नीतीश कुमार नए पुलिस कानून से बिहार की नयी राजनीतिक नस्ल को कुचल देना चाहते हैं!

मैं नीतीश कुमार को भी जानता हूं और इन विधायकों को भी। पूरे जिम्मेदारी के साथ कहना चाहता हूं कि मुख्यमंत्री को इन विधायकों के साथ संवाद करना चाहिए। लोकतंत्र और राजनीति के कुछ अभिनव पहलुओं को वह उनसे सीख सकते हैं।

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बात बोलेगी: जो जीता वही सिकंदर, जो हारा वो जंतर-मंतर!

अगर बाहर यानी सदन के अलावा कहीं भी ठीक यही सुरक्षा, संरक्षण, मर्यादा व सभ्यता नहीं है तो सदन पर भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव होगा। सदन को मिली विशिष्टता उसे सुरक्षा देने में कभी भी चूक जाएगी।

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राग दरबारी: बिहार में पिछड़ों की राजनीति किसके इर्द-गिर्द घूम रही है?

आज के हालात में विधानसभा में आए परिणाम के बाद नीतीश व कुशवाहा दोनों को लग गया है कि गैर-राजद पिछड़ों का पूरा का पूरा जनाधार कहीं बीजेपी में शिफ्ट न हो जाए।

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शपथ ग्रहण तो हो गया, अब नीतीश की ‘ग्रेसफुल विदाई’ तय करेगी सरकार की उम्र

या तो खट्टर और फडणवीस की तरह बिहार में भी तारकिशोर प्रसाद औऱ रेणु देवी को लाया-बढ़ाया जा रहा है या फिर मोदी-शाह द्वय ने सोच लिया है कि बिहार में नीतीश से सीधा वे ही डील करेंगे

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अंतिम नतीजा चाहे जो हो, यह जनादेश सिर्फ और सिर्फ नीतीश के खिलाफ है!

तेजस्वी अगर इस चुनाव के एकल विजेता हैं, तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हार के सर्वाधिक उचित व्यक्तित्व। वैसे तो राजनीति में नैतिकता और शर्म नामक शब्द होते नहीं, लेकिन नीतीश को नतीजे देखते हुए खुद ही अब संन्यास ले लेना चाहिए, केंद्र की राजनीति चाहें तो करते रहें।

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बीते 15 साल में दफ़न तीन डिसमिल ज़मीन का एजेंडा क्या ज़िंदा कर पाएगा बिहार का नया नेतृत्व?

यहां लंबे समय से काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 1950 के बाद यहां कोई लैंड सर्वे नहीं हुआ। कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि अगर व्यापक जांच पड़ताल की जाए तो पूरा बिहार बहुत बड़े ज़मीन घोटाले का गढ़ साबित होगा।

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बदलाव के कगार पर बिहार: चुनाव के मुद्दे व संबंधित संदर्भ

आज के चुनावी परिदृश्य में एक तरफ जहां सुशासन बाबू अपने ही बनाये ताने-बाने में उलझे, अटके, फंसे पड़े दिख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एक 31 साल का नौजवान नये जोश और उमंग से लबरेज पूरे वातावरण में ताजगी और बदलाव का समां बांध रहा है। एक से एक चुनावी रणकौशल के उस्ताद से लेकर तथाकथित चुनावी चाणक्य तक इस नौजवान की हुंकार के सामने बौने नज़र आ रहे हैं।

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चुनावीबिहार-9: अफ़वाह पर टिकी उम्मीद और ज़मीन पर गायब चुनाव

पहली अफवाह यह है कि भाजपा और नीतीश कुमार में कट्टिस हो चुकी है और दोनों एक-दूसरे के साथ भितरघात कर रहे हैं। दूसरी अफवाह ये है कि तेजस्वी 10 लाख नौकरियां दे रहे हैं, बेरोजगारी मुद्दा है और इसी बात पर तेजस्वी बंपर बहुमत से जीत कर आ रहे हैं।

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क्या लालू और उनकी पार्टी का राजनीतिक शुद्धिकरण कर रहे हैं तेजस्वी?

ऐसा पहली बार है जब बिहार के चुनाव में बात नौकरी और रोजी-रोटी की हो रही है और ये सब उस पार्टी से हो रही है जिसके सरकार पर बिहार में जंगलराज लाने का आरोप लगाया जाता रहा है. अचानक से चुनावी पोस्टर-बैनर और पर्चे से लालू का गायब हो जाना क्या सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है या फिर राजद में लालू युग का ‘द एंड’ हो गया है?

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नीतीश जी! आपको क्या हुआ है? आप किससे लड़ रहे हैं?

आखिर वह कर क्या रहे हैं? बोल क्या रहे हैं? किस के खिलाफ वह लड़ रहे हैं? किस के पक्ष में वह लड़ रहे हैं? उन्हें आगे करके उनके चमचों को बिहार लूटना है. उन्हें गलत जानकारियां दी जा रही हैं. जिस चौकड़ी से नीतीश घिरे हैं, वह भ्रष्ट तो है लेकिन बहुत चालाक है. इनसे यदि वह बाहर नहीं आए तो यह उनका और बिहार का दुर्भाग्य होगा.

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