक्रम का उल्लंघन दिल्ली के नागरिक करेंगे तो केजरीवाल जी की सरकार के कहने पर उनके नियंत्रण से बहरा बतलायी जाने वाली दिल्ली पुलिस उनके इशारों पर काम करेगी क्योंकि उसे ऐसा करने का अनुमोदन नई दिल्ली से एडवांस में प्राप्त होगा।

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मॉडल कंक्लूसिव लैंड टाइटल एक्ट व रूल्स: संघीय ढांचे के खिलाफ नीति आयोग की नयी पेशकश

जब लगभग 50 दिनों से बंद पड़े देश का ताला बेहद सतर्कता से खोला जा रहा था, राज्यों की सीमाएं अब भी अंतरराष्‍ट्रीय सीमाओं की मानिंद पेश आ रही थीं, सामान्य नागरिक आवाजाही और दैनंदिन कार्य-व्यापार अब भी राष्ट्रीय आपदा नियंत्रण कानून और राष्ट्रीय महामारी कानून के अंतर्गत थे, संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार इन दो क़ानूनों के अंतर्गत ही प्रयोग में लाये जा सकते थे, ऐन इसी समय 2 जून 2020 को नीति आयोग देश के सभी राज्यों को लैंड टाइटलिंग एक्ट का मसौदा भेजता है और उन्हें कहता है कि या तो इसी मसौदे को या इसकी तर्ज़ पर तैयार किए गए मसौदे को अंगीकार करें और उसका क्रियान्वयन करें। इस पत्र में ‘ना’ कहने की गुंजाइश राज्यों के पास नहीं थी।

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बात बोलेगी: हिंदू थक कर सो गया है तब तो ये हाल है, जागेगा तो क्या होगा डाक साब?

डॉ. साहब की चिंता समझ में आती है, लेकिन उसका निदान वो किससे मांग रहे हैं यह समझ नहीं आया, हालांकि उन्होंने देश का ध्यान इस महान तथ्य की तरफ दिलाया है कि यह देश दो-दो महान सत्ताओं के संरक्षण में मानवाधिकारों से सम्पन्न जम्हूरियत के मज़े लेता आ रहा है।

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बात बोलेगी: काया की कराह और निज़ामे मुल्क की आह के मद्देनज़र एक तक़रीर…

आपने या किसी ने भी कभी साँप के पैर देखने की कोई चेष्टा की? नहीं की होगी। आप कह देंगे कि पैर देखने जाएंगे तो वो डस लेगा। यानी आप इस डर से उसके पैर देखने की कोशिश नहीं करते हैं और बेसबब उसके बारे में बेवफाई के दर्द भरे नगमे गाने लगते हैं। अन्तर्मन से पूछिए कि क्या आपका ये रवैया ठीक है?

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